शनिवार, 1 जनवरी 2011

भोर की उजास


भोर की उजास हो
मन में उल्लास हो
गम का प्रवास हो
खत्म ना मधुमास हो
विजय हर संघर्ष करें
हो जीवन में उत्कर्ष
मंगलमय हो आपका
आगामी नूतन वर्ष...!

-हेमंत रिछारिया

नव वर्ष की शुभकामना

नए के आगमन के लिये पुराने का विदा होना आवश्यक है क्योंकि पुराने के स्थान पर ही नए का अवतरण होता है। प्रक्रति ने हर वस्तु की आयु निर्धारित की है और आयु पूर्ण होने पर उसका नष्ट होना स्वाभाविक है। अस्तित्व की समस्त वस्तुओं का एक नियत समय होता है जब वे अपने पूर्ण यौवन पर होती हैं तत्पश्चात उनकी जरावस्था प्रारंभ हो जाती है और फिर एक दिन वे उसी में विलीन हो जातीं है जिससे उनका उद्गगम हुआ है। जन्म, व्रध्दि और क्षय प्रक्रति के तीन अनिवार्य नियम है। समस्त जड़ व चेतन इन्हीं नियमों के अधीन है, इसलिए हमें सदा पुराने की विदाई के लिये राजी रहना चाहिए। परन्तु इसका यह आशय कतई नहीं कि हम पुराने को विस्म्रत कर दें क्योंकि यदि हम अपने अतीत को भुला देंगें तो भविष्य भी हमें याद नहीं रखेगा। हमें अतीत को याद तो रखना चाहिए पर अतीत से संबंध नहीं। हमारा संबंध तो सदा वर्तमान से होना चाहिए क्योंकि जीवन अभी, यहीं और इसी क्षण में है। यदि मंज़िल प्राप्त करना है तो उसके लिए एक कदम आगे बढाने के साथ ही दूसरा कदम पीछे से उठाना भी आवश्यक है तभी गति संभव है, चाहे मनुष्य की हो या प्रक्रति की।
तो आइए कोशिश करें कि जिस हर्षोउल्लास के साथ हम नए का स्वागत करते हैं उसी हर्षोउल्लास के साथ पुराने को विदा दे सकें।

"सरल-चेतना" के सभी पाठकों को नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
-हेमंत रिछारिया(संपादक)

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

फैसले ने खींचा नकाब


३० सितंबर को राम जन्मभूमि विवाद पर आए उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने जहां सांप्रदायिक सौहाद्र;राष्ट्रीय एकता और उदारवादिता की कलई खोल दी वहीं कई राजनेताओं के चेहरों को बेनकाब कर दिया। उच्चतम न्यायालय में फैसला सुनाए जाने के पक्ष में दोनों पक्षकरों की ओर से यह दलील दी गई थी कि देश की जनता अब परिपक्व हो चुकी है इसलिए ६० वर्षों से लंबित इस विवाद पर फैसला सुना दिया जाना चाहिए। परंतु मैं यदि उच्चतम न्यायालय में वकील के रूप में उपस्थित होता तो निवेदन करता कि इस फैसले को स्थगित रखा जाए क्योंकि देश की जनता भले ही परिपक्व हो चुकी है परंतु देश की राजनीति और राजनेता अभी तक अपरिपक्व हैं। फैसले से पूर्व एक न्यूज़ चैनल पर अमन की दुहाई देने वाले ५ लाख मस्ज़िदों के इमामों के रहनुमा ने चंद घंटो बाद ही उच्च न्यायालय के फैसले पर नाखुशी ज़ाहिर करते हुए उच्चतम न्यायालय जाने की बात कह दी। कैसे ज़फरयाब जिलानी साहब जो बा-आवाज़े-बुलंद फैसले के सम्मान की पैरवी करते थे फैसले के बाद यह कहते नज़र आए कि " फैसला हमारी उम्मीद के मुताबिक नहीं आया। हम उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती देंगे।" वहीं अपने नाम के ठीक उलट एक राजनेता ने अपने कठोर वक्तव्य में यह तक कह दिया कि मुस्लिम संप्रदाय ठगा गया है। इन्हीं राजनेता के वफादार साथी;जो अब इनकी बेवफा़ई के किस्से मीडिया में बडे़ ही तल्ख़ सुरों में बयान करते हैं; वे भी इस मसले पर इनके सुर में सुर मिलाते नज़र आए। बहरहाल, मैं फैसले पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने का अपने आपको अधिकारी नहीं पाता हूं परंतु इस देश का नागरिक होने के नाते अपनी एक राय अवश्य रखता हूं जो यह है कि यह फैसला सांप्रदायिक सौहाद्र और राष्ट्रीय एकता की दिशा में बड़ा ही सार्थक कदम है। इस फैसले से जहां एक ओर सुलह और समझौते के स्पष्ट संकेत मिलते हैं वहीं धर्म और जात-पात की कुरीतियों पर भी यह कुठाराघात करता है। फैसले से साफ स्प्ष्ट है कि किस पक्ष को उदारवादिता दिखाना चाहिए और किस पक्ष को उस उदारवादिता को अपनी जीत ना मानकर संयम से दूसरे पक्ष का आभार मानना चाहिए। एक आम नागरिक होने के नाते मैं इस फैसले से संतुष्ट हूं और इस फैसले का सम्मान करता हूं। कमोबेश यही भावना आज हर एक देशवासी की है। परंतु फिर भी वोट बैंक की राजनीति करने वाले अपने घ्रणित इरादों में कामयाबी के लिए इसे भी अपनी नापाक राजनीति का हिस्सा बनाकर ही दम लेंगे। क्या ये मुमकिन नहीं कि अयोध्या में एक भव्य राममंदिर का निर्माण हो जिसमें नींव का पत्थर हमारे मुस्लिम भाइयों के हाथों से रखा जाए। बेशक मुमकिन है जब मुस्लिम कवि रसखान भगवान क्रष्ण के गोकुल की गाय बनने कि चाहत रखते हों तो यह क्यों नहीं हो सकता। आज भी हमारे शहर नर्मदापुरम (होशंगाबाद) में रामजी बाबा और मुहम्मद शाह गौरी की दोस्ती की अमर परंपरा मौजूद है जहां रामजी बाबा मेले की शुरूआत बाबा की समाधिस्थल की चादर के मुहम्मद शाह गौरी की दरगाह पर चढाए जाने और दरगाह से लाए झंडे (निशान) के मंदिर पर चढाए जाने के बाद होती है। ऐसी एक नहीं हज़ारों नज़ीरें हैं । परंतु यह तभी संभव है जब हम किसी सियासी बहकावे में ना आकर अपनी आने वाली पीढियों के बारे में विचार करें। उन्हे एक स्वस्थ अतीत और प्रेमपूर्ण परंपरा प्रदान करने की दिशा में अपने कदम बढाएं। आज यह सब एक ख़्वाब सा प्रतीत होता है पर रामलला से मेरी यही प्रार्थना है कि एक बार यह ख़्वाब सच हो जाए। किसी शायर ने क्या खूब कहा है-
" क्या क्या बनाने आए थे;क्या क्या बना बैठे
कहीं मंदिर तो कहीं मस्ज़िद बना बैठे,
हम से अच्छी तो परिन्दों की ज़ात है
कभी मंदिर पे जा बैठे;कभी मस्ज़िद पे जा बैठे|"
- हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 9 मार्च 2010

मेरे दोहे अनुभूति पर


निकले थे घर से कभी, हम सपनों के साथ
इक-इक करके राह में, सबने छोडा हाथ

प्यारी दैरो-हरम से,तेरी ये दहलीज़
मैंने तेरे नाम का, डाल लिया ताबीज़

रखने की गुलदान में, मत करना तुम भूल
नहीं महक सकते कभी, कागज़ के ये फूल

अब ये देखें बीच में, कौन हमारे आय
हम तो बैठे हैं यार, तुझको खुदा बनाय

रोके से रुकता नहीं, करता मन की बात
हम लाचार खड़े रहें, मन की ऐसी जात

कल मुझसे टकरा गई, इक नखराली नार
अधर पांखुरी फूल की, चितवन तेज कटार

तुमने छेड़ा प्यार का, ऐसा राग हुज़ूर
सदियों तक बजता रहा, दिल का ये संतूर

देखो ये संसार है, या कि भरा बाज़ार
संबंधों के नाम पर, सभी करें व्यापार

दुई रोटी के वास्ते, छोड़ दिया जब गांव
भरी दुपहरी यार क्यूं, ढूंढ रहे हो छांव

लौट बराती सब चले, अपने-अपने गांव
रुके रहे देहरी पर, रोली वाले पांव

तुमने अपने प्रेम का, डाला रंग;अबीर
घर बारै मैं आपना, होता गया कबीर

सच से होगा सामना, तो होगा परिवाद
बेहतर है कि छोड़ दो, सपनों से संवाद

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 8 मार्च 2010

फिल्म समीक्षा-"पा"


कल सुबह जब देश-दुनिया का हाल जानने के लिये जब अख़बार पर नज़र डाली तो निगाहें बरबस ही एक विग्यापन पर अटक गई। विग्यापन था फिल्म "पा" के बारे में जो शाम ५:३० बजे स्टार-प्लस पर प्रदर्शित होने वाली थी। यदा-कदा ही इस फिल्म के प्रोमो देखकर इतना तो यकीं हो ही गया था कि "पा" एक देखने लायक फिल्म है। पर जब शाम ५:३० बजे चाय की चुस्कियों के बीच जब यह फिल्म देखी तो मन आर.बाल्की; जो इस फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं और अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन के प्रति नतमस्तक हो गया। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में बहुत ही उम्दा काम किया है। गहन संवेदनाओं; संदेशों और भरपूर मनोरंजन से लबरेज़ "पा" नि:संदेह ही सिने जगत की महानतम फिल्मों में से है। जहां तक अमित जी का सवाल है तो उम्र के इस पड़ाव पर १३ साल के बीमार बच्चे का जीवंत अभिनय कर पाना यदि किसी की सामर्थ्य में है तो बस इस महानायक के। भारतीय सिनेमा जगत में सैकड़ों निर्माता-निर्देशक है पर लीक से हटकर स्वस्थ और संदेशात्मक तस्वीर बनाने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। यहां मैं याद करना चाहूंगा फिल्म "ब्लैक" के निर्देशक संजयलीला भंसाली को, और "तारे ज़मीन पर" के लिये आमिर खान को इस प्रकार की फिल्में भारतीय सिने जगत को एक विशिष्टता प्रदान करतीं हैं। कुछ ही निर्माता निर्देशक ऐसे हैं जो व्यवसाय के आधार पर फिल्में ना बनाकर सामाजिक सुधार और सकारात्मक परिवर्तन के लिये फिल्में बनाते हैं। यहां यदि दि-ग्रेट शो मैन राजकपूर साहब को याद नहीं किया जाये तो यह अन्याय होगा। "प्रेम-रोग" जैसी फिल्म के जरिये उन्होने विधवा विवाह का जो संदेश दिया उसे भला कौन भूल सकता है। एक समय था जब ऐसी फिल्में बाक्स-आफिस पर औंधे मुंह गिरा करतीं थी परिणामस्वरूप भविष्य में कोई निर्माता-निर्देशक कबीर की जमात में शामिल होने की हिम्मत नहीं करता था। पर अच्छी बात है कि अब समय बदल रहा है अब ऐसी फिल्मों को दर्शक भी मिल रहे हैं और सम्मान भी लिहाज़ा अब कई निर्माता-निर्देशक इस ओर अपना ध्यान दें रहे हैं। आज समाज को स्वस्थ व अच्छे मनोरंजन की आवश्यकता है। जो उनके विकास में सहभागी हो सके, उनका मार्गदर्शन कर सके। "पा" इसी क्रम की एक बेहतरीन फिल्म है। इसके लिये मैं एक बार पुन: आर.बाल्की और अमिताभ बच्चन जी का ह्रदय से आभारी हूं, और उम्मीद करता हूं कि जल्द ही हमें ऐसी एक और फिल्म देखने को मिलेगी।

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 1 मार्च 2010

ऐसे खेलें फाग


आओ सखि हम तुम मिल खेलें, ऐसे अबके फाग
धो लें सारे द्वेष ह्रदय के, धो लें सारे राग।

लाज का अवगुंठन मुख पर, धरोगे आखिर कब तक
पांव तुम्हारे भी थिरकेंगे, जब छिड़ेंगे मेरे राग।

लाख करो मनुहार भले, बैंया ना छोडूंगा
व्यर्थ बहाने करके तुम, जाती हो जी भाग।

रंगो की बौछार चहुंदिस, अंबर पे लाली छाई
बूंदो का ले रूप झर रहा, नित नूतन अनुराग।

तेरे मेरे अधर मिलें, तो लगता ऐसे
चूम कली को ले उड़ जाए, जैसे भंवर पराग।

यौवन जब रंग में भीगे, कोई कैसे मन समझाए
उलझी अलकें; तिरछी पलकें, आग लगे है आग।

दिनकर चढ़ा मुंडेर, द्वार खड़े हुरियारे
कहे मैया ओ मूढ़मति, अब तो सपनों से जाग।

-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

कविता

नेह ने देह में सेंध दई
अंखियान को रंग अबीरी भयो,
तन तो तन है मन की का कहैं
असरीरी हू थो सो सरीरी भयो,
गहि गैल में चूम लियो नंदलाल ने
हाय वह वहरीरी भयो,
सब चाखन कूं लालच फिरें
जैसे गोरी को गाल पंजीरी भयो।
-आत्मप्रकाश शुक्ल