शनिवार, 19 जनवरी 2019

युगदृष्टा आचार्य रजनीश "ओशो"


19 जनवरी : निर्वाण तिथि विशेष


अध्यात्म जगत की चर्चा आचार्य रजनीश "ओशो" के बिना अधूरी है। "ओशो" एक ऐसे सम्बुद्ध सदगुरू हैं जिन्होंने मानवीय चेतना को धर्म की रूढ़िवादी बद्धमूल धारणाओं से मुक्त किया। "ओशो" ने किसी नवीन धर्म या पंथ का प्रतिपादन नहीं किया अपितु उन्होंने जनमानस का वास्तविक धर्म से साक्षात्कार कराया। वे भविष्य के मनुष्य को "ज़ोरबा दि बुद्धा" के रूप में गढ़ना चाहते थे। "ज़ोरबा दि बुद्धा" अर्थात् एक ऐसी मनुष्यता जो नृत्य कर सके; गीत गा सके, वहीं ध्यान की ऊँचाईयों को भी छूने जो समर्थ हो सके। "ओशो" ने इस जगत में एक हंसते हुए धर्म का आविर्भाव किया। उन्होंने अपने सन्देशों में नकारात्मकता दमन के स्थान पर सकारात्मकता ध्यान पर ही अधिक ज़ोर दिया। वे केवल एक ही बात का विशेष आग्रह अपने प्रवचनों में किया करते थे; वह है- ध्यान। "ओशो" का जन्म मध्यप्रदेश के कुचवाड़ा में 11 दिसम्बर 1931 को हुआ। उन्हें 21 वर्ष की आयु में संबोधि की प्राप्ति हुई। उन दिनों वे जबलपुर कालेज में पढ़ाया करते थे, वहीं से उन्हें "आचार्य" कहा जाने लगा। बाद में उन्हें "भगवान" के नाम से संबोधित किया जाने लगा जो थोड़ा विवादों में भी रहा। "भगवान" संबोधन के सम्बन्ध में "ओशो" की मान्यता थी "भगवत्ता को प्राप्त व्यक्ति" "ओशो" ने अपने संन्यासियों को निषेध दमन के स्थान पर ध्यान से जोड़ा। उन्होंने उन विषयों पर बहुत ही मुखरता से बोला जिनकी चर्चा करने में धर्म-जगत झिझकता है। "ओशो" अपने समय से बहुत पूर्व थे उनकी बातें सन्देश शायद उस समय उतने प्रासंगिक ना प्रतीत हो रहे हों जब वे देह में थे, किन्तु वर्तमान परिदृश्य में "ओशो" दिनों-दिन प्रासंगिक होते जा रहे हैं। आज इस जगत को "ओशो" जैसे ही सम्बुद्ध गुरुओं की आवश्यकता है। "ओशो" का सारा दर्शन प्रेम ध्यान पर आधारित था। वे परमात्मा का साक्षात्कार प्रेम ध्यान के माध्यम करने में विश्वास रखते थे। "ओशो" की देशनाओं से भारत ही अपितु विश्व के लगभग 19 देश प्रभावित हुए। इन देशों के अनेकानेक नागरिक "ओशो" के अनुयायी बने। अमेरिका में "ओशो" की प्रसिद्धि का अनुमान पाठक इस बात से भलीभांति लगा सकते हैं कि सन 1981 में अमेरिका के ओरेगन स्थित रेगिस्तान में ओशो अनुयायियों द्वारा "रजनीशपुरम् " नामक एक सम्पूर्ण नगर ही बसा दिया गया था। जहाँ लगभग 5000 से अधिक संन्यासी नियमित रूप से रहने लगे थे। विशेष अवसरों पर यहाँ देश-विदेश से आने वाले संन्यासियों की सँख्या दस से पन्द्रह हज़ार तक पहुँच जाती थी। अमेरिका ने उनकी इसी प्रसिद्धि को अपनी सम्प्रभुता के लिए खतरा मानकर उन्हें देश-निकाला दे दिया था। सुप्रसिद्ध लेखिका सू एपलटनने अपनी पुस्तकदिया अमृत पाया ज़हरमें अमेरिका की रोनाल्ड रीगन सरकार द्वारा "ओशो" को थेलियम नामक ज़हर दिए जाने की घटना का शोधपूर्ण रोमांचक विवरण प्रस्तुत किया है। स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रतिकूलताओं के कारण "ओशो" ने 19 जनवरी 1990 को पूना स्थित अपने आश्रम में सायं 5 बजे के लगभग अपनी देह त्याग दी। इस अवसर पर "ओशो" के पूर्व निर्देशानुसार उनके संन्यासियों द्वारा नाच-गाकर एवं समूह ध्यान कर उनका मृत्यु-महोत्सव मनाया गया। पूना स्थित आश्रम में ही "ओशो" का अस्थि- कलश स्थापित उनकी समाधि का निर्माण किया गया जहां आज भी देश-विदेश के हज़ारों संन्यासी आकर "ओशो" के द्वारा प्रवाहित ध्यान की सरिता में अवगाहन कर अपना जीवन धन्य करते हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


मंगलवार, 1 जनवरी 2019

जीवित शहीद: श्रीकृष्ण सरल

शताब्दी जयन्ती: 1-01-2019

                    "नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊँ,
                   'सरल' शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊँ।"
यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण सरल? यह हमारी विडम्बना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रान्तिकारियों के योगदान को हम तक पहुँचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियाँ, पत्नी के गहने यहाँ तक कि स्वयँ की जान भी दाँव पर लगा दी, उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालाँकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयँ परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रान्तिकारियों पर इसलिए लिखता हूँ जिससे आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍"जीवित-शहीद" की उपाधि से अलँकृतश्रीकृष्ण "सरल" सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल"  का जन्म 1 जनवरी 1919 को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पाँच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहान्त हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारम्भ कर दिया था। प्रारम्भ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रान्तिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रान्तिकारियों के जीवन को खँगालने के उद्देश्य से की। 15 महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से 125 पुस्तकें,45 काव्य-ग्रन्थ,4 खण्ड काव्य,31 काव्य संकलन,8 उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण सरल तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत् "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहाँ? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएँगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दाँव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है। वे कहते हैं-
                   "पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
                   फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

श्रीकृष्ण सरल जी के बारे में मत्तवपूर्ण बातें-
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1. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी ने अपना अधिकांश लेखन केवल क्रान्तिकारियों को केन्द्रित कर ही किया।
2. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी ने अपने निजी व्यय 10 से अधिक महाकाव्य, 4 खण्ड-काव्य, 125 पुस्तकें,
45 काव्य-खण्ड, 31 काव्य-संकलन एवं 8 उपन्यासों का प्रकाशन किया।
3. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी ने अपने लेखन हेतु प्रामणिक तथ्य संकलित करने के उद्देश्य से निजी व्यय से 10 देशों लगभग 10 लाख किमी से अधिक की यात्राएं की।
4. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी को अपनी स्वनाम-धन्य कृति "क्रान्ति-गंगा" को लिखने में 27 वर्षों का समय लगा।
5. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी को अपनी कृतियों महाकाव्यों के प्रकाशन हेतु अपनी सम्पत्ति तक बेचनी पड़ी।
6. शहीद भगतसिंह पर लिके महाकाव्य का विमोचन करने हेतु शहीदे-आज़म भगतसिंह की माताजी स्वयं श्रीकृष्ण सरल जी के आमन्त्रण पर उपस्थित हुई थीं।
7. जीवन पर्यन्त क्रान्तिकारियों पर अपनी लेखनी चलाने वाले राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी के प्रति सरकारों शासन का व्यवहार अधिकतर उपेक्षापूर्ण ही रहा।

श्रीकृष्ण सरल जी के बारे में विद्वानों का कहना है-
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1. “श्री सरल जीवित शहीद हैं। उनकी साहित्य-साधना तपस्या कोटि की है।
-महान क्रान्तिकारी पं. परमानन्द
2. “सरल जी का लेखन ऐतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है, वह नेताजी सुभाष और आजाद हिन्द फौज का स्थायी स्मारक सिद्ध होगा।
-कर्नल जी.एस.ढिल्लन, आजाद हिन्द फौज
3सरल साहब ने इतनी साहित्यिक ऊंचाई प्राप्त कर ली है कि उन्हें कोई भी अलंकरण छोटा ही पड़ेगा।
-भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंह जी
4. “सरल जी के लेखन का मूल्यांकन तो इतिहास ही कर सकेगा। हम तो केवल उनकी वन्दना कर सकते हैं।
-तत्कालीन सांसद श्री शंकरदयाल सिंह
5. “भारतवर्ष में शहीदों का समुचित श्राद्ध यदि किसी ने किया है; तो वह किया है कविवर श्रीकृष्ण सरल ने।
-पं. बनारसीदास चतुर्वेदी

-पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक, “सरल-चेतना