प्राचीनकाल में पृथकता (आइसोलेशन) को अस्पृश्यता (छुआछूत) का नाम देकर जहां सवर्णों की बड़ी आलोचना की गई वहीं एक विशेष वर्ग को निन्दित व घृणास्पद समझने का कुत्सित प्रयास किया गया। मेरे देखे दोनों ही दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से प्रेरित अतिवादी दृष्टिकोण थे। वास्तविकता में पृथकता (आइसोलेशन) और अस्पृश्यता (छुआछूत) देश-काल-परिस्थिति के अनुसार की गई स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के अंग हैं जिन्हें उस दौर की आवश्यकता के अनुसार परिभाषित किया गया। जिस प्रकार आज "लाकडाउन"और "कर्फ़्यू" एक ही व्यवस्था के अंग हैं बस उन्हें परिभाषित करने का ढंग अलग है लेकिन दोनों ही व्यवस्थाओं का उद्देश्य एक है कि लोग घर से बाहर ना निकलें। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आज एकान्तवास (क्वारंटाइन) या पृथकता (आइसोलेशन) में रखे गए व्यक्ति
पापी या अपराधी नहीं हैं वे केवल एक संक्रामक रोग से पीड़ित हैं या हो सकते हैं, जो उनसे
किसी अन्य व्यक्ति या सम्पूर्ण समाज में फ़ैल सकता है। ठीक उसी प्रकार प्राचीन समय में जिन्हें
"शूद्र" कहा जाता था वे कोई अपराधी, पापी या घृणास्पद व्यक्ति नहीं
थे; वे केवल उनके द्वारा सम्पादित किए जाने वाले कार्यों के आधार पर स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा को देखते हुए समाज से एक सीमित
दूरी पर रखे जाते थे। सामाजिक स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु बनाई गई इस सीमित दूरी को वर्ग विशेष के तथाकथित ठेकेदारों ने मनुवादी सोच, छुआछूत व अस्पृश्यता का नाम देकर
समाज में एक गहरी खाई का निर्माण कर सामाजिक सौहार्द्र को समाप्त कर दिया। ज़रा सोचिए
जब आज के वैज्ञानिक युग में जहां मनुष्यता चांद को पददलित करने का दम्भ भरती है वहां
इस प्रकार के संक्रामक रोग का कोई ईलाज खोजना सम्भव नहीं हो पा रहा है; केवल
उस समय की छुआछूत व अस्पृश्यता (आज के दौर के क्वारंटाइन व आइसोलेशन) के, तो प्राचीन समय में ऐसे संक्रमित रोग का ईलाज खोजना भला कहां सम्भव हो पाता! ऐसे में तथाकथित छुआछूत
व अस्पृश्यता (क्वारंटाइन व आइसोलेशन); वास्तविकता में पृथकता, नितांत आवश्यक थी। अपितु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है इस विशुद्ध सामाजिक स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था को कुछ व्यक्तियों ने अपने अहंकार को परिपोषित करने का साधन बना लिया था किन्तु कुछ लोगों की नासमझी के कारण किसी आवश्यक व उपयोगी सिद्धान्त से उत्पन्न किसी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना भी अनुचित है। हम इस बात को स्वीकर करते हैं कि समय के साथ-साथ देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार की व्यवस्थाओं की समुचित समीक्षा कर उन्हें समाप्त या जारी रखने पर निर्णय लिया जाना भी आवश्यक होता है। आज समूचा विश्व इस बात को स्वीकार व इसका
समर्थन करने पर विवश है।
- पं. हेमन्त रिछारिया





