शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

जन्मपत्रिका में ज्योतिषी बनने के योग

 

आज जैसे-जैसे विज्ञान प्रगति के सोपान चढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ज्योतिष व विज्ञान का फ़ासला कम होता जा रहा है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आने वाले कुछ दशकों में ज्योतिष विज्ञान के रूप में प्रसिद्धि पा लेगा लेकिन यह तभी सम्भव है जब श्रेष्ठ व विद्वान ज्योतिषीगण ज्योतिष कार्य को रूढ़िगत सिद्धान्तों एवं व्यावसायिक मापदण्डों से ऊपर उठकर अनुसंधनात्मक एवं शोधपरक रूप में करें। क्या यह योग्यता हर ज्योतिषी को अनिवार्यरूपेण प्राप्त हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भी हमें ज्योतिशास्त्र में ही मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में एक श्रेष्ठ ज्योतिषी या भविष्यवक्ता बनने के कुछ विशेष योगों व ग्रहस्थितियों का उल्लेख हमें प्राप्त होता है। यह विशेष ग्रहस्थितियां व योग यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में हों तो वह एक श्रेष्ठ व अनुसंधानात्मक ज्योतिष कार्य करने वाला ज्योतिषी होता है। किसी भी ज्योतिषी की पत्रिका का विश्लेषण कर यह पता लगाया जा सकता है कि उसमें भविष्यकथन करने की योग्यता है भी या नहीं। एक आध्यात्मिक व श्रेष्ठ ज्योतिषी की पहचान उसकी जन्मपत्रिका में स्थित ग्रहों की विशेष स्थिति से सरलता से की जा सकती है। आईए जानते हैं कि वे कौन से ग्रह, योग व ग्रहस्थितियां होती हैं जिनके फलस्वरूप जातक एक श्रेष्ठ भविष्यवक्ता बन सकता है।
 
गुरू की शुभ स्थिति-
श्रीमद्भगवदगीता में कहा गया है "गहना कर्मणो गति:" अर्थात् कर्म की गति गहन है। मनुष्य के संचित कर्मों से ही "प्रारब्ध" का निर्माण होता है। जातक को जन्मपत्रिका में जो भी शुभाशुभ योग व ग्रहस्थितियां प्राप्त होती हैं वे सभी पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम होती हैं। कर्म के सिद्धान्त को समझ पाना एक दुष्कर कार्य है जो बिना विवेक के असम्भव है। ज्योतिष शास्त्र में गुरू को बुद्धि, विवेक व अध्यात्म का प्रतिनिधि ग्रह माना गया है। अत: एक श्रेष्ठ ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में गुरू की शुभ स्थिति होना अनिवार्य है। एक विद्वान ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में गुरू का केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ, स्वग्रही, उच्चग्रही, उच्चाभिलाषी ग्रह होना आवश्यक है। गुरू की शुभ स्थिति के बिना कोई भी जातक अच्छा ज्योतिषी नहीं बन सकता। 

बुध की शुभ स्थिति-

ज्योतिष शास्त्र में बुध को वाणी का नैसर्गिक कारक माना गया है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी के लिए वाक् सिद्धि होना आवश्यक है। बिना वाणी को सिद्ध किए कोई भी जातक एक सफल भविष्यकवक्ता नहीं बन सकता। वाक् सिद्धि के लिए बुध का शुभ स्थिति में होना अनिवार्य है। बुध की शुभ स्थिति के लिए बुध का जन्मपत्रिका में केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ व उच्चराशिस्थ या उच्चाभिलाषी होना आवश्यक है।

सूर्य की शुभ स्थिति-

ज्योतिष शासत्रानुसार सूर्य आत्मा का कारक है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी तब तक आध्यात्मिक रूप से समृद्ध नहीं होगा जब तक की उसकी जन्मपत्रिका में सूर्य की शुभ स्थिति नहीं होगी। आध्यात्मिक ज्योतिषी के लिए सूर्य का केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ व उच्चराशिस्थ या उच्चाभिलाषी होना आवश्यक है।

बुध-गुरू का सम्बन्ध-

ज्योतिष शास्त्र के नियमानुसार बुध एवं गुरू के परस्पर प्रबल सम्बन्ध के बिना कोई जातक श्रेष्ठ भविष्यवक्ता नहीं बन सकता। विद्वान भविष्यवक्ता की जन्मपत्रिका में बुध व गुरू का पारस्परिक सम्बन्ध होना अनिवार्य है। ये सम्बन्ध चार प्रकार से क्रमश: प्रबलता प्राप्त करता है-

1. बुध-गुरू की युति

2. बुध-गुरू का दृष्टि सम्बन्ध

3. बुध-गुरू अधिष्ठित राशिस्वामी का दृष्टि सम्बन्ध

4. बुध-गुरू का परस्पर राशि परिवर्तन सम्बन्ध

पंचम् भाव एवं पंचमेश- 

जन्मपत्रिका के पंचम् भाव को उच्चशिक्षा एवं विवेक का प्रतिनिधि भाव माना जाता है। पंचम् भाव का अधिपति विवेक व बुद्धि का तात्कालिक कारक होता है। एक अच्छे ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में पंचमेश का शुभ भावों में स्थित होना आवश्यक है एवं पंचम् भाव पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। 

अष्टम् भाव व केतु की भूमिका भी महत्तवपूर्ण-

ज्योतिष शास्त्रानुसार केतु को मोक्ष का कारक माना गया है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी तभी सटीक भविष्यवाणी कर सकता है जब उसे पराविज्ञान का लाभ मिले। जन्मपत्रिका का अष्टम् भाव आयु के साथ-साथ पराविद्याओं का भी होता है यदि अष्टम् भाव का सम्बन्ध किसी प्रकार से भी केतु से हो तो ऐसे जातक को पराविद्या का लाभ किसी वरदान की तरह प्राप्त होता है। इस योग के फलस्वरूप वह जातक सटीक भविष्यसंकेत करने में सक्षम होता है।

उपर्युक्त ज्योतिषीय विवेचन के आधार पाठकगण यह भलीभांति समझ चुके होंगे कि ऊपर वर्णित ग्रहस्थिति के बिना कोई भी जातक श्रेष्ठ व प्रामाणिक ज्योतिषी नहीं बन सकता है। यहां पाठकों को यह बताना लाभदायक होगा कि हमारी जन्मपत्रिका में ऊपर वर्णित ग्रहस्थितियों में से अधिकांश ग्रहस्थितियां (प्रत्येक सिद्धान्त में से एक अवश्य उपस्थित) निर्मित हुई हैं। मुझे विश्वास है कि अब ज्योतिष-शास्त्र की प्रामाणिकता का निर्णय आप सभी सुधि पाठकगण भलीभांति कर सकेंगे।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com 


शनिवार, 21 नवंबर 2020

क्या करें जब मिले ना शुभ मुहूर्त्त!

हमारे सनातन धर्म में किसी भी कार्य के लिए शुभ व शुद्ध मुहूर्त्त की अनिवार्य आवश्यकता बताई गई है; विशेषकर विवाह,गृहप्रवेश,गृहारम्भ, मुण्डन, द्विरागमन आदि में, किन्तु कई बार ऐसी ग्रहस्थितियों का निर्माण हो जाता है कि अपेक्षानुसार हमें शुभ व शुद्ध मुहूर्त्त नहीं मिल पाता है। ऐसी परिस्थिति में मन दुविधाग्रस्त हो किंतर्व्यविमूढ़ हो जाता है। इस संशयग्रस्त स्थिति से निपटने के लिए हमारे शास्त्रों में कुछ विशेष मुहूर्त्त का उल्लेख है जिनमें विशेष दिन के अनुसार बनते है एवं इन मुहूर्त्तों में अन्य किसी ग्रहस्थिति का परीक्षण करने की आवश्यकता ही नहीं होती केवल इन दिनों का होना ही पर्याप्त होता है। ऐसे विशेष मुहूर्त्तों को हमारे मुहूर्त्त-शास्त्र में "साढ़े तीन मुहूर्त्त", "स्वयंसिद्ध मुहूर्त्त" या "अबूझ मुहूर्त्त" के नाम से जाना जाता है। आज हम "सरल-चेतना " के पाठकों को इन "अबूझ" मुहूर्त्तों के विषय में जानकारी देंगे। इन मुहूर्त्तों की संख्या प्रतिवर्ष "साढ़ेतीन" की होती है इसलिए इन्हें लोकाचार की भाषा में "साढ़ेतीन" मुहूर्त्त भी कहा जाता है। कुछ विद्वान "रविपुष्य" व "गुरूपुष्य" को भी इस श्रेणी में मान्य करते हैं किन्तु हम यहां स्पष्ट कर दें कि शास्त्रानुसार "रविपुष्य" एवं "गुरूपुष्य़" अबूझ मुहूर्त्त की श्रेणी में नहीं आते हैं।

आईए जानते हैं कि ये "साढ़े तीन" या "अबूझ" मुहूर्त्त कौन से होते हैं-

 "स्वयंसिद्ध मुहूर्त्त" या "अबूझ मुहूर्त्त"

1. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा/चैत्र नवरात्रि घट स्थापना/हिन्दू वर्षारम्भ)

2. वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया/अखातीज)

3. आश्विन शुक्ल दशमी (विजयादशमी/दशहरा)

4. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का अर्द्धभाग

उपर्युक्त मुहूर्त्तों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वैशाख शुक्ल तृतीया, आश्विन शुक्ल दशमी पूर्ण दिवस एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का अर्द्धभाग शुभ होने से इन्हें "साढ़े तीन" मुहूर्त्त भी कहा जाता है।

विवाह मुहूर्त्त में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष नियम-

शास्त्रानुसार "स्वयंसिद्ध" या "अबूझ" मुहूर्त्त के अतिरिक्त विवाह में कार्तिक पूर्णिमा को विशेष मुहूर्त्त के तौर पर मान्य किया जाता है। जब विवाह का शुद्ध मुहूर्त्त ना बन पा रहा तो कार्तिक पूर्णिमा के पूर्व व पश्चात् के पांच दिन विवाह के लिए उपयुक्त माने गए हैं। यहां तक कि कुछ विद्वानों ने तो इन मुहूर्त्तों में त्रिबल शुद्धि व गुरू-शुक्रास्त को भी विचारणीय नहीं माना है लेकिन यह मुहूर्त्त केवल "आपातकाले मर्यादा नास्ति..." के सिद्धान्त अनुसार कुछ विशेष परिस्थितियों में ही ग्राह्य होते हैं।

 "गोधूलि लग्न" की ग्राह्यता-

मुहूर्त्त शास्त्र में "गोधूलि" लग्न को "स्वयंसिद्ध" मुहूर्त्त के तौर पर मान्यता प्रदान की गई है। जब विवाह का दिन सुनिश्चित हो जाए और पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न की प्राप्ति ना हो तो "गोधूलि" लग्न की ग्राह्यता शास्त्रानुसार बताई गई है। "गोधूलि लग्न" सूर्यास्त से 12 मिनिट पूर्व एवं पश्चात् कुल 24 मिनिट अर्थात् 1 घड़ी की होती है, मतान्तर से कुछ विद्वान से इसे सूर्यास्त से 24 मिनिट पूर्व व पश्चात् कुल 48 मिनिट का मानते हैं लेकिन शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि "गोधूलि लग्न" की ग्राह्यता केवल आपात परिस्थिति में ही होती है जहां तक सम्भव हो शुद्ध लग्न को ही प्राथमिकता देना चाहिए।

 -ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

 

 

 

विवाह में शुद्ध लग्न का चयन कैसे करें?

 

विवाह हमारे षोडश संस्कारों में एक महत्त्वपूर्ण संस्कार माना गया है। जीवनसाथी के बिना व्यक्ति का जीवन अधूरा माना जाता है। विवाह योग्य आयु होने एवं उपयुक्त जीवनसाथी के चुनाव के पश्चात अक्सर माता-पिता को अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह के मुहूर्त्त को लेकर बड़ी चिन्ता रहती है। सभी माता-पिता अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह श्रेष्ठ मुहूर्त्त में सम्पन्न करना चाहते हैं। विप्र एवं दैवज्ञ के लिए भी विवाह मुहूर्त्त का निर्धारण करना किसी चुनौती से कम नहीं होता है। विवाह मुहूर्त्त के निर्धारण में कई बातों का विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक होता है। शास्त्रानुसार श्रेष्ठ मुहूर्त्त कई प्रकार के दोषों को शमन करने में समर्थ होता है। अत: विवाह के समय पाणिग्रहणसंस्कार की लग्न का निर्धारण बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए। विवाह लग्न का निर्धारण करते कुछ बातों एवं ग्रहस्थितियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों को विवाह लग्न के निर्धारण से जुड़ी कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी देंगे।

पाणिग्रहण संस्कार की लग्न शुद्धि हेतु निम्न बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

1. विवाह लग्न का चुनाव करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि विवाह लग्न वर अथवा कन्या के जन्म लग्न व जन्मराशि से अष्टम राशि का ना हो।

2. विवाह लग्न के निर्धारण में यदि लग्न में जन्मलग्न के अष्टमेश की उपस्थिति हो तो उस लग्न को त्याग दें। विवाह लग्न में जन्मलग्न के अष्टमेश का होना अति-अशुभ होता है।

3. विवाह लग्न में "लग्न भंग" योग नहीं होना चाहिए। विवाह लग्न से द्वादश भाव में शनि, दशम भाव में मंगल, तीसरे भाव में शुक्र, लग्न में पापग्रह या क्षीण चन्द्रमा स्थित नहीं होना चाहिए।

4. विवाह लग्नेश, चन्द्र व शुक्र अशुभ अर्थात 6, 8, 12 भाव में नहीं होने चाहिए।

5. विवाह लग्न में सप्तम व अष्टम भाव ग्रहरहित होने चाहिए।

6. विवाह लग्न कर्त्तरी योग से ग्रसित नहीं होना चाहिए।

7. विवाह लग्न अन्ध, बधिर या पंगु नहीं होना चाहिए। मेष, वृषभ, सिंह, दिन में अन्ध, मिथुन,कर्क,कन्या रात्रि में अन्ध, तुला, वृश्चिक दिन में बधिर, धनु,मकर रात्रि में बधिर, कुम्भ दिन में पंगु, मीन रात्रि में पंगु लग्न होती हैं किन्तु ये लग्न अपने स्वामियों या गुरू से दृष्ट हों तो ग्राह्य हो जाती हैं।

गोधूलि-लग्न की ग्राह्यता-

जब विवाह में पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न की प्राप्ति ना हो तो "गोधूलि" लग्न की ग्राह्यता शास्त्रानुसार बताई गई है। "गोधूलि लग्न" सूर्यास्त से 12 मिनिट पूर्व एवं पश्चात् कुल 24 मिनिट अर्थात् 1 घड़ी की होती है, मतान्तर से कुछ विद्वान से इसे सूर्यास्त से 24 मिनिट पूर्व व पश्चात् कुल 48 मिनिट का मानते हैं लेकिन शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि "गोधूलि लग्न" की ग्राह्यता केवल आपात परिस्थिति में ही होती है जहां तक सम्भव हो शुद्ध लग्न को ही प्राथमिकता देना चाहिए।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

कितना प्रामाणिक है सोशलमीडिया !

 


आजकल देश और समाज में चहुंओर सोशलमीडिया का चलन बढ़ता ही जा रहा है। केवल युवा ही नहीं हर वर्ग में इसकी गहरी पैठ स्पष्ट दिखाई दे रही है। देश व समाज में सोशलमीडिया का प्रयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार से बखूबी किया जा रहा है। अब यह उपयोग करने वाले की मानसिकता पर निर्भर है कि वह किस प्रकार इस मंच का प्रयोग करता है। कोई किसी बुज़ुर्ग दम्पति की मदद करने हेतु उनके बहते अश्रु पोंछने के लिए उनकी छोटी सी खाने की दुकान का वीडियो बनाकर सोशलमीडिया पर साझा कर रातों-रात उनका संकटमोचक बन जाता है तो कोई इस माध्यम का प्रयोग समाज में अराजकता फ़ैलाने के लिए अफ़वाह के रूप में भी कर सकता है। धर्म जगत भी सोशलमीडिया के प्रभावों से अछूता नहीं है। आज इस माध्यम से समाज में अनेकों ऐसे तथ्य प्रचारित-प्रसारित किए जा रहे हैं जिनका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है या उनकी मूल भावना प्रचारित संदेशों से भिन्न है। ऐसा ही एक वीडियो आज ध्यानार्थ आया जिसमें हथिया नक्षत्र को लेकर एक वीडियो प्रसारित किया गया और इसके सत्य होने का दावा किया गया है। इसमें बताया गया कि "हथिया नक्षत्र जब आता है तो बादल हाथी की सूंड की तरह तालाबों और नदियों से पानी खींचता है।" इससे सम्बन्धित घटना का वीडियो भी प्रसारित किया गया है। जिसमें एक जलाशय से पानी बादल की ओर वाष्पीभूत होते दिखाया भी जा रहा है। अब बात करें इसकी सच्चाई और प्रामाणिकता की तो वह मैं अपने सुधि पाठकों पर छोड़ता हूं किन्तु उन्हें किसी निर्णय पर पहुंचने में सहायतार्थ कुछ कसौटियां अवश्य दे देना चाहता हूं जिसके आधार पर वे इस वीडियो की सच्चाई और प्रामाणिकता की पुष्टि स्वयं कर सकेंगे। पहली बात तो मुहूर्त्त व ज्योतिष शास्त्र के समस्त 27 नक्षत्रों (मतान्तर से अभिजित सहित 28) में "हथिया" नामक कोई नक्षत्र नहीं है। प्रत्येक नक्षत्र में 13 अंश 20 कला होते हैं। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र 4 चरण होते हैं जिनका मान 3 अंश 20 कला होता है। अब यदि देशज भाषा अनुसार "हथिया" नक्षत्र का साम्य ज्योतिष शास्त्र में खोजें तो वह हमें "हस्त" नक्षत्र में मिलता है क्योंकि "हस्त" नक्षत्र का उल्लेख हमें शास्त्रों में मिलता है। देश के कई भागों मुख्यत: ग्रामीण क्षेत्रों में वैदिक शास्त्रों के सिद्धान्तों के आधार पर देशज व लोकोक्तिनुमा कुछ सूत्र बना लिए जाते हैं जैसे "चित्रा स्वाति विशाखा में मेघ गाज गरिरंग। सुख सुभिक्ष की धारणा, निर्णय शकुन प्रसंग॥ इस सूत्र में बताया गया है कि जब चित्रा,स्वाति,विशाखा नक्षत्र में बादलों की गर्जना के साथ बिजली चमकती है तो यह सुख अर्थात् अच्छी वर्षा का संकेत होता है। दूसरा उदाहरण देखें- "श्रीगणेश आर्द्रा रवि मेघ गाज अधिरंग। निर्णय शकुन शास्त्र का भावी समय कुरंग॥ इस सूत्रानुसार जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में हो और मेघ की गर्जना के साथ बिजली चमके तो यह आपदा का संकेत होता है। इसी प्रकार इस प्रचलित वीडियो के साथ जो तथ्य बताया जा रहा वह भी इसी प्रकार के किसी सूत्र का फ़लित है जिसका आशय इस प्रकार प्रतीत हो रहा है कि "हस्त नक्षत्र में भीषण गर्मी के कारण जलाशयों का जल वाष्पीभूत होगा।" यहां तक तो ठीक किन्तु जो घटना इसके साथ वीडियो के माध्यम से प्रचारित की जा रही है उसकी प्रामाणिकता की बात करें तो "हस्त" जिसे हथिया बताया जा रहा है वह तो 5 मई, 1 जून, 29 जून, 26 जुलाई, 22 अगस्त, 16 अक्टूबर इन सभी दिनों में था। शास्त्रोक्त नियम सार्वभौम होते हैं जैसे अग्नि सभी को एक जैसा ताप देती है, जल की आद्रता सभी को एक जैसा प्रभावित करती है। सूर्योदय, सूर्यास्त, ग्रहण का समय पंचांग के अनुसार पूरे देश में समान रूप से लागू होता है। यदि इस सूत्र के साथ हुई घटना को सत्य मानें तो यह परिणति देश के सभी जलाशयों पर एक समान रूप से लागू होनी चाहिए थी, जो कि नहीं हुई। हस्त नक्षत्र का प्रभाव तो पूरे देश में समान रूप से हुआ है पर यह तथाकथित घटना एक विशेष क्षेत्र को छोड़कर किसी अन्य राज्य के किसी भी क्षेत्र में दिखाई नहीं दी। अब इसी प्रकार की बातों को आधार बनाकर कई तर्कशास्त्री हमारे धर्म पर प्रश्नचिन्ह लगाने में सफल हो जाते हैं। मेरे देखे अपने निजी हित के लिए शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों को इस प्रकार से प्रस्तुत करना सर्वथा अनुचित है। अत: पाठकगण सोशलमीडिया पर निरन्तर प्रचलित हो रहे इस प्रकार के समस्त संदेशों की प्रामाणिकता के प्रति अपने विवेक के आधार पर निर्णय करें।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 19 अगस्त 2020

गणेश स्थापना की सम्पूर्ण “सरल पूजन विधि”-



गणेश उत्सव हमारे देश का महत्त्वपूर्ण उत्सव है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 22 अगस्त दिन शनिवार को रहेगी। इस दिन घर-घर में गणेशजी की पूजन व स्थापना होगी। आज जब "कोरोना" महामारी के चलते आवागमन प्रतिबन्धित है तब हम "सरल-चेतना" के पाठकों के लिए लाए हैं गणेश स्थापना की सम्पूर्ण सरल पूजन विधि जिससे वे अपने घर में स्वयं गणेशजी का विधिवत पूजन व स्थापना कर सकते हैं।

पूजन सामग्री- गणेश जी की प्रतिमा (मिट्टी,स्वर्ण,रजत,पीतल,पारद), हल्दी, कुमकुम, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), सुपारी, सिन्दूर, गुलाल, अष्टगंध, जनेऊ जोड़ा, वस्त्र, मौली, सुपारी, लौंग, ईलायची, पान, दूर्वा, पंचमेवा, पंचामृत, गौदुग्ध, दही, शहद, गाय का घी,शकर, गुड़, मोदक, फ़ल, नर्मदाजल/गंगाजल, पुष्प, माला, कलश, सर्वोषधि, आम के पत्ते, केले के पत्ते, गुलाबजल, इत्र, धूपबत्ती, दीपक-बाती, सिक्का, श्रीफल (नारीयल)

सम्पूर्ण पूजन विधि- गणेश चतुर्थी वाले दिन शुभ चौघड़िये के अनुसार उक्त सामग्री का प्रबन्ध कर अपने पूजागृह में एकत्र करें। अब सर्वप्रथम गणेश प्रतिमा को किसी चौकी पर केले पत्ते या दूर्वा का आसन देकर विराजमान करें। पूजा करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व की रखें। घी का दीपक प्रज्जवलित करें।

पवित्रीकरण-किसी भी पूजा को करने से पूर्व पवित्र व शुद्ध होना अनिवार्य है। पवित्रीकरण के लिए अपने बाएं में जल लेकर दाहिने से उसे ढंके और निम्न मन्त्र के साथ अपने ऊपर एवं सम्पूर्ण पूजा सामग्री के ऊपर उसका मार्जन करें (छिड़कें) ।

मन्त्र- ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। 

य: स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तर शुचि:॥

अब आचमनी से लेकर तीन बार जल का निम्म मन्त्र बोलकर आचमन करें।

ॐ केशवाय नम:

ॐ नारायणाय नम: 

ॐ माधवाय नम:

हस्त प्रक्षालन के लिए "ॐ गोविन्दाय नमो नम:" तीन बार "पुण्डरीकाक्षं पुनातु:" बोलकर अपने हाथ धो लें। हस्त प्रक्षालन के पश्चात अपने भाल पर कुमकुम या चन्दन का तिलक धारण करें।

दीपक का पूजन-

दीपक के पूजन हेतु एक पुष्प में जल व अष्टगंध सहित हल्दी, कुमकुम, सिन्दूर लगाकर निम्न मन्त्र के साथ दीपक के समक्ष अर्पण करें-

"शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदाम्।

शत्रुबुद्धिविनाशाय च दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते।दीपो ज्योति: परब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।दीपो हरतु मे पापं दीप ज्योति नमोऽस्तुते॥

संकल्प- 

संकल्प हेतु अपने बाएं हाथ में पुष्प, अक्षत, सुपारी व सिक्का लेकर उसमें एक आचमनी जल डालें और निम्न संकल्प बोलें- 

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमदभगवतो महापुरूषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्रि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत्मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे “अमुक” (अमुक के स्थान पर अपने निवासरत नगर का उच्चारण करें) नगरे/ग्राम 2077 वैक्रमाब्दे प्रमादी नाम संवत्सरे भाद्रपद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थी तिथौ शनिवासरे प्रात:/अपरान्ह/मध्यान्ह/सायंकाले “अमुक” (अमुक के स्थान पर अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्र:....शर्मा/वर्मा/गुप्त: श्रीगणेश देवता प्रीत्यर्थं पूजन स्थापना कर्म अहं करिष्ये।

उक्त संकल्प बोलकर हाथ की समस्त सामग्री गणेश के सम्मुख उनके चरणों में अर्पित करे दें और उस पर एक आचमनी जल चढ़ा दें।

ध्यान-

गणेशजी के ध्यान हेतु अपने दाएं में पुष्प लेकर दोनों हाथ जोड़ें और निम्न मन्त्र का उच्चारण करें और पुष्प गणेशजी के सम्मुख अर्पण करें-"गजाननं भूतगणादिसेवतं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥

गौरीजी के ध्यान हेतु अपने दाएं में पुष्प लेकर दोनों हाथ जोड़ें और निम्न मन्त्र का उच्चारण करें और पुष्प गौरीजी के सम्मुख अर्पण करें-

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।

नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्।

आवाहन-

आवाहन हेतु अपने बाएं हाथ में अक्षत लेकर उसमें हरिद्रा (हल्दी) मिश्रित कर लें तत्पश्चात् उन पीतवर्णीय अक्षतों में से एक-एक अक्षत अपने दायें हाथ से उठाकर श्रीगणेशजी के सम्मुख निम्न मन्त्र के साथ अर्पण करें-

१. श्रीमन्महागणाधिपतये नम:

२. लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:

३. उमा-महेश्वराभ्यां नम:

४. वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नम:

५. शचीपुरन्दाराभ्यां नम:

६. मातृपितृचरणकमेलेभ्यो नम:

७. इष्टदेवताभ्यो नम:

८. कुलदेवताभ्यो नम:

९. ग्रामदेवताभ्यो नम:

१०. वास्तुदेवताभ्यो नम:

११. स्थानदेवताभ्यो नम:

१२. सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:

१३. सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम:

१४. ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नम:

 प्राणप्रतिष्ठा- 

गणेशजी की प्राणप्रतिष्ठा के लिए एक दूर्वा में घी लगाकर गणेशजी की प्रतिमा से स्पर्श कराते हुए निम्न मन्त्र का उच्चारण करें-

"अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा: क्षरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन गणेशाम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्।

आसन-

ध्यान के उपरान्त श्रीगणेशजी व गौरीजी के आसन हेतु एक पुष्प, दूर्वा व अक्षत "प्रतिष्ठापूर्वक आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नम:" बोलकर गणेशजी व गौरीजी के सम्मुख अर्पण करें।

पाद्य-

श्रीगणेशजी व गौरीजी के पादप्रक्षालन हेतु एक आचमनी जल गणेशजी व गौरीजी के सम्मुख अर्पण करें।

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पाद्यं अर्घ्यं समर्पयामि समर्पयामि।"

शुद्धजल से स्नान-

सर्वप्रथम गणेशजी को शुद्धजल से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।"

दुग्ध स्नान-

अब गणेशजी के चल विग्रह को एक बड़ी थाली में स्थापित करने के पश्चात् गणेशजी को निम्न मन्त्र बोलकर गौदुग्ध से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पय:स्नानं समर्पयामि।"

दधि स्नान-

गौदुग्ध से स्नान के पश्चात गणेशजी को दधि से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दधिस्नानं समर्पयामि।"

घृत स्नान-

दधि से स्नान के पश्चात गणेशजी को गौघृत से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, घृतस्नानं समर्पयामि।"

मधु (शहद) स्नान-

गौघृत से स्नान के पश्चात गणेशजी को शहद से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, घृतस्नानं समर्पयामि।"

शर्करा स्नान-

शहद से स्नान के पश्चात गणेशजी को शर्करा से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शर्करास्नानं समर्पयामि।"

पंचामृत से स्नान- 

शर्करा से स्नान के पश्चात गणेशजी को पंचामृत से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पंचामृतस्नानं समर्पयामि।"

पुन: शुद्धजल से स्नान-

पंचामृत से स्नान के पश्चात गणेशजी को शुद्धजल से स्नान कराएं-मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।"

अब निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए एक आचमनी जल गणेशजी के सम्मुख अर्पण करें-

"शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि"

दुग्धाभिषेक-

अब गणेश जी का "अथर्वशीर्ष" का पाठ करते हुए गौ दुग्ध से अभिषेक करें। अभिषेक के उपरान्त पुन: शुद्ध जल से स्नान कराकर गणेश जी की प्रतिमा को सिंहासन या मण्डप में विराजमान कर उनका श्रंगार करें-

वस्त्र-अलंकार एवं जनेऊ-

शुद्ध जल से स्नान कराने के उपरान्त गणेशजी को वस्त्र-उपवस्त्र, अलंकार व जनेऊ धारण कराएं।मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, वस्त्रं समर्पयामि।"

चन्दन-

श्रंगार के उपरान्त गणेशजी को चन्दन व सिन्दूर लगाएं-

मन्त्र-"श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृहताम्॥ 

"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, चन्दानुलेपनं समर्पयामि।"

पंचोपचार-

अब गणेशजी का अक्षत, सिन्दूर, गुलाल, भोडर आदि से पंचोपचार पूजन करें।मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि।"

पुष्पमाला-

अब गणेश जी को पुष्प एवं पुष्पमाला चढ़ाएं-मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:,पुष्पमालां समर्पयामि।"

दूर्वा-

अब गणेशजी को दूर्वा अर्पित करें-
मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दूर्वांकुरान समर्पयामि।"

इत्र-

अब गणेशजी को इत्र लगाएं- 
मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामि।"

धूप-

अब गणेशजी को धूप की सुगन्ध अर्पित करें- 
मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, धूपमघ्रापयामि समर्पयामि।"

दीप-

अब गणेशजी को दीप दर्शन कराएं- 
मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दीपं समर्पयामि।" 

अब हस्तप्रक्षालन (अपने हाथ धो लें) करने के बाद गणेशजी को नैवेद्य (भोग में दूर्वा, गुड़ व मोदक रखकर) अर्पण करें-ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा,ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, नैवेद्यं निवेदयामि।"

फल-

नैवेद्य अर्पण करने के उपरान्त गणेशजी को ऋतुफल अर्पण करें-

मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, ऋतुफलानि निवेदयामि।"

ताम्बूल (पान का बीड़ा)-

अब गणेशजी को लौंग-ईलायची रखकर ताम्बूल अर्पण करें-

मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, मुखवासार्थम् एलालवंग-पूंगीफल्सहितं ताम्बूलं समर्पयामि।"

दक्षिणा-

अब गणेशजी को श्रीफल सहित यथासामर्थ्य दक्षिणा अर्पण करें-

मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, कृताया: पूजाया: द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि।"

आरती-

अब गणेशजी की आरती उतारें।

क्षमाप्रार्थना-

अब हाथ में पुष्प व अक्षत लेकर पूजा में हुई त्रुटि के विनम्र भाव से क्षमा प्रार्थना करें-

मन्त्र-गणेशपूजनं कर्म यन्यूनमधिकं कृतम्।

तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नो‌ऽतु सदा मम॥

उक्त मन्त्र बोलकर हाथ में रखे पुष्प व अक्षत गणेशजी के सम्मुख अर्पण कर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करें।

अब एक आचमनी जल अपने आसन के नीचे छोड़कर उस जल को अपने नेत्रों से लगाकर पूजा सम्पन्न करें।

 

(निवेदन-उक्त पूजाविधान उन श्रद्धालुओं को दृष्टिगत रखकर दिया गया है जो स्वयं अपने घर में गणेशजी की स्थापना व पूजन करना चाहते हैं।)

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

 

 

मीडिया और सुशान्त-

धन्य है हमारे देश का मीडिया और उस पर आनेवाले तथाकथित विश्लेषक, अभी सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ इतना भर कहा है कि सुशान्त केस की जांच सीबीआई करेगी। इस पर कितना हो-हल्ला मचाया जा रहा है, न्याय की जीत...सत्यमेव जयते...जाने क्या-क्या। अब यदि सीबीआई की जांच इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वास्तव में सुशान्त सिंह राजपूत ने आत्महत्या ही की थी और उसकी वजह डिप्रेशन थी, डिप्रेशन की वजह चाहे जो हो; तब...! उसके लिए भी इन तथाकथित विश्लेषकों ने टिप्पणी करने के लिए अपने जुमले अभी से तैयार कर लिए होंगे। इस देश का मीडिया क्या चीज़ को कभी सलीके से होने देगा? ये वही मीडिया जिसने बिना किसी ठोस आधार के चन्द अभिनेता-अभिनेत्रियों के बयान पर इस केस में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज़्म) का मुद्दा कई दिनों तक चलाया था और अब बिल्कुल ही शीर्षासन! कमाल है...ओ ख़बरनवीसों थोड़ा गंभीर पत्रकारिता भी कर लो...। एक ही मुद्दे की कई-कई दिनों तक जुगाली करना फ़िर एकदम खामोश हो जाना ये श्रेष्ठ पत्रकारिता की निशानी नहीं है। आप मित्रों को वो मरकज़ वाले साहब याद हैं कि नहीं...क्या हुआ उनका अब मीडिया में इसका ज़िक्र तक नहीं हो रहा। क्या किसी मुद्दे का फ़ालोअप लेना और उस बहस निष्कर्ष तक पहुंचाना मीडिया की ज़िम्मेवारी नहीं है। प्राइम टाइम मुर्गे लड़ाई की भांति बहस कराकर जनता को बिना किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचाए बिना बहस रोक कर देना क्या बस इतनी ही पत्रकारिता शेष है अब। पहले के समय में सम्पादकीय से जनता अपना मानस बनाती है, श्रेष्ठ सम्पादक व पत्रकार जनता का बौद्धिक मार्गदर्शन करते थे और आजकल के इन एंकरों को देख लीजिए, गला फ़ाड़ का चिल्ला-चिल्ला कर ना जाने क्या साबित करना चाहते हैं। खुद ही वकील...खुद ही जज...सब कुछ गंभीरता धेले भर की नहीं। ऐसा नहीं कि आज के दौर में श्रेष्ठ पत्रकार नहीं हैं..हैं निश्चित हैं मगर उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। रजत शर्मा जी हों, शरद द्विवेदी जी हों, अमिताभ अग्निहोत्री जी या फ़िर रविश कुमार हों ये सब वे नाम हैं जो पत्रकारिता की कसौटी हैं इनकी रिपोर्ट देख लीजिए, कम से कम तथ्यात्मक बात तो करते हैं, दूसरों की सुनते तो हैं और कभी भी पंचम सुर नहीं लगाते। मेरा निवेदन बस इतना है कि दिन-दिन भर किसी मुद्दे को अनावश्यक रूप से खींचना, उच्च स्वर में बिना तथ्यों व तर्कों के चिल्लाना इन सबसे आप महान पत्रकार नहीं हो जाते और ना ही इससे पत्रकारिता की गरिमा बढ़ती है। सम्पादकों का मुख्य कार्य ही बस इतना होता है कि किस खबर को किस "वज़न" (वैटेज) के साथ चलाया जाना चाहिए इसका निर्णय करें। आजकल के सम्पादक तो पड़ोसी चैनल क्या दिखा रहा है यह देखकर अपना सम्पादन (एडिटिंग) करते हैं। बहरहाल अब समय आ गया है; और नहीं भी आया है तो बहुत शीघ्र आ जाएगा जब मीडिया की सीमाएं भी संविधान को तय करनी ही पड़ेंगी।

-पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक "सरल-चेतना"