सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
सोमवार, 17 दिसंबर 2018
कैसा रहेगा नई सरकारों का कार्यकाल..!
हाल ही सम्पन्न हुए पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस आशातीत सफ़लता प्राप्त
कर तीन प्रमुख राज्यों में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई है। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़
में तो कांग्रेस ने 15 साल बाद सत्ता में वापसी की है। अब इन तीनों
प्रदेशों के निवासियों को इस बात को लेकर उत्सुकता है कि आखिर नई सरकार का कार्यकाल
कैसा रहेगा! क्या होगी नई सरकार के लिए चुनौतियां? हमने
"वेबदुनिया" के पाठकों के लिए तीन राज्यों में गठित हुई नवीन सरकारों के
शपथग्रहण के समय को आधार बनाकर इस प्रश्न का समाधान देने का प्रयास किया है-
1. मध्यप्रदेश-
मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया श्री कमलनाथ ने मेष लग्न में शपथग्रहण किया है। मेष
एक चर लग्न है। शपथग्रहण के समय मेष राशि का स्वामी मंगल लाभ भाव में स्थित था। चतुर्थ
भाव में राहु स्थित है। वहीं सत्ता व कर्मक्षेत्र के अधिपति शनि नवम भाव में अपने नैसर्गिक
शत्रु सूर्य के साथ स्थित हैं। धनेश शुक्र स्वराशिस्थ होकर सप्तम भाव में स्थित हैं।
इन ग्रहस्थितियों के आधार पर यह संकेत मिल रहा है कि आने वाले वर्षों में सरकार को
गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। मार्च 2020 के
बाद सरकार को जन-आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। इस अवधि में सरकार की लोकप्रियता में
तेजी से कमी आएगी। इस अवधि में सरकार को अस्थिर करने के प्रयास होंगे। जिनसे निपटना
सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती होगा। मार्च 2020 से मार्च 2021 के मध्य सरकार को भारी अन्तर्कलह से जूझना होगा। अक्टूबर 2020 के बाद सरकार के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की भी संभावना है। चूंकि
मेष एक चर लग्न है इसलिए सरकार के लिए अपनी स्थिरता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
धनेश का स्वराशिस्थ होना सरकार को आर्थिक मोर्चे पर कुछ सफ़लता का संकेत दे रहा है।
किन्तु लाभेश व आयेश का अपने नैसर्गिक शत्रु के साथ युतिकारक होना सरकार को नए वित्तीय
संसाधन में जुटाने में बड़ा अवरोध खड़ा करेगा। वर्ष 2021 से सरकार
की लोकप्रियता में निरन्तर कमी आएगी एवं उसे जन-आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। लग्नेश के लाभ भाव में स्थित होने के कारण सरकार हर प्रतिकूल परिस्थिति से निपटने
में सफ़ल होगी। सरकार के लिए मार्च 2020 से मार्च 2021 की अवधि बेहद चुनौतीपूर्ण रहेगी यदि इस अवधि की चुनौतियों पर सफ़लतापूर्वक
विजय प्राप्त कर ली जाती है तो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में सफ़ल होगी।
2. छत्तीसगढ़-
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने मिथुन लग्न में शपथ ली है। मिथुन एक
द्विस्वभाव लग्न है। शपथग्रहण के समय मिथुन राशि का स्वामी बुध छठे भाव स्थित था। मिथुन
लग्न में बुध चतुर्थेश अर्थात् जनता के कारक भी होते हैं। बुध पर राहु का दृष्टि प्रभाव
भी है। कर्मक्षेत्र व सत्ता का तात्कालिक कारक गुरु भी छठे भाव में स्थित है एवं गुरू
पर भी राहु का दृष्टि प्रभाव है। इन ग्रहस्थितियों के आधार पर यह संकेत मिल रहा है
कि छत्तीसगढ़ सरकार के लिए अपना कार्यकाल पूरा करना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। वर्ष 2020 में सरकार को गंभीर अन्तर्विरोध का सामना करना पड़ेगा। इस अवधि में सरकार के
मुखिया व नेतृत्व के प्रति अन्तर्कलह सामने आएगी। सत्तारुढ़ के दल के अन्दर ही नेतृत्व
परिवर्तन की मांग ज़ोर पकड़ेगी। मिथुन लग्न के स्वभाव एवं विंशोत्तरी दशाओं के आलोक में
वर्ष 2020-2023 के मध्य राज्य की सरकार
में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। धन भाव में राहु का स्थित होना सरकार के लिए वित्तीय
क्षेत्र में कठिनाईयों का संकेत कर रहा है। सरकार को आर्थिक मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों
का सामना करना पड़ेगा। वर्ष 2020 में सरकार की लोकप्रियता में
कमी आएगी। इस अवधि में सरकार के प्रति विपक्ष आक्रामक रहेगा। सरकार को जन-आक्रोश का
सामना करना पड़ेगा। लग्नेश की स्थिति व कर्मक्षेत्र पर क्रूर ग्रहों के प्रभाव के कारण
सरकार को अन्तर्विरोध के चलते अपना स्थायित्व बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि सरकार
इन चुनौतियों से सफ़लतापूर्वक निपट लेती है तो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में सफ़ल
रहेगी।
3. राजस्थान-
राजस्थान के
मुख्यमंत्री श्री अशोक गेहलोत
ने कुम्भ लग्न में
शपथग्रहण की थी। कुम्भ
एक स्थिर लग्न है।
कुम्भ लग्न का स्वामी
शनि सत्ता का नैसर्गिक
कारक होता है। शपथग्रहण
के समय लग्नेश शनि
लाभ भाव में स्थित
थे। यह एक बहुत
अनुकूल स्थिति है। इससे
यह स्पष्ट संकेत मिल
रहा कि राजस्थान सरकार
अपना कार्यकाल बड़ी
सफ़लता व सहजता के
साथ पूर्ण करेगी। सत्ता
व कर्मक्षेत्र के अधिपति
का लग्नस्थ होना सरकार
को स्थायित्व प्रदान
करेगा। धनेश व लाभेश
का केन्द्रस्थ होना
सरकार को आर्थिक मोर्चे
पर सफ़लता प्रदान करेगा।
सरकार अपने विकास कार्यों
को गति प्रदान करने
में कामयाब होगी। जनता
के तात्कालिक कारक
चर्तुर्थेश शुक्र का स्वराशिस्थ
होकर त्रिकोण भाव में
स्थित होना सरकार के
लोकप्रिय होने का संकेत
दे रहा है। सरकार
को जनता का प्रेम
व सहयोग प्राप्त होगा।
राहु का छठे भाव
में स्थित होने के
कारण सरकार अपने विरोधियों
से कुशलतापूर्वक निपटने
में सक्षम होगी एवं
सरकार पर विपक्ष हावी
नहीं हो पाएगा। अन्तिम
निष्कर्ष के रूप में
यह कहा जा सकता
है कि राजस्थान सरकार
शेष दो सरकारों की
तुलना में अधिक सहजता
व सफ़लता के साथ
अपना कार्यकाल पूर्ण
करेगी।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष
परामर्श केन्द्र
सम्पर्क:
astropoint_hbd@yahoo.com
रविवार, 18 नवंबर 2018
ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी को भावभीनी श्रद्धांजलि
![]() |
| ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी |
लोंगेवाला युद्ध के नायक ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का निधन 17 नवम्बर 2018 को मोहाली के एक निजी अस्पताल में हो गया। वह 78 वर्ष
के थे। इसे मीडिया का दोहरा चरित्र कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि वे किसी फ़िल्म के नायक से सम्बन्धित खबर को तो दिन भर अपने चैनलों पर दिखाते हैं किन्तु हमारे वास्तविक नायकों को जिन्होंने देश की रक्षा में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया होता है उनसे जुड़ी खबरों को प्रमुखता से प्रदर्शित नहीं करते। वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मेजर रहे चांदपुरी ने राजस्थान के लोंगेवाला की प्रसिद्ध लड़ाई में महज 120 जवानों के साथ, पाकिस्तानी टैंकों के हमले का डटकर सामना किया था और उन्हें खदेड़ दिया था। विदित हो कि फ़िल्म "बार्डर" उनकी सन 1971 के भारत-पाक युद्ध पर उनकी वीरता पर आधारित थी जिसमें सनी देओल उनका ही किरदार निभाया था।
ब्रिगेडियर चांदपुरी का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब के मोंटागोमरी में 22 नवंबर 1940 को एक गुर्जर सिख परिवार में हुआ था। उनके जन्म के बाद उनका परिवार उन्हें लेकर चांदपुर रूड़की आ गया था। 1962 में उन्होंने इंडियन आर्मी जॉइन कर ली थी। उन्होंने 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया था। लोंगेवाला में जिस वक्त पाकिस्तान ने हमला किया उस वक्त वो वहां पर मेजर के पद पर थे। अपने रिटायरमेंट के वक्त वे ब्रिगेडियर के पद पर थे। टैंकों के खिलाफ वीरता से खड़े होने और दुश्मन को पीछे हटने के लिए मजबूर करने के लिए उन्हें महावीर चक्र व विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था।
भारतीय सेना के गौरव ब्रिगेडियर स्व. श्री कुलदीप सिंह चांदपुरी को "सरल-चेतना" परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि...
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
(सम्पादक, "सरल-चेतना")
रविवार, 28 अक्टूबर 2018
आओ अबकी दीवाली कुछ यूं मनाएँ....विनम्र निवेदन
मित्रों, कुछ दिनों के बाद दीपावली है। बाज़ारों में चहुंओर रौनक ही रौनक है। हम सब इन दिनों तरह-तरह की खरीददारी करते हैं। इनमें सजावटी साजो-सामान से लेकर पूजा-पाठ तक की वस्तुएँ होती है। मुझे अधिक भीड़ अक्सर सजावटी सामान की लक-दक दुकानों पर दिखाई देती है जिसमें प्लास्टिक इत्यादि की फ़ूल मालाएँ, पेंटिंग व रंगीन लाईटें प्रमुख होती हैं। इन दुकानों पर सामान्यत: मोल-भाव नहीं होता क्योंकि ये दुकानदार अक्सर अपनी वस्तुओं के बताए मूल्य पर अड़े रहते हैं और उनकी इस बेमानी सी ज़िद के आगे हमें झुकना पड़ता है क्योंकि इन्हीं वस्तुओं को हम प्रदर्शित कर पाते हैं अर्थात् ये सारी वस्तुएँ प्रदर्शन के काम आती हैं। वहीं मेरी नज़र कुछ ऐसे दुकानदारों और बच्चों पर पड़ी जो नीचे ज़मीन पर बैठकर अपनी सामान्य सी वस्तुओं का विक्रय कर रहे थे जैसे रुई की पौनी, मोरपंख, खील-बताशे, मिट्टी के दीपक इत्यादि। किन्तु यह देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि इन दुकानदारों से लोग बड़ा मोल-भाव कर रहे थे। एक-एक पैसे को लेकर खींचतान मची हुई थी और अन्तत: उस बेचारे निरीह दुकानदार को इन चतुर चालाक क्रेताओं के आगे नतमस्तक हो झुकना पड़ रहा था। मेरा निवेदन है कि सजावटी सामानों की खरीद से दुकान अथवा शोरूम की सजावट का एक नया आयाम जुड़ता है किन्तु इन ज़मीन पर बैठे दुकानदारों की वस्तुओं की खरीद से इनके घर का चूल्हा जलता है; इनके घर दीप जलता है। इस दीपावली क्यों ना हम इनके घरों में दीप जलाने सँकल्प करें। अत: इस प्रकार के दुकानदारों से अतिशय मोल-भाव ना करें।
"आओ अबकी दीवाली कुछ यूं मनाएँकिसी बेबस के घर का दिया जलाएँ।"
दीपावली की शुभकामनाओं के साथ-
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
बुधवार, 17 अक्टूबर 2018
शमी पूजन कर मनाएं विजयादशमी-
नवरात्र की पूर्णता के साथ ही देशभर में विजयादशमी का पर्व
मनाया जाएगा। विजयादशमी का पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का सन्देश देता है। विजयादशमी
पर्व है संकल्प का कि हम अपने अन्तर्तम में उपजी बुराईयों पर विजय प्राप्त कर सन्मार्ग
पर अग्रसर हो सकें। देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी का पर्व अपनी-अपनी लोकपरम्पराओं
के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन रावण दहन भी किया जाता है जो बुराई एवं अहंकार का
प्रतीक है। विजयादशमी के दिन शस्त्रपूजा एवं शमी वृक्ष की पूजा का विशेष महत्त्व होता
है। विजयादशमी के दिन देश के कुछ हिस्सों में अश्व-पूजन भी किया जाता है। सनातन धर्मानुसार
विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमी वृक्ष का पूजन अवश्य किया जाना चाहिए। आईए जानते
हैं कि शमीवृक्ष का पूजन किस प्रकार किया जाना श्रेयस्कर रहता है-
- विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमीवृक्ष के समीप जाकर उसे प्रणाम
करें। तत्पश्चात् शमीवृक्ष की जड़ में गंगालज/नर्मदाजल/शुद्धजल
का सिंचन करें। जल सिंचन के उपरान्त शमीवृक्ष के सम्मुख दीपक प्रज्जवलित करें। दीप
प्रज्जवलन के पश्चात् शमीवृक्ष के नीचे कोई सांकेतिक
शस्त्र रखें। तत्पश्चात् शमीवृक्ष एवं शस्त्र का
यथाशक्ति धूप,दीप,नैवेद्य,आरती से पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। पूजन
के उपरान्त हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करें-
"शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता॥"
-अर्थात् हे
शमी वृक्ष आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन
का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा
की, हम भी करेंगे। हमारी विजय के रास्ते में आने वाली
सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।
-प्रार्थना उपरान्त यदि आपको शमीवृक्ष के समीप शमीवृक्ष की कुछ
पत्तियां गिरी मिलें तो उन्हें आशीर्वाद स्वरूप ग्रहण कर लालवस्त्र में लपेटकर सदैव
अपने पास रखें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपको शमीवृक्ष से स्वयमेव गिरी पत्तियां
ही एकत्र करना है शमीवृक्ष से पत्तियां तोड़नी नहीं हैं। इस प्रयोग से आप शत्रुबाधा
से मुक्त एवं शत्रु पराभव करने में सफ़ल होंगे।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
धर्म, आस्था और न्यायपालिका
विगत कुछ दिनों में देश की न्यायपालिका से कुछ ऐसे फ़ैसले आए जिन्हें स्वीकारने में समाज के एक बड़े वर्ग ने झिझक महसूस की। कुछ फ़ैसले सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे, वहीं कुछ धार्मिक क्षेत्र से। इन फ़ैसलों ने देश में चिन्तन का एक नया अध्याय प्रारम्भ किया। समाज का प्रत्येक वर्ग इन फ़ैसलों को अपनी बुद्धिमत्ता के अनुसार अपनी तर्कसरणी की कसौटी पर कसकर जाँचने-परखने लगा और इन फ़ैसलों के पक्ष व विपक्ष में खड़ा होने लगा। अब प्रश्न यह उठता है कि लैंगिक समानता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और निजता के अधिकार की ढ़ाल के पीछे छिपकर अपनी सनातन सँस्कृति पर प्रहार करना कहाँ तक उचित व स्वीकार्य है। भारतीय मनीषा को इस यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही होगा। ईश्वर ने सभी व्यक्तियों को समान बनाया है यह बात सत्य है लेकिन इस समानता का आधार क्या है! क्या इस तथ्य को जानने व समझने का प्रयास कभी किया गया है? ईश्वर की बनाई समानता और इस समानता का तर्क देकर प्रकृति प्रदत्त विभेद को मिटाने का प्रयास दो विपरीत बाते हैं। जैसे ईश्वर ने प्रत्येक स्त्री-पुरूष को आत्मा व सात चक्रों के आधार पर समानता प्रदान की है किन्तु प्रकृति ने स्त्री-पुरूषों में शारीरिक भेद भी किया है। प्रकृति द्वारा किया गया यह भेद किसी भी प्रकार से नहीं मिटाया जा सकता। जो लैंगिक समानता की बातें करते हैं वे मूलरूप में अपने अहंकार को तुष्ट करने की बात करते हैं क्योंकि हमारे सनातन धर्म में कहीं भी स्त्री-पुरूषों में श्रेष्ठ व निकृष्ट का कोई भेद नहीं किया गया है। जिसे कुछ लोग असमानता समझने की भूल करते हैं वास्तविक रूप में वह स्त्री-पुरूष की विशिष्टताएँ हैं जो एक-दूसरे के समान नहीं हो सकती। स्त्री को जो विशिष्टताएँ प्राप्त हैं वह पुरूषों में नहीं हो सकती जैसे गर्भधारण व सन्तान को जन्म एवं उसे पोषण देना, ठीक पुरूषों में कुछ विशिष्टताएँ हैं जो स्त्री में नहीं हो सकती। हमारे सनातन धर्म में कई ऐसे कर्मकाण्ड हैं जिनमें स्त्रियों को वरीयता प्राप्त है इसका जीवन्त उदाहरण है- नवरात्रि में कन्या पूजन। हिन्दू देवी-देवताओं के नामों में भी अक्सर प्रथम नाम स्त्रीसूचक ही होता है जैसे राधाकृष्ण, लक्ष्मीनारायण, सीताराम आदि। इन बातों को श्रेष्ठ व निकृष्ट में बाँटकर सामाजिक सौहार्द को विखण्डित करना सर्वथा अनुचित है। अब बात करें लोक परम्पराओं व मान्यताओं की, तो हर देश; हर समाज; हर वर्ग एवं हर क्षेत्र की कुछ अपनी मान्याएँ होती हैं जिनसे सामाजिक ताना-बाना सुदृढ़ होता है। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार समय-समय पर इन मान्यातों व परम्पराओं की समीक्षा होकर इनमें परिवर्तन भी होता रहता है किन्तु लोक-परम्पराओं व मान्यताओं में होने वाला यह परिवर्तन यदि जागरूकता के आधार पर होता है तब यह अधिक सुदृढ़ व ग्राह्य होता है। यदि यह परिवर्तन बलपूर्वक एक-दूसरे को नीचा दिखाकर जय-पराजय के उद्देश्य से किया जाता है तब यह सामाजिक विद्वेष का कारण बनता है। हमारे मतानुसार धर्म एक व्यवस्था है जो व्यवस्था बनाने में सहायक होता है वही धार्मिक है और जो व्यवस्था बिगाड़ता है वह अधार्मिक है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, साधना तो केवल उस जन्म से प्राप्त ईश्वर के अंश को अनुभूत करने मात्र की है। जब श्रद्धा से कहीं पर भी शीश झुका दिया जाता है तत्क्षण वहीं परमात्मा अवतरित हो जाता है और वह स्थल मन्दिर बन जाता है। भक्त और भगवान के मध्य ना तो मन्दिर की आवश्यकता है और ना ही किसी विशिष्ट कर्मकाण्ड या पूजा-पद्धाति की। भक्त और भगवान के मध्य यदि कुछ अनिवार्य है तो वह है-प्रेम। अब इस प्रेम को श्रद्धा कहें, भक्ति कहें, भाव कहें, पूजा-पद्धति कहें, या फ़िर लोकमान्यता कहें, जो भी नाम देना चाहें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जब भक्त का भाव ईश्वरानुराग में लग जाता है तब उसे किसी बाहरी वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं होती। लोकपरम्पराओं व मान्यताओं के मध्य खींचतान अहंकार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अत: सामाजिक सौहार्द के लिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए है कि इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप यदि आवश्यक हो तो वह जागरूकता के आधार पर हो ना कि बल के आधार पर। तभी हम हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ समाज दे पाएँगे।
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
सोमवार, 15 अक्टूबर 2018
महाआहुतियां अर्पण कर पाएं देवी का आशीर्वाद
नवरात्र के नौ दिनों में श्रद्धालुगण पूर्ण श्रद्धाभाव से देवी की आराधना करते हैं। नवरात्र के नौ दिन यथाशक्ति भगवती की पूजा-अर्चना के उपरान्त अन्तिम दिवस "महानिशा-पूजा" की जाती है। जिसमें राजराजेश्वरी माँ जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु हवन किया जाता है। हमारे सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता हवन के माध्यम से ही की जाती है। देवी जी की आराधना में हवन का विशेष महत्त्व होता है। हवन के उपरान्त कन्या-भोज कराया जाता है। श्रद्धालुगण "महानिशा-पूजा" का हवन यथाशक्ति व सामर्थ्य अनुसार सम्पन्न कर सकते हैं। किन्तु जिन श्रद्धालुओं द्वारा नवरात्र में दुर्गासप्तशती के सम्पूर्ण तेरह अध्यायों का पाठ किया गया हो उन्हें दुर्गासप्तशती के मन्त्रों से हवन करना एवं प्रत्येक अध्याय की विशेष आहुति जिसे "महाआहुति" कहा जाता है, अर्पण करना श्रेयस्कर रहता है। जो श्रद्धालुगण सप्तशती के मन्त्रों से हवन करने के स्थान पर मात्र देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का पाठ कर हवन एवं महाआहुतियाँ अर्पण करना चाहते हैं वे देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की माला के उपरान्त प्रत्येक का अध्याय के निर्दिष्ट मन्त्र का उच्चारण करके माँ दुर्गा को "महाआहुति" अर्पण कर सकते हैं।
1. पहला अध्याय-
मन्त्र- ॐ महाकाल्यै स्वाहा
महाआहुति- कमलगट्टा, काली मिर्च, शहद, महुआ, राई
2. दूसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- जायफ़ल, जावित्री, कद्दू, पीली सरसों, राई
3. तीसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- उड़द का बड़ा
4. चौथा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- पंचमेवा व छुआरा (खारक)
5. पांचवा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महासरस्वत्यै स्वाहा
महाआहुति- शक्कर व गन्ना
6. छ्ठा अध्याय-
मन्त्र- ॐ धूम्राक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- जासौन का फ़ूल
7. सातवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ चामुण्डायै स्वाहा
महाआहुति- बीला (बिल्वफ़ल), बिल्वपत्र, पालक
8. आठवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ रक्ताक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- रक्त चन्दन
9. नौवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भैरव्यै तारा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- केला, नागरमोंथा, अगर, तगर
10. दसवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भगवत्यै स्वाहा
महाआहुति- बिजोरा नींबू
11. ग्यारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ नारायण्यै स्वाहा
महाआहुति- खीरपूड़ी
12. बारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ राजराजेश्वर्यै स्वाहा
महाआहुति- दाड़िम (अनार)
13. तेरहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ दुर्गा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- श्रीफ़ल
-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
सदस्यता लें
संदेश (Atom)







