बुधवार, 31 जुलाई 2013

मां सुनाओ मुझे वो कहानी...



मां सुनाओ मुझे वो कहानी
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी
जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
गंध जिसमें भरी हो धरा की
बात जिसमें ना हो अप्सरा की
हो ना परियां जहां आसमानी

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख जो भुला दे
जिसमें सच की भरी चांदनी हो
जिसमें उम्मीद की रोशनी हो
जिसमें ना हो कहानी पुरानी

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शायर-नन्दलाल पाठक
स्वर-सिज़ा राय
संगीत-जगजीत सिंह

सोमवार, 29 जुलाई 2013

आंख तो फूटी,अंजन काहे

कल श्री एन.रघुरामन जी के कार्यक्रम में एक अजीब किस्सा सामने आया। संस्क्रत विशारद महर्षि पाणिनी के नाम पर प्रारंभ किए गए विद्यालय के एक अध्यापक ने प्रश्नोत्तर कार्यक्रम के दौरान हिचकोलेदार अंग्रेजी में रघुरामन जी से एक प्रश्न किया। प्रश्न कितना सार्थक था ये एक अलग विषय है परन्तु उन महोदय ने वहां उपस्थित जनसमुदाय का;जो कि पूर्णरूपेण हिन्दीभाषी था,उसके समक्ष अंग्रेजी बोलकर जो अपमान किया उसे मैं सहन नहीं कर सका और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा ताकि उन्हें इस मिथ्या अहम का बोध कराने वाली परम्परा का मर्म समझा सकूं,किंतु अवसर नहीं मिला। महदआश्चर्य की बात है कि वहां मुख्यवक्ता श्री रघुरामन जो कि मूलतः मद्रासी और अहिन्दी भाषी हैं वे स्तरीय हिन्दी बोल रहे थे और उन्होंने अपना संपूर्ण व्याख्यान भी सुस्पष्ट हिंदी में दिया,वहीं हमारे ये सज्जन उनसे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। विशेष  बात तो यह कि रघुरामनजी ने इनके अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्न का उत्तर भी हिन्दी में दिया। आखिर इस प्रकार अंग्रेजी भाषा का दिखावा करके हम क्या साबित करना चाहते हैं? यही कि हमें अपनी भाषा का गौरव नहीं है या हम भाषाई रूप से इतने दरिद्र हैं कि हमें वार्तालाप करने के लिए भी किसी पराई भाषा का अवलंबन लेना पड़ता है या फिर हमने अंग्रेजी को भद्र और विद्वान होने का स्थाई मानक मान रखा है जिसका प्रयोग करने वाला अन्य लोगों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझा जाएगा? निश्चित ही हर भाषा का अपना महत्व है; इस रूप में अंग्रेजी भी महत्वपूर्ण है किंतु वहां जहां इसकी महती आवश्यकता हो। मेरे देखे अंग्रेजी संपर्क की भाषा तो हो किंतु दिखावे या फैशन का मानक ना बने परन्तु आज हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यहां अंग्रेजी एक फैशन व भद्रता-मानक (स्टेट्स सिंबल) बनती जा रही है। मुझे यहां पूज्य संत श्री मोरारी बापू की एक बात स्मरण आ रही है उन्होंने एक बार कहा था "आंख तो फूटी, अंजन काहे" अर्थात जब आंख ही नहीं होगी तो अंजन का क्या करोगे। हिन्दी हमारा नेत्र है और अन्य समस्त भाषाएं उस नेत्र पर अल्प समय आंजने वाला अंजन। ये कहते हुए बड़ी लज्जा का अनुभव होता है कि आज हमारे अधिकांश युवा हिन्दी का सुस्पष्ट उच्चारण करने व लिखने में असमर्थ हैं और उन्हें इस बात की कोई पीड़ा नहीं क्योंकि वे अंग्रेजी भली-भांति जानते हैं। मेरा मेरे देशवासियों से इतना ही निवेदन है कि हमारे ह्रदय में सम्मान तो हर भाषा का;हर परम्परा का;हर धर्म का हो किंतु गौरव "निज" का हो;अपने का हो।

-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 जुलाई 2013

परमवीर चक्र विजेता

परमवीर चक्र विजेता
(1947-1999)

 

 (जम्मू काश्मीर में कार्रवाई)

1947-48 J & K Operations


मेजर सोमनाथ शर्मा (मरणोपरांत)
Major Somnath Sharma, 4 kumaon, (Posthumous)

राम राघोबा राने
2nd  Lt. Ram Raghoba rane,crops of engineers

पीरु सिंह (मरणोपरांत)
CHM Piru Singh,6 Rajputana Rifles, (Posthumous)

नायक जदुनाथ सिंह  (मरणोपरांत)
Naik Jadunath Singh, 1 Rajput, (Posthumous)

लांस नायक करम सिंह
Lance Naik Karam Singh, 1 Sikh

1962 indo-china war

(भारत-चीन युद्ध)


मेजर शैतान सिंह  (मरणोपरांत)
Major Shaitan Singh, 13 Kumaon, (Posthumous)

मेजर धनसिंह थापा
Major Dhan Singh Thapa,1/8 Gorkha Rifles

सूबेदार जोगिन्दर सिंह  (मरणोपरांत)
Subedar Joginder Singh,1 Sikh, (Posthumous)

1965 indo-pak war

(भारत-पाक युद्ध)


ए.बी.तारापोरे (मरणोपरांत)
Lt. Col. A.B.Tarapore, 17 poona horse, (Posthumous)

अब्दुल हामिद (मरणोपरांत)
CQMH Abdul Hamid,4 Grenadiers, (Posthumous)

1971 indo-pak war

(भारत-पाक युद्ध)


मेजर होशियार सिंह
Major Hoshiar Singh,3 Grenadiers

अरूण खेत्रपाल  (मरणोपरांत)
2nd Lt. Arun Khetarpal, 17 poona Horse, (Posthuomus)

फ्लाइंग आफीसर निर्मलजीत सिंग सेखों  (मरणोपरांत)
Fg. Off. Nirmal Jit Singh Sekhon, no.18 squadron, (Posthumous)

लांस नायक अल्बर्ट एक्का  (मरणोपरांत)
Lance Naik Albert Ekka,17 Gards, (Posthumous)

1999 Kargil operations
(कारगिल में कार्रवाई)


कैप्टन विक्रम बत्रा  (मरणोपरांत)
captain Vikram Batra,13 JAK Rifles, (Posthumous)

लेफ्टिनेंट मनोज के पांडे  (मरणोपरांत)
Lt. Manoj k. Pandey, 1/11 GR, (Posthumous)

ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
Grenadier Yogendra Sing Yadav,18 Grenadiers

राइफलमेन संजय कुमार
Rifleman Sanjay Kumar,13 JAK Rifles

UN Operations


कैप्टन जी.एस.सलारिया  (मरणोपरांत)
Captain G.S. Salaria, 3/1 GR. (Posthumous)

Saichen Operations


नायब सूबेदार बानासिंह
Naib Subedar Bana Singh, 8 JAK,LI

 

 IPFK Operations


मेजर आर.परमेस्वरन  (मरणोपरांत)
Major R. Parameswaran,8 Mahar, (Posthumous)


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निवेदन- उपरोक्त जानकारी हमने विभिन्न समाचार-पत्रों, इलेक्ट्रानिक मीडिया, इस विषय पर प्रसारित कार्यक्रमों व इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त की है। इसकी प्रामाणिकता के संदर्भ में हमारा कोई आग्रह नहीं है। यद्यपि इसके स्रोत के संबंध में हमने पूर्ण सावधानी बरती है। अतः सुधि पाठकगण इसे पढ़ते व प्रयोग करते समय अपने स्वविवेक से काम लें।
-संपादक

शनिवार, 27 जुलाई 2013

ऐसा प्यार कहां...

तानसेन
 किसी संत ने कहा है कि-
                                                  "जे तेरे घट प्रेम है, ते कहि-कहि ना सुनाव।
                                                   अंर्तजानी जानिए, अंर्ततम का भाव॥"
ठीक भी है दो व्यक्तियों का प्रेम बिल्कुल निजी घटना है और उसके प्राकट्य के तरीके भी उतने ही निजी होते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग सुप्रसिद्ध गायक तानसेन के जीवन में आता है जब अकबर रीवा नरेश राजा रामचंद्र को तानसेन को दिल्ली भेजने का आदेश देते हैं तो इससे रीवा नरेश अत्यंत दुखी हो जाते हैं पर विवश हो उन्हें तानसेन को दिल्ली भेजना ही पड़ता है। रास्ते में जब तानसेन पानी पीने के लिए एक कुंए पर रुकते हैं तो देखते हैं कि जिस चौडोल में वो बैठे थे उसे कहारों के साथ खुद रीवा नरेश ने अपने कांधों पे उठा रखा है। ये देखकर तानसेन अत्यंत भाव-विभोर हो जाते हैं और वे राजा रामचंद्र से कहते हैं कि "यद्यपि मैं आपको कुछ दे नहीं सकता पर आज एक वचन देता हूं कि जिस दाहिने हाथ से आज तक आपको "जुहार" (सलाम,नमस्कार) की है उस दाहिने हाथ से आज के बाद किसी और को जुहार नहीं करूंगा।"कहते हैं कि इसके बाद तानसेन हमेशा बाएं हाथ से सलाम करते थे।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

ऐसी वाणी बोलिए...

"ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होय॥" शायद एक संत की यह सीख आज के दौर के राजनेता भूल गए हैं। दिग्विजय सिंह,बेनीप्रसाद वर्मा,नरेंद्र मोदी,राज ठाकरे,मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती, ममता बनर्जी ये वे नाम है जो अपनी फिसलती जिव्हा के कारण आए दिन सुर्खियों व विवादों में रहते हैं। क्या हमारे शब्दकोश का दारिद्रय इतना बढ़ गया है कि हमें अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अच्छे;सार्थक व मर्यादित शब्दों का मिलना असंभव प्रतीत होने लगा है जिसके कारण हमें निम्न स्तरीय;ओछे व अमर्यादित शब्दों की शरण लेनी पड़ रही है या फिर इन राजनेताओं की बुद्धि के स्तर में तेजी से पतन हुआ है क्योंकि यह कह देना कि मेरे बयान का गलत अर्थ निकाला गया है या उसे तोड़-मरोड़ के पेश किया गया है, महज़ एक वंचना मात्र है। शब्दों का जादूगर तो वह व्यक्ति होता है कि विरोधी चाहकर भी उसकी बात के अर्थ को अनर्थ ना कर सकें। हमने ऐसे शब्दों के जादूगरों को अपने ही देश में देखा है उन्हीं में से एक नाम है पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी। हमारे मनीषियों ने शब्द को ब्रह्म कहा है। शालीनता से; मर्यादित व कर्णप्रिय बोलना एक प्रकार से ब्रह्म की उपासना करना है वहीं असभ्यतापूर्ण;अमर्यादित व दूसरे को क्षोभ पहुंचाने वाला संभाषण उस ब्रह्म का निरादर है। शब्दों की एक खास ढंग से की गई जमावट ही तो मंत्र या वरदान कहलाती है और जब ये नहीं होती तो श्राप या गाली-गलौज बन जाती है। जो व्यक्ति इस सूक्ष्म विभेद को नहीं समझता उसे बोलने का कोई अधिकार नहीं है, कम से कम वक्ता होने का तो बिल्कुल भी नहीं। आज के दौर के ये सारे राजनेता भली भांति जानते हैं कि जो मीडिया इनकी छींक तक को राष्ट्रीय फलक पर लाकर सुर्खियां बटोर लेता है वो इनके बेतुके बयानों को क्या यूं ही नज़रअंदाज़ कर देगा; नहीं कदापि नहीं, फिर भी ये अपने निम्न स्तरीय व संकीर्ण मानसिकता वाले बयानों से खबरों में बने रहना चाहते हैं क्योंकि इन्हें सुना जाता है। जिस दिन इस देश की जनता अमर्यादित बयानबाजी करने वाले नेताओं को सुनना बंद कर देगी और मीडिया उन्हें उछालना रोक देगा उसी दिन से ये अमर्यादित वक्ता अपनी वाणी पर अंकुश लगाना प्रारंभ कर देंगें। आखिर किसी बेतुके बयान को बार-बार प्रसारित करने का क्या औचित्य? क्यों उसे इतना महत्व दिया जाता है। यदि एक बार किसी नेता ने मर्यादा लांघी तो उसका संपूर्ण बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता। क्यों उसकी एक "बाइट" के लिए पुनः मीडया लालायित रहता है? सच तो यह है कि मीडिया भी ऐसे मसालेदार बयानों की खोज में रहता है जिससे खबर ज़्यादा उत्तेजक बने परन्तु इन सबके कारण जो सामाजिक व सांस्क्रतिक नुकसान होता है उसकी भरपाई कौन करेगा। इस प्रकार गलत वस्तुओं को प्रवाह में डालने से अंततोगत्वा राष्ट्र व समाज की हानि ही होती है। होना तो यह चाहिए कि श्रेष्ठ को प्रवाहमान किया जाए और निक्रष्ट को रोका जाय जिससे देश की राजनीति में एक गलत परम्परा की शुरूआत होने से बचा जा सके।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

राष्ट्रीय अपमान

हाल ही में खबर आई थी कि बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने अमरीका प्रवास के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा से मोदी के वीज़ा को लेकर चर्चा करने वाले हैं। इसकी खबर लगते ही लोकसभा के ४० और राज्यसभा के २५ भारतीय सांसदों ने ओबामा को फैक्स कर मोदी को वीज़ा ना दिए जाने की अपील की है। मोदी के वीज़ा का विरोध करने में इतनी जल्दी तो वहां के सीनेटरों ने भी नहीं की जितनी जल्दबाजी में ये तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांसद दिख रहे हैं। यहां एक बात और विचारणीय है कि मोदी को अमरीका का वीज़ा मिलने से इन पर कौन सी आफत आ जाती, क्या ये अमरीका के हक में अपनी वफ़ादारी सिद्ध करना चाहते हैं या वहां की सीनेट का सदस्य बनना चाहते हैं। परन्तु मैं इन सांसदों व इनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी की मजबूरी समझ सकता हूं आखिर ये दल ज़िंदा ही हैं तुष्टिकरण की राजनीति पर। इन सांसदों के इस कदम  से विश्व में भारत की साख को क्षति पहुंची है, देश का अपमान हुआ है। दलगत राजनीति करना कोई बुरी बात नहीं और ना ही राजनीतिक मतभेद या विरोध करने में कुछ हानि है परन्तु अपने घर का झगड़ा किसी तीसरे को दिखाना ये अपने घर के साथ गद्दारी है। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की फ़िक्र करते हैं यदि किसी दिन इस देश में बहुसंख्यक एकजुट होकर वोट करने लगेगें तो फ़िर देखिए ये किस तरह अपने सुर व नीतियां बदलते हैं। हमारे देशवासियों को चाहिए कि इनकी सियासी चालों को समझें व इन्हें अपनी ओछी राजनीतिक बिसात बिछाने के लिए अवसर ना दें जिससे देश की अखंडता अक्षुण्ण रह सके।

शनिवार, 13 जुलाई 2013

अर्ज़ किया है.....

अब नहीं अटकता दिल दुपट्टे में
उम्र का अपना तकाज़ा होता है

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कहां तो मुश्किल था लम्हा तेरे बगैर
कहां गुज़ार दी देख ज़िंदगी हमने

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ज़ायका बिगाड़ गया सब्र का फल
हमने तो सुना था मीठा होता है

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अपने बदरंग लिबासों की फिक्र कौन करे
बे-पर्दा रूह का जब एहतराम हो निगाहों में

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वादों का टूटना तो सुना था अक्सर शेख
आजकल कोशिशें भी कामयाब नहीं होतीं

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ए पारस सा मिज़ाज़ रखने वाले
मैं संग सही छूकर मुझे नवाज़ दे

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 "इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
 मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

हरम-ऐशगाह
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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"

दाना-बुद्धिमान
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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
 जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"

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"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
 मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"


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"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
 गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकट 
गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
 रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
जुस्तजू-इच्छा;अभिलाषा

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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
 अदने से अश्क की बिसात ही क्या"


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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
 इतना आसां भी नहीं है आम होना"

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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"जाने इस नस्ल का अब क्या होगा
 सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"

जज़्ब-समाना
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ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है

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जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते

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हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं

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खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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आसान मश्गला ना समझो अशआरों को गढ़ लेना
सौ बार तराशे जाते हैं ये दिल में उतरने से पहले


मश्गला-कार्य
अशआर-काव्य पंक्तियां

-हेमन्त रिछारिया
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