फ़िल्म "उड़ता पंजाब" विवाद में बाम्बे हाईकोर्ट अपना फ़ैसला सोमवार को सुनाएगा लेकिन सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा देखकर मजमून भांपने की तर्ज़ पर सभी को पता चल ही गया होगा कि फ़ैसला क्या आने वाला है। हाईकोर्ट ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह दर्शकों को तय करने दें कि उन्हें क्या देखना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है फ़िल्म को सेंसर करना नहीं।" मैं उच्च न्यायालय का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूं कि क्या किसी आपत्तिजनक सामग्री वाली फ़िल्म (यदि है तो) को सिर्फ़ इस आधार पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसे देखने का निर्णय दर्शक करेंगे, नहीं। क्योंकि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तो बहुत कुछ आपत्तिजनक भी देखना पसन्द करता है और लुक-छिप कर देखता भी है। जब दर्शकों की पसन्द-नापसन्द ही आधार है तो यदा-कदा "पोर्न साइट्स" पर क्यों बैन लगाने की मांग उठती है। फ़िर क्यों किसी विधायक को विधानसभा में "पोर्न वीडियो" देखने पर निलंबित कर दिया जाता है? किसी भी अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री को समाज में प्रवाहित होने से बचाना मार्गदर्शकों का दायित्व है। एक ज़माना था जब अत्यधिक हिंसक कथानकों वाली फ़िल्में भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होती थीं। फ़िल्मों के माध्यम से आज का युवा अपना आदर्श गढ़ता है, वह फ़िल्म के नायक की भांति अपने आप को बनाना चाहता है यदि फ़िल्म किसी ऐसे नायक को प्रस्तुत करती है जो सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करता हो तो ऐसी फ़िल्मों को निश्चित ही सार्वजनिक प्रस्तुतिकरण से रोकना चाहिए। आज जहां बच्चे-बच्चे के हाथों में इंटरनेट युक्त मोबाईल है द्रुत गति से चलने वाला इंटरनेट हैं वहां आप कहां इस बात का निर्णय दर्शकों पर छोड़ सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है ये वही तय करें। जैसा कि माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है, तो फ़िल्म सेंसर बोर्ड वही कार्य तो कर रहा था। मेरी जानकारी के अनुसार फ़िल्म "उड़ता पंजाब" को "ए" सर्टिफ़िकेट दिया जा रहा था जिस पर निर्माता-निर्देशकों को आपत्ति थी। इस पर फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने "यू" सर्टिफ़िकेट जारी करने के लिए फ़िल्म के ८९ सीन को काटने का सुझाव दिया। मैं यहां निर्माता-निर्देशकों से पूछना चाहता हूं कि यदि फ़िल्म की सामग्री आपत्तिजनक है तो फ़िर सर्टिफ़िकेट भी उसी अनुरूप क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि ज़माना भले ही कितना बदल गया हो आज भी समाज में सभ्य व्यक्ति का "ए" सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्म देखना सभ्यता की निशानी नहीं माना जाता। आज भी बहुत से दर्शक फ़िल्म देखने या ना देखने का निर्णय फ़िल्म को दिए गए "ए" या "यू" सर्टिफ़िकेट को देखकर करते हैं। जब इसी सर्टिफ़िकेशन में धांधली होगी को माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दर्शक यह तय कैसे करेंगे कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं।
सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
गुरुवार, 4 अगस्त 2016
"उड़ता पंजाब"
फ़िल्म "उड़ता पंजाब" विवाद में बाम्बे हाईकोर्ट अपना फ़ैसला सोमवार को सुनाएगा लेकिन सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा देखकर मजमून भांपने की तर्ज़ पर सभी को पता चल ही गया होगा कि फ़ैसला क्या आने वाला है। हाईकोर्ट ने इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह दर्शकों को तय करने दें कि उन्हें क्या देखना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है फ़िल्म को सेंसर करना नहीं।" मैं उच्च न्यायालय का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूं कि क्या किसी आपत्तिजनक सामग्री वाली फ़िल्म (यदि है तो) को सिर्फ़ इस आधार पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है कि इसे देखने का निर्णय दर्शक करेंगे, नहीं। क्योंकि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तो बहुत कुछ आपत्तिजनक भी देखना पसन्द करता है और लुक-छिप कर देखता भी है। जब दर्शकों की पसन्द-नापसन्द ही आधार है तो यदा-कदा "पोर्न साइट्स" पर क्यों बैन लगाने की मांग उठती है। फ़िर क्यों किसी विधायक को विधानसभा में "पोर्न वीडियो" देखने पर निलंबित कर दिया जाता है? किसी भी अश्लील या आपत्तिजनक सामग्री को समाज में प्रवाहित होने से बचाना मार्गदर्शकों का दायित्व है। एक ज़माना था जब अत्यधिक हिंसक कथानकों वाली फ़िल्में भी सेंसर बोर्ड से पास नहीं होती थीं। फ़िल्मों के माध्यम से आज का युवा अपना आदर्श गढ़ता है, वह फ़िल्म के नायक की भांति अपने आप को बनाना चाहता है यदि फ़िल्म किसी ऐसे नायक को प्रस्तुत करती है जो सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करता हो तो ऐसी फ़िल्मों को निश्चित ही सार्वजनिक प्रस्तुतिकरण से रोकना चाहिए। आज जहां बच्चे-बच्चे के हाथों में इंटरनेट युक्त मोबाईल है द्रुत गति से चलने वाला इंटरनेट हैं वहां आप कहां इस बात का निर्णय दर्शकों पर छोड़ सकते हैं कि उन्हें क्या देखना है ये वही तय करें। जैसा कि माननीय उच्च न्यायालय ने कहा कि फ़िल्म सेंसर बोर्ड का कार्य फ़िल्म का सर्टिफ़िकेशन करना है, तो फ़िल्म सेंसर बोर्ड वही कार्य तो कर रहा था। मेरी जानकारी के अनुसार फ़िल्म "उड़ता पंजाब" को "ए" सर्टिफ़िकेट दिया जा रहा था जिस पर निर्माता-निर्देशकों को आपत्ति थी। इस पर फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने "यू" सर्टिफ़िकेट जारी करने के लिए फ़िल्म के ८९ सीन को काटने का सुझाव दिया। मैं यहां निर्माता-निर्देशकों से पूछना चाहता हूं कि यदि फ़िल्म की सामग्री आपत्तिजनक है तो फ़िर सर्टिफ़िकेट भी उसी अनुरूप क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि ज़माना भले ही कितना बदल गया हो आज भी समाज में सभ्य व्यक्ति का "ए" सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्म देखना सभ्यता की निशानी नहीं माना जाता। आज भी बहुत से दर्शक फ़िल्म देखने या ना देखने का निर्णय फ़िल्म को दिए गए "ए" या "यू" सर्टिफ़िकेट को देखकर करते हैं। जब इसी सर्टिफ़िकेशन में धांधली होगी को माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दर्शक यह तय कैसे करेंगे कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं।
शुक्रवार, 29 जनवरी 2016
असली समस्या अहंकार की है
इन दिनों शनि शिंगणापुर बहुत चर्चा में है। जो गांव कभी घर पर दरवाज़े और
ताले ना होने के कारण आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था वह अब महिलाओं द्वारा
शनि शिला को तेल चढ़ाने को लेकर उपजे विवाद के कारण आकर्षण का केन्द्र बना
हुआ है। मेरे देखे इस पूरे उपद्रव के पीछे जो मुख्य समस्या है; वह है-
अहंकार, फ़िर चाहे वह महिलाओं का हो या पुरूषों का। एक ओर जहां मन्दिर
ट्रस्ट ४०० साल पुरानी परम्परा का हवाला देकर महिलाओं को शनि-शिला पर तेल
चढ़ाने से रोक रहा है वहीं महिलाएं अपने साथ हो रहे भेद-भाव को लेकर
आक्रोशित है। मेरा देखे यहां दोनों ही पक्ष गलत हैं। सबसे पहले बात करें
४०० साल पुरानी परम्परा की जिसके कारण महिलाओं को शनि-शिला को स्पर्श करना
या तेल चढ़ाना मना है तो उसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं वरन आस्था या
मान्यता का प्रश्न है। ज्योतिष शास्त्र में शनि को एक क्रूर ग्रह माना गया
है जिसकी दृष्टि विनाशकारी होती है शनि की दृष्टि जिस किसी पर भी पड़ती है
उसका अहित ही करती है चाहे वह कोई देवी-देवता ही क्यों ना हो। स्त्री को
स्वभाव से ही सौम्य व कोमल माना गया है इसलिए इस परम्परा के पीछे महिलाओं
को शनि की दृष्टि से बचाना मुख्य उद्देश्य है ना कि उन्हें पुरूषों से नीचा
दिखाना। शनि शिंगणापुर जाने का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है वहां पुरूष
भी एक गीले वस्त्र में ही शनि-शिला पर तेल चढ़ा सकते हैं, शिला को स्पर्श
तो पुरूषों के लिए भी वर्जित है। धार्मिक परम्पराएं देश-काल-परिस्थिति
अनुसार बनती और संशोधित होती हैं। जैसे किसी ज़माने में सती प्रथा, देवदासी
प्रथा एक धार्मिक परम्परा थी किन्तु आज नहीं है। यह उस युग की आवश्यकता हो
सकती थी आज इन परम्पराओं की आवश्यकता नहीं है इसलिए हमने इन्हें विदा दे दी
इसमें इतना व्याकुल होने की क्या आवश्यकता है। यदि कोई परम्परा वर्तमान
समय में रूढ़ और बेमानी हो गई है तो उसे विदा दी जानी ही चाहिए। अब बात उन
महिलाओं की जो इस परम्परा को लेकर उग्र प्रदर्शन पर उतारू हैं। मेरे देखे
धर्म एक व्यवस्था है जो इस व्यवस्था को बिगाड़ता है वह धार्मिक नहीं हो
सकता। स्त्री-पुरूष की अपनी-अपनी गरिमा है और भेद भी है इसे नकारा नहीं जा
सकता। कई ऐसे मन्दिर हैं जहां गर्भगृह में पुरूषों का भी प्रवेश वर्जित है
क्योंकि हर धर्मस्थान की एक अपनी मर्यादा होती है। हमें उसके अनुरूप ही
अनुशासन में रहना पड़ता है जैसे गुरूद्वारे की मर्यादा है कि वहां बगैर सिर
ढके प्रवेश नहीं किया जा सकता। दक्षिण के कई ऐसे मन्दिर हैं जहां केवल
लुंगी या धोती पहनकर ही प्रवेश किया जा सकता है, तो इसमें भेद-भाव वाली बात
नहीं हैं। क्या कोई महिला शनि-शिला की मर्यादा के अनुरूप केवल एक गीले
वस्त्र में तेल चढ़ाने के लिए सहमत होगी? नहीं... इसलिए वहां महिलाओं को
शनि-शिला के सम्मुख नहीं जाने दिया जाता। आप गलत परम्पराओं को हटाने के लिए
स्वस्थ संवाद का सहारा तो ले सकते है किन्तु विवाद करना सर्वथा अनुचित है।
कल यदि नागा साधुओं की परम्परा को लेकर कोई प्रश्न उठता है तब..! देश में
इतने मन्दिर हैं उनमें से यदि कुछ मन्दिरों की कोई विशेष परम्परा या
अनुशासन है तो उसे मानने में कोई क्षुद्रता नहीं है। धार्मिक व्यक्ति को तो
हर स्थान पर परमात्मा दिखाई देता है। सन्त रैदास ने क्या खूब कहा है-"मन
चंगा तो कठौती में गंगा"। यदि केवल शनि पूजा ही इन महिलाओं का लक्ष्य होता
तो हर शनिवार डकौत (तेल भरी बाल्टी में शनि प्रतिमा लेकर घूमने वाला) की
प्रतिमा पर तेल चढ़ाकर पूजा की जा सकती है किन्तु यहां मुख्य लक्ष्य शनि
पूजा नहीं बल्कि अहंकार की पूजा करना है। समस्त शास्त्रों का सार है जहां
"मैं" अर्थात अहंकार है वहां परमात्म साक्षात्कार असंभव है। अत: अपने
अहंकार को पूजना बन्द करें और परमात्मा को पूजना प्रारम्भ करें। याद रखें
भक्त और भगवान को कोई विलग नहीं कर सकता। ये कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ सब
सांसारिक बातें है जो इसी प्रकार हर युग में चलती रहेंगी और संशोधित भी
होती रहेंगी। इन बातों के लिए देश व समाज का शान्तिप्रिय वातावरण खराब ना
करें।
मंगलवार, 12 मई 2015
पर्यटन विभाग की नाकामी
अपनी अष्ट दिवसीय पर्यटन यात्रा के दौरान मुझे इस देश की लचर व्यवस्था का कुरूप चेहरा देखने को मिला। हमारे अधिकतर तीर्थस्थल लूट का केंद्र बने हुए है। धर्म के नाम व्यवसायिकता अपने चरम पर है। इसमें दोष धर्माचार्यों का तो है ही साथ में हमारी राज्य व केन्द्र सरकारों का भी है जो इस लूटमार को पनपने देने में सहायक है। आखिर पर्यटन विभाग का कार्य क्या है? मुझे कहीं भी पर्यटन विभाग की उपस्थिति नहीं दिखी सिवाय होटलों के जो अत्यंत मंहगे थे। सामान्य पर्यटक उनमें प्रवेश की जुर्रत भी नहीं कर सकता। कहीं-कहीं ट्रस्ट के होटलों को देखकर मन हुआ कि काश हमारे पर्यटन विभाग के होटल इस प्रकार होते तो कितना अच्छा होता। प्राइवेट गाईड से लेकर मंदिर के बाहर लगने वाली दुकानें और आटो चालक सब के सब पर्यटक को छलने का कार्य करते हैं। क्या यह व्यवस्थाएं पर्यटन विभाग के माध्यम से सुचारू रूप से नहीं चलाई जा सकतीं? जिससे आम पर्यटक इस प्रकार बिचौलियों के हाथों ठगाने से बचे। क्या पर्यटन विभाग मंदिर परिसर के आसपास केवल पर्यटन विभाग से अनुबंधित पूजा-सामग्री की दुकानें, गाइड, और परिवहन की व्यवस्था नहीं कर सकता। जिससे उचित मूल्य पर प्रामाणिक सामग्री व जानकारी प्राप्त हो सके। यदि अपने देश के पर्यटकों के साथ ये बिचौलिए इस प्रकार का व्यवहार करते हैं तो ज़रा सोचिए विदेशी पर्यटकों का ये क्या हाल करते होंगे। मैं इस बात से चिंतित हूं विदेशी पर्यटक इस प्रकार व्यवस्थाओं से आहत हो हमारे देश की क्या छवि लेकर जाते होंगे। केवल किसी मशहूर खान से “अतिथि देवो भवः” का विज्ञापन करवाने मात्र से देश की छवि नहीं सुधरेगी। इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन बेहद आवश्यक है।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
