शनिवार, 11 अप्रैल 2020

पृथकता (आइसोलेशन) या अस्पृश्यता (छुआछूत) …!


प्राचीनकाल में पृथकता (आइसोलेशन) को अस्पृश्यता (छुआछूत) का नाम देकर जहां सवर्णों की बड़ी आलोचना की गई वहीं एक विशेष वर्ग को निन्दित व घृणास्पद समझने का कुत्सित प्रयास किया गया। मेरे देखे दोनों ही दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से प्रेरित अतिवादी दृष्टिकोण थे। वास्तविकता में पृथकता (आइसोलेशन) और अस्पृश्यता (छुआछूत) देश-काल-परिस्थिति के अनुसार की गई स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के अंग हैं जिन्हें उस दौर की आवश्यकता के अनुसार परिभाषित किया गया। जिस प्रकार आज "लाकडाउन"और "कर्फ़्यू" एक ही व्यवस्था के अंग हैं बस उन्हें परिभाषित करने का ढंग अलग है लेकिन दोनों ही व्यवस्थाओं का उद्देश्य एक है कि लोग घर से बाहर ना निकलें। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आज एकान्तवास (क्वारंटाइन) या पृथकता (आइसोलेशन) में रखे गए व्यक्ति पापी या अपराधी नहीं हैं वे केवल एक संक्रामक रोग से पीड़ित हैं या हो सकते हैं, जो उनसे किसी अन्य व्यक्ति या सम्पूर्ण समाज में फ़ैल सकता है। ठीक उसी प्रकार प्राचीन समय में जिन्हें "शूद्र" कहा जाता था वे कोई अपराधी, पापी या घृणास्पद व्यक्ति नहीं थे; वे केवल उनके द्वारा सम्पादित किए जाने वाले कार्यों के आधार पर स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा को देखते हुए समाज से एक सीमित दूरी पर रखे जाते थे। सामाजिक स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु बनाई गई इस सीमित दूरी को वर्ग विशेष के तथाकथित ठेकेदारों ने मनुवादी सोच, छुआछूत व अस्पृश्यता का नाम देकर समाज में एक गहरी खाई का निर्माण कर सामाजिक सौहार्द्र को समाप्त कर दिया। ज़रा सोचिए जब आज के वैज्ञानिक युग में जहां मनुष्यता चांद को पददलित करने का दम्भ भरती है वहां इस प्रकार के संक्रामक रोग का कोई ईलाज खोजना सम्भव नहीं हो पा रहा है; केवल उस समय की छुआछूत व अस्पृश्यता (आज के दौर के क्वारंटाइन व आइसोलेशन) के, तो प्राचीन समय में ऐसे संक्रमित रोग का ईलाज खोजना भला कहां सम्भव हो पाता! ऐसे में तथाकथित छुआछूत व अस्पृश्यता (क्वारंटाइन व आइसोलेशन); वास्तविकता में पृथकता, नितांत आवश्यक थी। अपितु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है इस विशुद्ध सामाजिक स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था को कुछ व्यक्तियों ने अपने अहंकार को परिपोषित करने का साधन बना लिया था किन्तु कुछ लोगों की नासमझी के कारण किसी आवश्यक व उपयोगी सिद्धान्त से उत्पन्न किसी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना भी अनुचित है। हम इस बात को स्वीकर करते हैं कि समय के साथ-साथ देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार की व्यवस्थाओं की समुचित समीक्षा कर उन्हें समाप्त या जारी रखने पर निर्णय लिया जाना भी आवश्यक होता है। आज समूचा विश्व इस बात को स्वीकार व इसका समर्थन करने पर विवश है।

- पं. हेमन्त रिछारिया
(संपादक "सरल चेतना")

रविवार, 29 मार्च 2020

मत आना तू गांव बन्धु


मत आना तू गांव बन्धु
दूषित होगी छांव बन्धु।

हवा हुई जहरीली है,
राह बड़ी पथरीली है।
दिल पे पत्थर रखकर,
रोक बढ़ते पांव बन्धु।
मत आना तू गांव बन्धु॥

तूफ़ान ने आकर घेरा है,
भय ने किया बसेरा है।
जर्जर होती पतवारों से,
खेना है यह नाव बन्धु।
मत आना तू गांव बन्धु॥

नियति की यह चौसर है,
हर कोई इक मोहर है।
सोच-समझ फेंको पांसे,
हार ना जाएं दांव बन्धु।
मत आना तू गांव बन्धु॥

कवि-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया 
("कोरोना" महामारी के कारण पलायन करते प्रवासियों को समर्पित कविता)

29.03.2020

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

कब मिलेगी "कोरोना" संकट से मुक्ति..?



आज समूचा विश्व "कोरोना" वायरस नामक महामारी से भयाक्रान्त है। विश्व की बड़ी आबादी आज "कोरोना" से संक्रमित है। जो स्वस्थ हैं उन्हें अत्यधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के अनुसार अभी तक इस बीमारी का कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है। भारत समेत विश्व के अनेक देश "कोरोना" को महामारी घोषित कर चुके हैं। स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इसे "वैश्विक महामारी" की श्रेणी में रखा है। आज हर कोई जानना चाहता है मानवजाति इस महामारी के संकट से कब मुक्त होगी। इसके लिए वह चिकित्सा एवं ज्योतिष की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहा है। ज्योतिष से सम्बन्धित होने के कारण हमारे पास भी इस प्रश्न को लेकर कई जिज्ञासाएं आईं। आईए ज्योतिष शास्त्र की "प्रश्न कुण्डली" की व्यवस्था को आधार बनाकर हम इस प्रश्न का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न लग्न "स्थिर" श्रेणी की है-
--------------------------------------
"कोरोना" सम्बन्धी प्रश्न की कुण्डली सिंह लग्न की बनी है जो स्थिर श्रेणी की है। इसके परिणामस्वरूप यह अभी यथास्थिति का संकेत कर रहा है अर्थात् अभी जो वैश्विक स्थिति है उसमें बहुत अधिक परिवर्तन की उम्मीद नहीं है। स्थिर लग्न इसी घटनाक्रम के कुछ दिनों तक जारी रहने का संकेत कर रहा है।

एकादशेश मित्रक्षेत्री किन्तु राहु अधिष्ठित है
-------------------------------------------------
प्रश्न कुण्डली का एकादशेश मित्रक्षेत्री होकर केन्द्रस्थ है। एकादशेश राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होकर लग्न को पीड़ित कर रहा है। लग्नेश स्वयं लग्नभंग योग बनाकर अष्टमस्थ है एवं लाभेश राहु से पीड़ित है, जो अत्यन्त हानिकारक है। यह एक प्रतिकूल स्थिति है।

विंशोत्तरी दशा-
------------------
-विशोंत्तरी दशा के अनुसार अभी जून तक कोई बड़ी राहत मिलती प्रतीत नहीं हो रही है। जून के बाद स्थिति में उत्तरोत्तर सुधार आएगा लेकिन पूर्णत: इस संकट से मुक्ति के लिए अभी विश्व को थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी।

(निवेदन- उपर्युक्त विश्लेषण प्रश्नकुण्डली आधारित है जो सामान्य जिज्ञासा के समाधान के लिए दिया गया है। हम "वेबदुनिया" के पाठकों से निवेदन करते हैं कि वे अपने स्वास्थ्य का समुचित ध्यान रखें एवं "कोरोना" संक्रमण से बचने के लिए की जा रही व्यवस्थाओं में स्थानीय प्रशासन को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है।


   


सियासत की जाने कैसी ये आग है,
आज़ाद हैशाहीन’, कैद में बाग है।

उन्हें सिखा रहे हो उसूल मुहब्बत के
नफ़रत से जिनके चूल्हों में आग है

गुमराह मुंसिफ़ पाकीज़ा ना तेरा दामन
मुफ़लिसों के लहू का उस पर भी दाग है

उनसे शिकायत कैसी वो गैर जो ठहरे
मुल्क जला रहे जो घर के चिराग हैं

गाफ़िल नहीं अजी हम खूब समझते हैं
तख्त--ताज की सारी ये दौड़ भाग है।

पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

(शाहीन-बाज/शिकारी पक्षी, उसूल-सिद्धान्त, मुंसिफ़-न्यायाधीश, मुफ़लिस-गरीब/बेसहारा, गाफ़िल-विमुख/लापरवाह)

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

क्या वर्ष बदलने से बदलेगा भाग्य...!


वर्ष 2019 अपने अस्ताचल की ओर अग्रसर है और नूतन वर्ष द्वार पर दस्तक दे रहा है। नवीन वर्ष के स्वागत के साथ ही जनमानस के मन में यह उत्कंठा होने लगी है कि नया वर्ष उनके जीवन में क्या परिवर्तन लाने वाला है। ज्योतिषाचार्यों की नए साल को लेकर गणनाएं उनकी इस  उत्सुकता को और अधिक बल दे रहीं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैलेण्डर वर्ष बदलने से आपके भाग्य पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता! यह एक प्रामाणिक तथ्य है। नए साल को लेकर की जाने वाली अधिकांश भविष्यवाणियां भ्रांतियों से अधिक कुछ नहीं हैं, विशेषकर वे जो जातक, राशि व लग्न के सम्बन्ध में की जा रही हों। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि नए साल के मायने भी सभी धर्मों व समाजों में एक से नहीं है। हिन्दू धर्म में नया वर्ष चैत्र से माना जाता है वहीं गुजरात में दीपावली से नवीन वर्ष की मान्यता है, कहीं अंग्रेजी महीने जनवरी से नया साल मनाया जाता है। प्रामाणिक तथ्य सदैव सार्वभौम होते हैं जैसे सूर्य का ताप, सूर्य की तपिश समस्त चराचर जगत को समग्ररूपेण एक सा प्रभावित करती है।
कुछ भविष्यसंकेत प्रामाणित व सटीक अवश्य होते हैं जैसे नवीन वर्ष में साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रभाव, ग्रहण के बारे में जानकारी, गुरू व शुक्र अस्त, ग्रह गोचर इत्यादि। जातक के सम्बन्ध में वर्षफल का निर्धारण उसके स्वयं के जन्मदिवस से होता है ना कि कैलेण्डर के नववर्ष से। जातक के वर्षफल के निर्धारण में निम्न तत्व महती भूमिका निभाते हैं-
1. मुंथा-मुंथा का वर्षफल निर्धारण में विशेष महत्त्व होता है। मुंथा निर्धारण के लिए वर्ष लग्न में अपनी आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचता है उसी राशि की "मुंथा" होती है। वर्ष लग्न में  4,6,7,8,12 भावगत मुंथा शुभ नहीं होती। जबकि 1,2,3,5 भावगत मुंथा शुभ होती है। शुभ ग्रह से युत, शुभ ग्रह से दृष्ट एवं बलवान मुंथा सदैव शुभ होती है
2. मुंथेश- मुंथा राशि के अधिपति ग्रह को "मुंथेश" कहते हैं। वर्षफल के निधार्रण में "मुंथेश" जन्म लग्नेश की ही भाँति महत्त्वपूर्ण होता है। वर्षकुण्डली में 4,6,8,12 भावगत मुंथेश शुभ नहीं होता। मुंथेश यदि पाप ग्रह से युत व दृष्ट हो तो परम अशुभफल देता है। मुंथेश यदि वर्षलग्न के अष्टमेश से युति करे तो कष्टदायक होता है।
3. वर्षलग्न- जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि का वर्षलग्न हो तो वर्ष में रोग व कष्ट होता है।
4. चन्द्रमा- वर्षकुण्डली में चन्द्रमा 1,6,7,8,12,भावों में पाप ग्रह से दृष्ट हो या पाप ग्रह से युत हो तो वर्ष में प्रबल अरिष्ट देता है। यदि वर्षकुण्डली में चन्द्रमा पर गुरू की दृष्टि हो तो अशुभता में अतीव कमी होकर शुभता में वृद्धि होती है।
5. वर्षकुण्डली- यदि वर्षकुण्डली में मुंथेश, वर्षेश और जन्म लग्नेश वर्ष कुण्डली में अस्त, नीचराशिगत, या पापग्रहों से युत हों या दृष्ट हों तो जातक का राजयोग भी सम्पूर्ण फलित नहीं होता।

उपर्युक्त तथ्यों से पाठकगण समझ ही गए होंगे कि नववर्ष की ज्योतिषीय गणनाएं कितनी सटीक व प्रामाणिक होती है। अत: नववर्ष के अवसर पर दिए जाने वाले राशिफल के सम्बन्ध अपने स्वविवेक से निर्णय करें।

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

रविवार, 17 नवंबर 2019

आस्था या अन्धविश्वास....!

कहते हैं आस्था व श्रद्धा को किसी तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। लोगों की किसी के प्रति आस्था ही उनके विश्वास का पर्याय होती है किन्तु जब यही आस्था एक सीमा का उल्लंघन कर सामाजिक ताने-बाने का अतिक्रमण करने लगती है तब यह अन्धविश्वास बन जाती है। इन दिनों मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील का नयागांव ऐसे ही एक अन्धविश्वास का केन्द्र बना हुआ है। पिछले कुछ दिनों में यहां के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व के जंगल में लगा हुआ एक "महुआ का पेड़" अपनी तथाकथित चमत्कारिक शक्तियों को लेकर चर्चा में आया। माना जा रहा है कि इस महुआ के पेड़ में कोई चमत्कारिक शक्ति है और इस पेड़ को छूने मात्र से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। इस प्रकार की चर्चा के फैलते ही यहां दूर-दूर से लोग अपने असाध्य व गंभीर रोगों से मुक्ति पाने के लिए इस पेड़ को छूने आ रहे हैं। अब हालात इस कदर बेकाबू हो चले हैं कि लोगों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रशासन को यहां भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा है। इन तमाम प्रशासनिक इंतजामों के बावजूद भी बीति रात यहां अराजतकता वातावरण देखने को मिला। प्रशासनिक व्यवस्थाओं व प्रतिबन्धों से नाराज़ ग्रामीणों व पुलिस के बीच झड़प व पत्थरबाजी की घटना हो गई जिसमें टी आई सहित कई लोग घायल हो गए। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रकार की आस्था उचित है? आज अधिकांश लोगों की आस्था लाभ पर आधारित है। दूसरा स्वयंसिद्ध तथ्य यह है कि भीड़ का अपना कोई विवेक नहीं होता इसलिए भीड़ को बहकाना बहुत ही आसान होता है। जो लोग यह दावा कर रहे हैं कि इस पेड़ को छूने मात्र से असाध्य से असाध्य रोग ठीक हो रहे हैं क्या उन्होंने किसी ऐसे रोगी का चिकित्सकीय परीक्षण कर प्रमाण (मेडिकल रिपोर्ट) प्रस्तुत किए जिसका कोई असाध्य रोग इस पेड़ को छूने मात्र से ठीक हुआ हो? यदि अफवाहों को दरकिनार करें तो अब तक एक भी ऐसा मामला प्रकाश में नहीं आया है जो तर्कसंगत इस बात का प्रमाण प्रस्तुत कर सके कि इस पेड़ को छूने मात्र से असाध्य रोग ठीक होते हैं। किन्तु आज के दौर में लोग सदैव लाभ व उम्मीद को अपनी आस्था का आधार बनाते हैं भले ही वास्तविकता चाहे जो हो। अब ज़रा विचार कीजिए कि जिस पेड़ को इस आशा से छूने जा रहे लोग कि वह उनके असाध्य रोग ठीक करेगा यदि वहां जाकर घायल हो जाएं; जैसा कि ग्रामीणों व पुलिस की झड़प के बाद हुआ, तो क्या वह चमत्कारिक हो सकता है? कई बार व्यक्ति की इच्छाशक्ति जिसे अंग्रेजी में "विलपावर" कहा जाता है वह भी इन सब बातों के पीछे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। हो सकता कुछ व्यक्तियों को इस पेड़ को छूने से न्यूनाधिक लाभ हुआ हो तो उसकी वजह इस पेड़ की चमत्कारिक शक्ति का नहीं अपितु उनके स्वयं की इच्छाशक्ति (विलपावर) है। आज के सोशल मीडिया के युग में अफ़वाहों को प्रचारित-प्रसारित करना बहुत आसान है। इसके पीछे कुछ अराजक तत्वों के निजी लाभ भी होते हैं। कल तक जिस गांव के बारे में जिले के लोगों को भी पता नहीं था वह आज दूर-दराज के लोगों के पर्यटन का केन्द्र बनता जा रहा है। इससे वहां के ग्रामीणों की व्यापारिक गतिविधियों को भी निश्चित लाभ हुआ है। यह एक बड़ा दुष्चक्र व सुनियोजित व्यापारिक विज्ञापन भी हो सकता है। आज के दौर में हमें कमज़ोर आस्था की नहीं अपितु दृढ़ आस्था व श्रद्धा की आवश्यकता है जो केवल ईश्वर के प्रति होनी चाहिए, शेष सब अपने से हो जाता है। मेरी "वेबदुनिया" के माध्यम से आप समस्त पाठकों से अपील है कि इस प्रकार की अफवाहों पर कतई विश्वास ना करें एवं इन्हें आगे प्रचारित व प्रसारित होने से रोकें।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


मंगलवार, 3 सितंबर 2019

क्यों कहते हैं "गणपति बप्पा मोरया"...!



गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया " का जयकारा हमेशा ही सुनायी देता है। कई बार आपने भी ये जयकारा लगाया होगा लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि आखिर ये जयकारा क्यों लगाते हैं? कहां से इस जयकारे की उत्पति हुई? इसके पीछे एक ऐतिहासिक तथ्य है। गणपतिजी के इस जयकारे की जड़ें महाराष्ट्र के पुणे से 21 किमी. दूर बसे चिंचवाड़ गांव में हैं। चिंचवाड़ जन्मस्थली है एक ऐसे संत की जिसकी भक्ति और आस्था ने लिख दी एक ऐसी कहानी, जिसके बाद उनके नाम के साथ ही जुड़ गया गणपति का भी नाम। पंद्रवी शताब्दी में एक संत हुए, जिनका नाम था मोरया गोसावी, कहते हैं भगवान गणेश के आशीर्वाद से ही मोरया गोसावी का जन्म हुआ था और मोरया गोसावी भी अपने माता-पिता की तरह भगवान गणेश की पूजा अराधना करते थे। हर साल गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर मोरया चिंचवाड़ से मोरगांव गणेश की पूजा करने के लिए पैदल जाया करते थे। कहा जाता है कि बढ़ती उम्र की वजह से एक दिन खुद भगवान गणेश उनके सपने में आए और उनसे कहा कि उनकी मूर्ति उन्हें नदी में मिलेगी और ठीक वैसा ही हुआ, नदी में स्नान के दौरान उन्हें गणेश जी की मूर्ति मिली। इस घटना के बाद लोग ये मानने लगे कि मोरया गोसावी गणपति बप्पा के सच्चे व अनन्य भक्त हैं। तभी से भक्त चिंचवाड़ गांव में मोरया गोसावी के दर्शन के लिए आने लगे। कहते हैं जब कोई भक्त मोरया गोसावी जी के पैर छूते तो संत मोरया अपने भक्तों से मंगलमूर्ति कहते थे और फिर ऐसे शुरुआत हुई मंगलमूर्ति मोरया की। जो जयकारा पुणे के पास चिंचवाड़ गांव से शुरू हुआ आज वो जयकारा पूरे देश में गणपति बप्पा के भक्तों द्वारा लगाया जाता है। पुणे के चिंचवाड़ में मोरया गोसावी का मंदिर भी है जहां प्रतिदिन भक्त मत्था टेकने आते हैं। मोरया गोसावी मंदिर में साल में दो बार विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है। एक तो भाद्रपद महीने में व दूसरा माघ महीने में जब मंदिर से पालकी निकलती है, जो मोरगांव के गणपति मंदिर में दर्शनों के लिए ले जायी जाती है। उसी तरह दूसरा उत्सव दिसंबर महीने में चिंचवाड़ गांव में ही मनाया जाता है जब बड़ी संख्या में देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और दिनभर चलने वाले धार्मिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हैं। मान्यता है कि मोरया गोसावी मंदिर में आने से अष्टविनायक के दर्शन-पूजन के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में न केवल बप्पा का अद्भुत रूप विराजमान है बल्कि बप्पा के परम भक्‍त मोरया गोसावी के साथ-साथ उनके आठ वंशजों की समाधि भी है जो गणपति के प्रति इनकी आस्था की कहानी सुनाती है।

-(डा.सुनील जोशी जी की फ़ेसबुक पेज से साभार)