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| बाबूजी |
सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
मंगलवार, 12 मार्च 2013
नक्षत्र पुरूष-"बाबूजी"
रविवार, 24 फ़रवरी 2013
ग़ज़ल
वक्त ने छोड़े हैं ऐसे अपने निशां
आईना देखते हैं तो डर जाते हैं
तू खुद को ना ख़तावार समझ
ये दीदें पराए गम से भर जाते हैं
तन्हा दीवारों से सिवा कुछ नहीं
कहने को हम भी "घर" जाते हैं
ताब-ए-सब्र पे यकीं है लेकिन
कुछ बोल हैं जो अखर जाते हैं
गुलों की दोस्ती में फा़सला रखना
नाज़ुक छुअन से बिखर जाते हैं
तेरा आस्तां ही अपनी मंज़िल है
लोगों से क्या कहें किधर जाते हैं
मादरे-वतन पे जिनको नाज़ नहीं
उनके अंजाम से सिहर जाते हैं
-हेमन्त रिछारिया
आईना देखते हैं तो डर जाते हैं
तू खुद को ना ख़तावार समझ
ये दीदें पराए गम से भर जाते हैं
तन्हा दीवारों से सिवा कुछ नहीं
कहने को हम भी "घर" जाते हैं
ताब-ए-सब्र पे यकीं है लेकिन
कुछ बोल हैं जो अखर जाते हैं
गुलों की दोस्ती में फा़सला रखना
नाज़ुक छुअन से बिखर जाते हैं
तेरा आस्तां ही अपनी मंज़िल है
लोगों से क्या कहें किधर जाते हैं
मादरे-वतन पे जिनको नाज़ नहीं
उनके अंजाम से सिहर जाते हैं
-हेमन्त रिछारिया
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
यौवन
यौवन क्या है? यह लपटों का संगम है
सरगम है ये अन्तर के तूफानों का,
यौवन अरमानों का सर्वोच्च शिखर है
है पुण्य-पर्व यह यौवन बलिदानों का।
क्या बात करें यौवन के दीवानों की
ज्वालामुखियों पर रास रचाते हैं वे,
देना पड़ता मस्तक तो दे देते वे
मस्तक देकर सम्मान बचाते वे।
-सरलजी
सरगम है ये अन्तर के तूफानों का,
यौवन अरमानों का सर्वोच्च शिखर है
है पुण्य-पर्व यह यौवन बलिदानों का।
क्या बात करें यौवन के दीवानों की
ज्वालामुखियों पर रास रचाते हैं वे,
देना पड़ता मस्तक तो दे देते वे
मस्तक देकर सम्मान बचाते वे।
-सरलजी
रविवार, 10 फ़रवरी 2013
नेताजी नहीं थे "गुमनामी बाबा"
कुछ दिनों पहले एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की बेटी अनीता बोस का साक्षात्कार प्रसारित किया गया। जब उनसे गुमनामी बाबा के नेताजी होने के संबंध में पूछा गया तो उनका उत्तर था-"मैं उनसे मिली थी और मैंने एक क्षण में ही यह जान लिया था कि वो मेरे पिता नहीं हैं।"
-संपादक (जैसा मैंने सुना)
-संपादक (जैसा मैंने सुना)
वनफूल
उपवन के सुमनों ने सम्मान सदा पाया
किसने जाना कब कौन कहा वनफूल खिला,
किसने जाना कब महका वह कब मुरझाया
कब बिखर धूल में वह अनदेखा फूल मिला।
इस भारत उपवन में जाने कितने वन-फूल खिले
वे अनदेखे-अनजाने ही चुपचाप झड़े,
माताओं के लाड़ले लाल जाने कितने
आज़ादी की मंज़िल के नीचे दबे पड़े।
-सरलजी
किसने जाना कब कौन कहा वनफूल खिला,
किसने जाना कब महका वह कब मुरझाया
कब बिखर धूल में वह अनदेखा फूल मिला।
इस भारत उपवन में जाने कितने वन-फूल खिले
वे अनदेखे-अनजाने ही चुपचाप झड़े,
माताओं के लाड़ले लाल जाने कितने
आज़ादी की मंज़िल के नीचे दबे पड़े।
-सरलजी
जय नाद
कर्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे
हर एक सांस को एक सबक यह याद रहे,
अपनी हस्ती क्या, रहें;रहें या नहीं रहें
यह देश रहे आजाद, देश आजाद रहे।
इस देह धर्म के नाते हमको जाना है
कुछ ऐसा करके जाएं अपनी याद रहे,
आज़ाद रहे; आज़ाद रहे धरती-माता
जग से गुंजित इस माता जय नाद रहे।
-सरलजी
हर एक सांस को एक सबक यह याद रहे,
अपनी हस्ती क्या, रहें;रहें या नहीं रहें
यह देश रहे आजाद, देश आजाद रहे।
इस देह धर्म के नाते हमको जाना है
कुछ ऐसा करके जाएं अपनी याद रहे,
आज़ाद रहे; आज़ाद रहे धरती-माता
जग से गुंजित इस माता जय नाद रहे।
-सरलजी
सिंह जननी
धूम धरती पर मचा विद्रोह का वरदान,
यहाँ मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।
सो गया उल्लास मेरा सो गया आमोद,
एक माँ की गोद तज कर; दूसरी की गोद।
ओज अन्तस कर यहाँ कर रहा विश्राम,
वत्स! तुमको क्या बता दूँ उस हठी का नाम?
लाल वह मेरा "भगत" था सिंह ही साकार,
जन्म से ही कहाया गया था वह सरदार।
गर्जना उसकी विकट सुन काँपते थे लाट,
निर्धना मैं; वह शहीदों का बना सम्राट।
सुन लिया क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?
यहाँ मेरी भावना का सो रहा आवेश।
- श्रीकृष्ण "सरल"
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