रविवार, 17 दिसंबर 2017

क्या वर्ष बदलने से बदलेगा आपका भाग्य..!


अंग्रेजी नववर्ष 2018 आने वाला है। नववर्ष के आगमन के हर्ष के साथ सभी को उत्सुकता है कि उनके लिए यह नववर्ष कैसा रहेगा? समाचार-पत्रों, न्यूज़ चैनलों इत्यादि पर ज्योतिषाचार्यों, टैरोकार्ड रीडर, अंक ज्योतिषियों की आपका भविष्य बताने वाली गणनाएँ प्रसारित हो रही हैं। जिनकी राशि या मूलाँक में शुभफ़ल बताया जा रहा है वे प्रफ़ुल्लित हैं वहीं अशुभ फ़ल वाले जातक मायूस हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से आपके भविष्य में कोई बड़ा परिवर्तन या बदलाव नहीं आता है। आप जिसे वर्षफ़ल समझ रहे है वह केवल "गोचर" गणना है। जो प्रतिमाह परिवर्तित होती है। कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने के अवसर पर "वर्षफ़ल" के नाम पर जातक के पूरे वर्ष का फ़लित बताना उचित नहीं है क्योंकि गोचर आधारित गणनाएँ प्रतिमाह परिवर्तित होती रहती हैं। ज्योतिष शास्त्र में "गोचर" का महत्त्वपूर्ण स्थान है लेकिन जातक का भविष्यफ़ल बताने में इसकी गणनाओं को 10 से 15 फ़ीसदी ही मूल्य दिया जाता है। फ़िर वर्षफ़ल क्या होता है? सही मायने में "वर्षफ़ल" आपके प्रत्येक जन्मदिन से परिवर्तित होता है ना कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से। इसमें आपके नवीन वर्ष की "वर्ष-कुण्डली" बनाकर आपका वर्षफ़ल बताया जाता है। किसी जातक का भविष्यफ़ल बताने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक उसकी जन्मपत्रिका के मुख्य व महत्त्वपूर्ण शुभाशुभ योग, ग्रहस्थिति, विंशोत्तरी दशाएँ, योगिनी दशाएँ, गोचर, और अन्त में उस जातक का वर्षफ़ल होते हैं। वर्षफ़ल में "मुँथा" एवं "मुँथेश" का विशेष महत्त्व होता है। "मुँथा" एवं "मुँथेश" की स्थिति का जातक के वर्षफ़ल में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।

मुँथा का निर्धारण- 

जातक की जन्मलग्न सँख्या में उसकी वर्तमान आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचता है उस राशि की "मुँथा" होती है। "मुँथा" राशि के स्वामी ग्रह को "मुँथेश" कहते हैं।

मुँथा की स्थिति-

यदि जातक की वर्षकुण्डली में "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 4.6.८.12 स्थानों में स्थित हो एवं पाप ग्रहों से दृष्ट हो जातक को उस वर्ष कष्ट एवं कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। वहीं यदि "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 2.3.9.12 में हो तो यह शुभ होती है। जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम् राशि का वर्षलग्न अशुभ होता है।
"वर्षफ़ल" का विषय अत्यन्त वृहद् व विस्तृत है। हमने यहाँ वास्तविक वर्षफ़ल का परिचय कराने के उद्देश्य मात्र से उपर्युक्त सँक्षिप्त जानकारी आप पाठकों को दी है। अत: यदि कैलेण्डर के वर्षफ़ल बदलने पर किसी भविष्यवक्ता की गणना आपके पक्ष में नहीं है या आपकी राशि के लिए उसका फ़ल अशुभ है तो चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारा विश्वास है कि अब आप "वर्षफ़ल" के विषय में भलीभाँति जान गए होंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astrpoint_hbd@yahoo.com

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

मुख्यमंत्री की यात्राएँ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जिन्हें प्रदेशवासी प्यार से ’मामा’ कहते हैं, उनका चुनावी तैयारी का अँदाज़ ही निराला है। वे चुनावी यात्रा निकालने में बड़े माहिर है और मजे की बात यह कि वे इस प्रकार की यात्राएँ धर्म के नाम पर करते हैं। पहले "नर्मदा सेवायात्रा" और अब "एकात्म यात्रा"। इन यात्राओं का उद्देश्य वैसे तो धार्मिक बताया जाता है लेकिन असल में ये होतीं चुनावी यात्राएँ ही हैं। इन यात्राओं के प्रचार-प्रसार में करोड़ों रूपए खर्च कर दिए जाते हैं केवल यह जानने के लिए कि हवा का रुख़ किस तरफ़ है। ’मामा’ आप निश्चिंत रहिए जब तक मध्यप्रदेश में किसी ’मौसा’ (सशक्त विपक्ष) का आगमन नहीं होता तब तक आप मज़े से "मेरी मर्ज़ी...." वाली तर्ज पर राज कीजिए। क्योंकि आपको सत्ता के सिंहासन उतारने के लिए मुद्दों की नहीं एक ’मौसा’ की अर्थात् सशक्त विपक्षी नेतृत्व की आवश्यकता है। मुद्दे तो वैसे ही प्रदेश में भरे पड़े हैं। आपसे रेत का अवैध उत्खनन रुक नहीं रहा, कोई नया उद्योग लग नहीं रहा, मेट्रो प्रोजेक्ट लगाने वाली कम्पनी ’ज़ायका’ ने अपने ऋण की सुरक्षा ना पाकर इस प्रोजेक्ट से अपने पैर वापस खींच लिए। किसानों में नाराजगी व्याप्त है, भले किसानों पर गोली चलवा कर आप आँदोलन को दबाने में सफ़ल हो गए हों। टीकाकरण में हमारा प्रदेश बहुत पीछे है। महिलाओं के साथ हुए अपराध में मध्यप्रदेश अव्वल है। सरप्लस बिजली उत्पादन के बावजूद हमारा प्रदेश सबसे महँगी बिजली दर वाले प्रदेशों से में से एक है। ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसे कई मुद्दे हैं जो आपके माथे पर बल डालने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन जनता विवश है उसके पास ’मामा’ के रुप में आप तो हैं लेकिन विकल्प के रूप में कोई ’मौसा’ नहीं हैं अर्थात् शक्तिशाली विपक्ष। मेरे देखे विवशता और विकल्प के अभाव में होने वाली विजयश्री खोखली व हल्की होती है। जब इसी आधार पर विजयश्री की निरन्तर पुनरावृत्ति होती है तब एक दिन क्रान्ति होती है और लोकतन्त्र में स्वर गूँजता है "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..."। इससे पहले कि ये स्वर हमारे प्रदेश में गुँजायमान हो, आत्ममँथन कीजिए और अपनी कमियों में सुधार कर प्रदेश के वास्तविक विकास में सँलग्न हो जाईए। जिस दिन आप विकास के आधार पर विजयश्री प्राप्त करेंगे उसी दिन आप सही मायनों में सफ़ल माने जाएँगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 27 नवंबर 2017

शुभ..मंगल..सावधान


हमारे षोडश सँस्कारों में "विवाह" एक अति महत्त्वपूर्ण व मुख्य सँस्कार माना गया है। क्या आप जानते हैं कि विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय किन दोषों का गँभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है? यदि नहीं, तो आईए आज हम आपको बताते हैं कि विवाह मुहूर्त्त निकालते समय किन प्रमुख दोषों का त्याग करना चाहिए।

"लत्तादोष"-

विवाह का दिन निर्धारण करते समय "लत्तादोष" का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। "लत्तादोष" का निर्धारण नक्षत्र एवं ग्रहों की स्थिति से होता है। जैसा कि "लत्ता" नाम से स्पष्ट इसका आशय ग्रहों की लात से होता है। सूर्य जिस नक्षत्र पर होता है उससे आगे के बारहवें नक्षत्र पर, मंगल तीसरे पर, शनि आठवें पर एवं गुरू छठवें नक्षत्र पर लात मारता है। ठीक इसी प्रकार कुछ ग्रह अपने से पिछले नक्षत्र पर लात मारते हैं जैसे बुध सातवें, राहु नौवें, चन्द्र बाईसवें, शुक्र पांचवे नक्षत्र पर लात मारता है। राहु वक्री होने के कारण इसकी गणना अगले नक्षत्र को मानकर ही की जाती है। "लत्तादोष" में विवाह के नक्षत्र से गणना कर नक्षत्रों में स्थित ग्रहों का विवेचन कर उनकी "लत्ता" का निर्धारण किया जाता है। वैसे तो सभी ग्रहों की "लत्ता" को अशुभ माना जाता है किन्तु कुछ विद्वान केवल पाप व क्रूर ग्रहों की "लत्ता" को ही त्याज़्य मानते हैं। अत: विवाह का मुहूर्त्त निकालते समय "लत्तादोष" का विवेचन अवश्य करें।

"वेध" दोष-

विवाह में "वेध दोष" को सर्वत्र वर्जित माना गया है। यदि विवाह मुहूर्त्त वाले दिन "वेध दोष" हो तो विवाह नहीं करना चाहिए। "वेध दोष" का निर्धारण में पंचांग में दिए "पंचशलाका" व "सप्तशलाका" चक्र का परीक्षण कर होता है। विवाह के अतिरिक्त "वेध दोष" को वरण एवं वधूप्रवेश के लिए भी त्याज्य माना गया है। शास्त्रानुसार एक रेखा में आने वाले नक्षत्रों का परस्पर वेध माना गया है। विवाह नक्षत्र का जिस भी नक्षत्र के साथ "वेध" हो यदि उस नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो इसे "वेध-दोष" माना जाएगा। जैसे पंचांग में दिए सप्तशलाका चक्र में "रेवती" नक्षत्र का "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र के साथ वेध है। अब यदि विवाह का नक्षत्र "रेवती" है तो "वेध दोष" निवारण के लिए "उत्तरा-फ़ाल्गुनी" नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित नहीं होना चाहिए, यदि उत्तरा-फ़ाल्गुनी नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हुआ तो यह "वेधदोष" माना जाएगा। विवाह में यह दोष सर्वत्र विचारणीय व त्याज्य है।

"जामित्र दोष"-

ज्योतिष शास्त्र में सप्तम भाव से दाम्पत्य सुख एवं जीवनसाथी का विचार किया जाता है। इसे "जाया" भाव या "जामित्र" भाव कहा जाता है। इस भाव से सम्बन्धित दोष को "जाया दोष" या "जामित्र" दोष कहते हैं। "जामित्र" दोष में विवाह करना सर्वथा घातक होता है। इसके फ़लस्वरूप भावी दम्पत्ति दाम्पत्य सुख से वंचित रह सकते हैं। विवाह मुहूर्त्त में लग्न का निर्धारण करते समय यदि चन्द्र लग्न या लग्न से सप्तम स्थान में कोई भी ग्रह; चाहे वह पूर्ण चन्द्र ही क्यों ना हो, स्थित हो तो इसे "जामित्र" दोष कहा जाता है। इस दोष विवाह में करना घातक होता है। अत: विवाह लग्न का निर्धारण करते समय "जामित्र" दोष का परीक्षण कर इसे त्यागना उचित व हितकर रहता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 18 नवंबर 2017

’पद्मावती" का रण


किरीतार्जुन शास्त्र का एक वाक्य है- "यद्यपि शुद्धम् लोकविरूद्धम् ना करणीयम् ना आचरणीयम्" अर्थात् यदि कोई बात सत्य व शुद्ध भी हो लेकिन समाज के विरुद्ध हो तो उसे व्यवहार में नहीं लाना चाहिए। इन दिनों संजय लीला भंसाली की फ़िल्म को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। राजपूत समाज, राजपरिवार व करणी सेना सहित कई क्षत्रिय संगठन इस फ़िल्म का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। क्षत्रिय संगठनों का उनका आरोप है कि भंसाली ने उनके इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया है वहीं फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली इस बात से साफ़ इनकार कर रहे हैं। बहरहाल, ताज़ा जानकारी के अनुसार सेंसर बोर्ड ने भंसाली का आवेदन अधूरा होने के कारण फ़िल्म को वापस लौटा दिया है। सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली के अनुसार अब फ़िल्म को जनवरी 2018 में प्रमाण-पत्र मिलने की उम्मीद है। इसका मतलब यह हुआ कि फ़िल्म "पद्मावती" अब जनवरी 2018 में ही रिलीज़ हो पाएगी। फ़िल्म रिलीज़ होगी भी या नहीं यह सेंसर बोर्ड को तय करना है लेकिन इससे पूर्व कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म "पद्मावती" को बनाने के पीछे उद्देश्य क्या है? क्योंकि कुछ पत्रकार व विद्वान बार-बार कह रहे हैं कि जौहर का महिमामण्डन नहीं होना चाहिए। जहाँ तक रानी "पद्ममिनी" की प्रसिद्धि का प्रश्न है तो उनकी प्रसिद्धि ही जौहर (वीरतापूर्वक आत्मबलिदान) के कारण है फ़िर तो भंसाली स्वयं जौहर का महिमामण्डन कर रहे हैं। फ़िल्म कोई नवीन ऐतिहासिक जानकारी भी प्रदान नहीं करती। रानी "पद्ममिनी" की कहानी सभी को पता है। वहीं फ़िल्म (जैसा कि ट्रेलर देखकर लगा) रानी "पद्ममिनी" की गरिमा को कम अवश्य करती नज़र आ रही है। इस फ़िल्म को लेकर देश के साथ-साथ बालीवुड भी दो धड़ों में बँटा नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ लोग विरोध। इसके समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि फ़िल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्ममिनी का कोई दृश्य नहीं है। यह बात भले ही सत्य हो लेकिन जैसा फ़िल्म के ट्रेलर में दिखाया जा रहा है उसे देखकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई समाज या स्वयं इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपने पूर्वजों का प्रणय-दृश्य देखना पसन्द करेंगे? नहीं ना...। कोई भी सभ्य व्यक्ति या समाज अपने आराध्य व मान्य पूर्वजों का "प्रणय-दृश्य" देखना पसन्द नहीं करेगा। अलाउद्दीन खिलजी के साथ रानी पद्ममिनी के दृश्यों की बात बहुत दूर की है। जहाँ तक राजपरिवारों की गरिमा व मर्यादा की बात है तो "पद्ममिनी" का अभिनय करने वाली अभिनेत्री के राजा रतनसिंह का चरित्र निभाने वाले अभिनेता के साथ दिखाए गए "प्रणय-दृश्य" भी आपत्तिजनक है। यदि भंसाली की नीयत इतनी ही साफ़ थी तो उन्होंने सेंसर बोर्ड को दिए अपने आवेदन-पत्र में फ़िल्म के "ऐतिहासिक या काल्पनिक" वाला स्थान (कालम) रिक्त क्यों छोड़ा? वे इस फ़िल्म को एक "काल्पनिक" फ़िल्म बताकर विवाद समाप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब आप किसी के पूर्वजों पर फ़िल्म बनाते हैं तो उनकी सहमति आवश्यक है। क्योंकि आप इतिहास से छेड़छाड़ करने के अधिकारी नहीं हैं फ़िर चाहे वह इतिहास किसी देश का हो या किसी राजपरिवार का। मेरे देखे अब समय आ गया है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के लिए सेंसर बोर्ड के अन्तर्गत उप-समीतियाँ गठित होनी चाहिए। जैसे इतिहासकारों की समीति, धर्मगुरूओं की समीति...क्योंकि इन मुद्दों पर आधारित फ़िल्मों की पटकथा को परखने के लिए इन क्षेत्रों के विद्वानों की राय व अनुशंसा महत्त्वपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

पिता की पाती


मेरा गर्व मेरा अभिमान हो तुम,
मेरे घर की शान मेरी मुस्कान हो तुम,
मेरा मान हो; सम्मान हो तुम,
तुम हो प्राणवायु मेरी,
मेरे सारे अरमान हो तुम।
तुम मरी पहचान हो,
मेरे लिए वरदान हो तुम,
भगवान का अहसान है
मेरे घर विराजमान हो तुम,
तुम सदा हँसती रहो
सदा सुखी रहो,
मेरा सारा जहान हो तुम।
मेरी आयु तुम्हें मिल जाए
मेरे लिए भगवान हो तुम,
मेरा गर्व मेरा अभिमान हो तुम॥

- तेजमोहन पटेल, होशंगाबाद (म.प्र.)
(सहा. पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी)

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

नेताजी का कमरा


कोलकाता के एल्गिंन रोड स्थित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के घर का वह कमरा जिससे उन्होंने 16-17 जनवरी 1941 की मध्यरात्रि "महानिष्क्रमण" किया था।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

चाहत


तुम मुझसे बात न करो
और मैं तुमसे मिल न पाऊँ
इसकी रत्ती भर शिकायत नहीं मुझे
लेकिन, कम से कम इतना तो चाहती हूँ
कि तुम्हारी गँध इन हवाओं में बरकरार रहे,
तुम्हारा स्पर्श यूँ ही छूता रहे,
फ़ूलों, दरख़्तों, छायाओं, लहरों पर।
तुम्हारी मन्द मुस्कान और आँखों की नमी,
चाँद-तारों सी टँकी रहे आसमान पर,
तुम्हारी थिरकती उँगलियों से
उठती हुई ताल बजती रहे,
मेरे आस-पास।
तुम्हारा गीत गूँजता रहे दिशाओं में,
बस...इतना ही तो चाहती हूँ मैं।

-रोज़लीन, करनाल (हरियाणा)