शुक्रवार, 31 मई 2013

"कोई रिटायर हो गया है"

मित्रों, मन में कुछ भाव उमड़े तो उन्हें लिपिबद्ध करने के लिए मैं अपना पी.सी.चालू कर ही रहा था कि तभी कानों में ढोल-नगाड़ों और पटाखों की तेज़ आवाज़ गूंजी तो बच्चों की सी उत्सुकता से झट बालकनी में जाकर देखा तो फूलों से सजी गाड़ियों का एक लंबा काफ़िला चला जा रहा था। मैंने जब किसी से पूछा- "ये क्या माजरा है? तो जवाब मिला -"कोई रिटायर हो गया है।" उसके इस जवाब ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया मैं सोचने लगा कि आखिर रिटायर होकर ऐसी कौन सी विशेष बात कर दी गई है जो इतना हो-हल्ला मचाया जा रहा है। आखिर देश के लिए ऐसा कौन सा महान कार्य कर दिया गया, या समाज को ऐसी कौन सी नई दिशा दे दी गई जिसके लिए इस प्रकार ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकाला जा रहा है। फिर सोचा रिटायर होने वाला सोचता होगा कि इतना भ्रष्टाचार किया,इतने घोटाले किए,इतने फर्ज़ी आंकड़े दिए और सरकारी सुविधाओं का जमकर दुरूपयोग किया, पर कहीं पकड़े नहीं गए। शायद इसी का जश्न मना रहे हैं। आजकल रिटायर होने के बाद स्वरूचि भोज का चलन भी ज़ोरों पर है। ऐसे ही एक भोज में मुझे भी बे-मन से जाना पड़ा क्योंकि मेरे मित्र के पिताजी रिटायर हो गए थे, हालांकि उन्होंने भी कोई तीर नहीं मारा था रिटायर होकर जैसे सब होते हैं वैसे ही वे भी हो गए थे, बिल्कुल सहज व निर्लिप्त भाव से; कम से कम उन्होंने तो यही दिखाने का प्रयास किया था। अब ये बात और है कि उन्होंने "एक्सटेंशन" के भरपूर प्रयास किए थे पर जब नहीं मिला तो वे गीता के उपदेश "लाभालाभौ जयाजयो" को आत्मसात करते हुए निर्मोही भाव से रिटायर हो गए...,तो उस भोज में मैंने देखा कि वहां बाकायदा उन्हें शादी-विवाह की भांति कपड़े इत्यादि की भेंट दी जा रही थी। जहां तक मैं उन्हें जानता हूं वे शायद ही कभी समय पर अपने कर्तव्यस्थल पर उपस्थित हुए हों। लंच टाइम की अगर बात करें तो वे उसका इस कदर फायदा उठाते थे कि जितने वक्त में उनका भोजन होता उतने समय में एक छोटा-मोटा सहभोज निपट जाए। फिर भोजन के उपरांत अगर विश्राम नहीं किया तो क्या खाक "लंच" किया। ऐसी शैली की सेवा के उपरांत इस प्रकार विदाई सहज हज़म नहीं होती। ठीक है आपने इतने दिन जिन सहकर्मियों के साथ कार्य किया उनसे विदा लेते वक्त उन क्षणों का मार्मिक हो जाना स्वाभाविक है। अच्छा हो उसमें उन बातों को, उन व्यक्तियों को याद किया जाए जिन्होंने आपके जीवन पर कुछ सकारात्मक प्रभाव डाला। क्या कभी किसी अधिकारी ने रिटायर होते वक्त अपने "प्यून" को गले लगाकर उसका आभार प्रकट किया है, या उससे अपने सेवाकाल में अपने द्वारा जाने कितनी बार डांटे-फटकारे जाने के लिये क्षमाप्रार्थना की है? शायद किसी ने नहीं। क्योंकि अक्सर लोग इस अवसर का सही मूल्यांकन ही नहीं करते। करें भी कैसे आजकल की जीवन शैली में हार्दिक बातों को हमारे द्वारा सबसे निचले पायदान पर रखा जाता है और दिखावे व भौतिक चमक-दमक को सबसे ऊंचे पर। यदि आर्थिक संपन्नता के चलते उत्सव करना आवश्यक ही है तो अच्छा हो कि कुछ प्रकार का आयोजन किया जाए जिससे ज़रूरतमंदों को मदद मिले। क्यों ना इस अवसर किसी निशक्त बच्चे को पढ़ाने का, किसी गरीब कन्या के विवाह में सहयोग का, किसी बीमार के इलाज का संकल्प लिया जाए। मेरे देखे इस प्रकार के भौतिकतावादी उत्सव तो उचित नहीं। निश्चित कुछ लोग ज़रूर ऐसे होंगे जिनके कार्य इस प्रकार के उत्सव व आयोजनों के योग्य हों; उनके लिए ये होना भी चाहिए परन्तु हर रिटायर होने वाला इसे एक परंपरा की तरह निर्वहन करे ये एक गलत परंपरा की शुरूआत है।
-हेमन्त रिछारिया
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क्षमावाणी-
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(मेरे इस व्यंग्य से जिन भी रिटायर्ड सज्जनों को जाने-अनजाने में कोई ठेस पहुंची हो तो उसके लिए मैं ह्रदय से क्षमाप्रार्थी हूं। मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इस गलत परंपरा का विरोध करना है।)
-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 26 मई 2013

अर्ज़ किया है-

 "इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
 मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"

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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
 जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"

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"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
 मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"


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"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
 गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकट 
गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
 रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र

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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
 अदने से अश्क की बिसात ही क्या"

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"जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
 इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते"

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"हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
 लोगों को सच की आदत जो नहीं"

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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
 इतना आसां भी नहीं है आम होना"

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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"जाने इस मुल्क का अब क्या होगा
 सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"

-हेमन्त रिछारिया
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दुर्लभ चित्र

फ़िल्म कलाकरों के साथ भू.पू. प्रधानमन्त्री स्व. इन्दिरा गाँधी

रिक्त


रिक्त


रिक्त


शनिवार, 25 मई 2013

कुछ नए शेर...

"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकर  गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों की आरज़ू थी चांदनी बिखरे
रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
अदने से अश्क की बिसात ही क्या"


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"जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते"

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"हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं"


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"तुम छलकने का शिकवा ना करो
उसका पैमाना ही छोटा है"


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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना"


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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

-हेमन्त रिछारिया
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