हो रहे हो तुम विदा तो यूं लगा जैसेफूल से खुशबू विदाई ले रही है
हैं बहुत खामोश बुलबुल के तराने
अनमनी सी चाह की सब तितलियाँ है
जल ह्र्दय के ताल का ठहरा हुआ है
सुप्त भावों की हज़ारों मछलियाँ हैं
और हर इक याद बनकर नववधू अब
आंसुओं की मुँह दिखाई ले रही है
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जो मिला उसको बिछडना ही पडा है
प्रीति के घर की रही ये ही प्रथाएँ
आ गई मन की व्यथाएँ शब्द बनकर
बन गई गीत बिछुडन की कथाएँ
गीत लिख्नने के लिये मन की कलम अब
आंसुओं की रोशनाई ले रही है!

सफलता के गगन छूकर धरा पर लौट आएंगे

