मंगलवार, 12 मार्च 2013

नक्षत्र पुरूष-"बाबूजी"

बाबूजी
जीवन में यूं तो हम बहुत से लोगों से मिलते हैं, पर उनमें से कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके दिल में उतरकर आपके जीवन को एक नई दिशा दे जाते हैं। ऐसे ही लोगों को हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा "बसेरे से दूर" में "नक्षत्र-पुरूष" कहा है। ऐसे ही एक नक्षत्र-पुरूष हैं-"बाबूजी" यानि श्री राधेश्यामजी रावल। जिन्हें हम सभी प्यार से "बाबूजी" कहते हैं। आपको बाबूजी से थोड़ा परिचित करा दूं। उम्र सत्तर वर्ष की करीब, लंबा कद,गठा हुआ संतुलित शरीर, कम बालों के कारण माथे पर चंद्र सी आभा है। आंखो पर चश्मा लगाते हैं और पेंट-शर्ट पहनते हैं। ज़्यादातर पैदल ही चलते हैं। उनकी मुस्कुराहट को देखकर मुझे किसी दार्शनिक की एक बात स्मरण हो आती है कि" अच्छे व्यक्तियों की सुंदरता बूढ़े होने पर भी विद्यमान रहती है बस ये उनके चेहरे से उतरकर उनके दिल में आ जाती है"। सादा-जीवन;उच्च विचार की जीवन्त प्रतिमूर्ति हैं "बाबूजी"। जीवन में कड़ा अनुशासन,असीम परोपकार से लबरेज़ जीवन शैली के धनी। वे जब तक यहां रहे हर सामाजिक कार्य में भागीदारी करते रहे। परोपकार को ही अपना धर्म माननेवाली कई संस्थाओं से उनका निकट का सम्बन्ध था। वे एक सच्चे स्वयंसेवक हैं। मैंने अपने जीवन में ऐसे बिरले ही देखें हैं जो इतनी विद्वता के साथ इतना सहज हो सकें। उनसे जब भी हम किसी विषय में कोई प्रश्न करते और यदि उन्हें पूरा पता नहीं है तो वे अत्यंत सहज स्वर में प्रतिउत्तर देते कि "मुझे इस विषय में जानकारी नहीं है, या कम है"। उनकी समय की पाबन्दी तो देखते ही बनती है, उनके समय संबधी अनुशासन से आप घड़ी मिला सकते हैं। छोटी-छोटी गोष्ठियों का उन्हें बड़ा शौक है। वे आए दिन अपने निवास पर गोष्ठियां आयोजित करते रहते हैं। गोष्ठी का निमंत्रण देने वे स्वयं उस मित्र के घर तक जाते हैं जिसे वे आमंत्रित कर रहे हों। एक बार मैंने उनसे निवेदन किया कि "बाबूजी मोबाइल का ज़माना है आप फोन कर दिया करो।" तो उनका उत्तर था कि "ये शिष्टाचार के नियमों के विरूद्ध है।" वे स्वयं अपने हाथों से स्वल्पाहार भी परोसते। "बाबूजी" बहुत अच्छा गाते हैं। हारमोनियम भी खुद ही बजाते हैं। श्रेष्ठ साहित्य में उनकी रूचि है। उनकी डायरी में कई कवियों की उत्क्रष्ट रचनाओं है। उनके पास अत्यंत दुर्लभ श्रेष्ठ साहित्य का विशाल संग्रह है। जिसे वे मित्रों के लिए सदा उपलब्ध रखते। ये समझ लीजिए कि वे निजी तौर पर एक पुस्तकालय ही चलाते हैं जो पूर्णतः निशुल्क है। ना जाने कितने मित्रों को उन्होंने श्रेष्ठ पुस्तकों से परिचित करवाया है। खैर... मिलना-बिछुड़ना तो जीवन-धारा का ही एक रूप है जिसमें प्रिय का मिलन और विछोह; नदी-नाव-संयोग की तरह ही होता है। जिसे हमें स्वीकार करना होता है। "बाबूजी" हमारे दिल में सदा बसे रहेंगे। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि वो हम सबके प्यारे "बाबूजी" को दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करे।

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल

वक्त ने छोड़े हैं ऐसे अपने निशां
आईना देखते हैं तो डर जाते हैं

तू खुद को ना ख़तावार समझ
ये दीदें पराए गम से भर जाते हैं

तन्हा दीवारों से सिवा कुछ नहीं
कहने को हम भी "घर" जाते हैं

ताब-ए-सब्र पे यकीं है लेकिन
कुछ बोल हैं जो अखर जाते हैं

गुलों की दोस्ती में फा़सला रखना
नाज़ुक छुअन से बिखर जाते हैं

तेरा आस्तां ही अपनी मंज़िल है
लोगों से क्या कहें किधर जाते हैं

मादरे-वतन पे जिनको नाज़ नहीं
उनके अंजाम से सिहर जाते हैं

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

यौवन

यौवन क्या है? यह लपटों का संगम है
सरगम है ये अन्तर के तूफानों का,
यौवन अरमानों का सर्वोच्च शिखर है
है पुण्य-पर्व यह यौवन बलिदानों का।

क्या बात करें यौवन के दीवानों की
ज्वालामुखियों पर रास रचाते हैं वे,
देना पड़ता मस्तक तो दे देते वे
मस्तक देकर सम्मान बचाते वे।
-सरलजी

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

नेताजी नहीं थे "गुमनामी बाबा"

कुछ दिनों पहले एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की बेटी अनीता बोस का साक्षात्कार प्रसारित किया गया। जब उनसे गुमनामी बाबा के नेताजी होने के संबंध में पूछा गया तो उनका उत्तर था-"मैं उनसे मिली थी और मैंने एक क्षण में ही यह जान लिया था कि वो मेरे पिता नहीं हैं।"
-संपादक (जैसा मैंने सुना)

वनफूल

उपवन के सुमनों ने सम्मान सदा पाया
किसने जाना कब कौन कहा वनफूल खिला,
किसने जाना कब महका वह कब मुरझाया
कब बिखर धूल में वह अनदेखा फूल मिला।

इस भारत उपवन में जाने कितने वन-फूल खिले
वे अनदेखे-अनजाने ही चुपचाप झड़े,
माताओं के लाड़ले लाल जाने कितने
आज़ादी की मंज़िल के नीचे दबे पड़े।
-सरलजी

जय नाद

कर्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे
हर एक सांस को एक सबक यह याद रहे,
अपनी हस्ती क्या, रहें;रहें या नहीं रहें
यह देश रहे आजाद, देश आजाद रहे।

इस देह धर्म के नाते हमको जाना है
कुछ ऐसा करके जाएं अपनी याद रहे,
आज़ाद रहे; आज़ाद रहे धरती-माता
जग से गुंजित इस माता जय नाद रहे।
-सरलजी

सिंह जननी



धूम धरती पर मचा विद्रोह का वरदान,
यहाँ मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।
सो गया उल्लास मेरा सो गया आमोद,
एक माँ की गोद तज कर; दूसरी की गोद।

ओज अन्तस कर यहाँ कर रहा विश्राम,
वत्स! तुमको क्या बता दूँ उस हठी का नाम?
लाल वह मेरा "भगत" था सिंह ही साकार,
जन्म से ही कहाया गया था वह सरदार।

गर्जना उसकी विकट सुन काँपते थे लाट,
निर्धना मैं; वह शहीदों का बना सम्राट।
सुन लिया क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?
यहाँ मेरी भावना का सो रहा आवेश।

- श्रीकृष्ण "सरल"