इन दिनों शनि शिंगणापुर बहुत चर्चा में है। जो गांव कभी घर पर दरवाज़े और
ताले ना होने के कारण आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था वह अब महिलाओं द्वारा
शनि शिला को तेल चढ़ाने को लेकर उपजे विवाद के कारण आकर्षण का केन्द्र बना
हुआ है। मेरे देखे इस पूरे उपद्रव के पीछे जो मुख्य समस्या है; वह है-
अहंकार, फ़िर चाहे वह महिलाओं का हो या पुरूषों का। एक ओर जहां मन्दिर
ट्रस्ट ४०० साल पुरानी परम्परा का हवाला देकर महिलाओं को शनि-शिला पर तेल
चढ़ाने से रोक रहा है वहीं महिलाएं अपने साथ हो रहे भेद-भाव को लेकर
आक्रोशित है। मेरा देखे यहां दोनों ही पक्ष गलत हैं। सबसे पहले बात करें
४०० साल पुरानी परम्परा की जिसके कारण महिलाओं को शनि-शिला को स्पर्श करना
या तेल चढ़ाना मना है तो उसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं वरन आस्था या
मान्यता का प्रश्न है। ज्योतिष शास्त्र में शनि को एक क्रूर ग्रह माना गया
है जिसकी दृष्टि विनाशकारी होती है शनि की दृष्टि जिस किसी पर भी पड़ती है
उसका अहित ही करती है चाहे वह कोई देवी-देवता ही क्यों ना हो। स्त्री को
स्वभाव से ही सौम्य व कोमल माना गया है इसलिए इस परम्परा के पीछे महिलाओं
को शनि की दृष्टि से बचाना मुख्य उद्देश्य है ना कि उन्हें पुरूषों से नीचा
दिखाना। शनि शिंगणापुर जाने का मुझे भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है वहां पुरूष
भी एक गीले वस्त्र में ही शनि-शिला पर तेल चढ़ा सकते हैं, शिला को स्पर्श
तो पुरूषों के लिए भी वर्जित है। धार्मिक परम्पराएं देश-काल-परिस्थिति
अनुसार बनती और संशोधित होती हैं। जैसे किसी ज़माने में सती प्रथा, देवदासी
प्रथा एक धार्मिक परम्परा थी किन्तु आज नहीं है। यह उस युग की आवश्यकता हो
सकती थी आज इन परम्पराओं की आवश्यकता नहीं है इसलिए हमने इन्हें विदा दे दी
इसमें इतना व्याकुल होने की क्या आवश्यकता है। यदि कोई परम्परा वर्तमान
समय में रूढ़ और बेमानी हो गई है तो उसे विदा दी जानी ही चाहिए। अब बात उन
महिलाओं की जो इस परम्परा को लेकर उग्र प्रदर्शन पर उतारू हैं। मेरे देखे
धर्म एक व्यवस्था है जो इस व्यवस्था को बिगाड़ता है वह धार्मिक नहीं हो
सकता। स्त्री-पुरूष की अपनी-अपनी गरिमा है और भेद भी है इसे नकारा नहीं जा
सकता। कई ऐसे मन्दिर हैं जहां गर्भगृह में पुरूषों का भी प्रवेश वर्जित है
क्योंकि हर धर्मस्थान की एक अपनी मर्यादा होती है। हमें उसके अनुरूप ही
अनुशासन में रहना पड़ता है जैसे गुरूद्वारे की मर्यादा है कि वहां बगैर सिर
ढके प्रवेश नहीं किया जा सकता। दक्षिण के कई ऐसे मन्दिर हैं जहां केवल
लुंगी या धोती पहनकर ही प्रवेश किया जा सकता है, तो इसमें भेद-भाव वाली बात
नहीं हैं। क्या कोई महिला शनि-शिला की मर्यादा के अनुरूप केवल एक गीले
वस्त्र में तेल चढ़ाने के लिए सहमत होगी? नहीं... इसलिए वहां महिलाओं को
शनि-शिला के सम्मुख नहीं जाने दिया जाता। आप गलत परम्पराओं को हटाने के लिए
स्वस्थ संवाद का सहारा तो ले सकते है किन्तु विवाद करना सर्वथा अनुचित है।
कल यदि नागा साधुओं की परम्परा को लेकर कोई प्रश्न उठता है तब..! देश में
इतने मन्दिर हैं उनमें से यदि कुछ मन्दिरों की कोई विशेष परम्परा या
अनुशासन है तो उसे मानने में कोई क्षुद्रता नहीं है। धार्मिक व्यक्ति को तो
हर स्थान पर परमात्मा दिखाई देता है। सन्त रैदास ने क्या खूब कहा है-"मन
चंगा तो कठौती में गंगा"। यदि केवल शनि पूजा ही इन महिलाओं का लक्ष्य होता
तो हर शनिवार डकौत (तेल भरी बाल्टी में शनि प्रतिमा लेकर घूमने वाला) की
प्रतिमा पर तेल चढ़ाकर पूजा की जा सकती है किन्तु यहां मुख्य लक्ष्य शनि
पूजा नहीं बल्कि अहंकार की पूजा करना है। समस्त शास्त्रों का सार है जहां
"मैं" अर्थात अहंकार है वहां परमात्म साक्षात्कार असंभव है। अत: अपने
अहंकार को पूजना बन्द करें और परमात्मा को पूजना प्रारम्भ करें। याद रखें
भक्त और भगवान को कोई विलग नहीं कर सकता। ये कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ सब
सांसारिक बातें है जो इसी प्रकार हर युग में चलती रहेंगी और संशोधित भी
होती रहेंगी। इन बातों के लिए देश व समाज का शान्तिप्रिय वातावरण खराब ना
करें।

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