बुधवार, 18 सितंबर 2013

क्षमावाणी

आहत मन जो हुआ कभी हो,
दुखती रग को छुआ कभी हो।
पीड़ित हुई हो कोई भावना,
भूल गए हों प्रेम-साधना।
जाने-अनजाने सब कर्मों की,
आज तुमसे है क्षमा मांगना।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ग़ज़ल

फ़ज़ाओं से ये पयाम मिला है अभी
किस तरह मेरा गांव जला है अभी

कितने परिन्दे बेघर हो गए देखो
कोई दरख़्त जड़ों से हिला है अभी

इंसानियत कैसे ज़िंदा बच पाएगी
आदम शैतान से जा मिला है अभी

मुनासिब वक्त में हम भी बोलेंगे
जो सच होठों पे सिला है अभी

-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 9 सितंबर 2013

क्यों हिन्दू-मुसलमान...

क्यों हिन्दू-मुसलमान हुआ जाए
लाज़िसी है अब इंसान हुआ जाए

बन सकते हैं जब दिलों का सुकूं
क्यों दर्द का सामान हुआ जाए

टकरा  रहीं  हैं आपस में सरहदें
चलों यारों आसमान हुआ जाए

आओ हकीकत की तस्दीक करें
कौन तीर;कौन कमान हुआ जाए

लहू से खेलना दरिन्दों का काम है
कभी आदम की पहचान हुआ जाए

मरासिमों की लाशें जलाए हरदम
मेरा ये दिल श्मशान हुआ जाए

खुदा के वास्ते चुप भी रहिए दानां
खूबसूरत शहर वीरान हुआ जाए

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 4 सितंबर 2013

धुंधला हुआ प्रकाश

 प्रकाश झा
आज "सत्याग्रह" देखी। अन्ना हजारे के आंदोलन को प्रत्यक्ष देखने के बाद उस जैसे आंदोलन का नाट्य रूपान्तरण बिल्कुल भी आकर्षक नहीं लगा। फिल्म की कहानी कमज़ोर है। "मल्टी स्टारर" करने के चक्कर में कुछ पात्र जबरन ठूंसे गए हैं जैसे करीना कपूर, अर्जुन रामपाल आदि। इस फिल्म ने पुराने ज़माने के बेहद मशहूर गीत "हमरी अटरिया पे आजा रे साँवरिया, देखा-देखी तनिक हुई जाए" की जिस तरह याद दिलाई उससे दुःख हुआ। सिर्फ एक गीत "रघुपति राघव राजा राम" को यदि छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नहीं है। यदि आप इतने विशाल ह्रदय के मालिक हैं कि एक गीत के लिए पूरी फिल्म सहन कर सकते हैं तो बेशक आप यह फिल्म देख सकते हैं।
लगता है दामुल,मृत्युदण्ड,गंगाजल और अपहरण जैसी सार्थक फिल्में बनाने वाले प्रकाश झा की चमक अब फीकी पड़ गई है। राजनीति,चक्रव्यूह,आरक्षण और इसी कड़ी में अब सत्याग्रह इसका जीवंत उदाहरण हैं।"राजनीति" को झा साहब जिससे प्रेरित बताते हैं उस थीम की लाजवाब फिल्में "हम पाँच" व "आँधी" पहले ही मील का पत्थर साबित हो चुकी हैं। उन फिल्मों के आगे "राजनीति" बेहद हल्की साबित हुई। फिर आई "आरक्षण" जिसमें अति संवेदनशील आरक्षण को फिल्म का विषय बनाया गया किंतु यहाँ भी प्रकाश झा मुद्दे से भटक कर महज़ शिक्षा की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को ही चित्रित कर सके। उसके बाद "चक्रव्यूह"में प्रकाश झा नक्सलवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे को आधार बनाने की कोशिश में "नमक हराम" की नकल कर बैठे। ये फिल्में या तो असफल रहीं या साधारण सफल। समीक्षकों ने इनमें से किसी भी फिल्म को नहीं सराहा। कुल मिलाकर इन दिनों प्रकाश झा अपनी फीकी पड़ी चमक के साथ मुद्दों व फिल्मों की नकल की खिचड़ी बनाकर प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं।

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

पानी सर ऊपर है

कछु करो अब नाथ,
पानी सर ऊपर है।
छूटे हाथ से हाथ,
पानी सर ऊपर है॥

डूबी गाड़ी; डूबी गैल,
डूबा हमरा कबरा बैल।
कछु ना आयो हाथ,
पानी सर ऊपर है॥

बह गए सारे ढ़ोना-टापर,
तितर-बितर भई है बाखर।
भए बच्छा-बच्छी अनाथ,
पानी सर ऊपर है॥

घनन-घनन-घन गरजे बदरा,
उमड़-घुमड़ के बरसे बदरा।
बिजुरिया चमके साथ,
पानी सर ऊपर है॥

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 21 अगस्त 2013

मानस में नारी

 भ्राता,पिता,पुत्र उरगारी।
पुरूष मनोहर निरखत नारी॥

ढोर,गंवार,शूद्र,पशु,नारि।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।

काम,क्रोध,लोभ आदि मद, प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह मह अति दारुन दुखद मायारूपि नारि॥

नारि सुभाऊ सत्य सब कहहीं, अवगुन आठ सदा उर रहहीं।
साहस,अनरत,चपलता,माया, भय अविवेक,असौच, अदाया॥
(रामचरितमानस)

रविवार, 18 अगस्त 2013

सुभाषित

यद्यपि शुद्धं;लोक विरूद्धं,
नाकरणीयं; नाचरणीयं।
(किरातार्जुने)
यद्यपि जो शुद्ध हो किंतु लोकरीति के विरूद्ध हो,ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।

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हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरमं।
तं देवनिर्मितं देशं हिंदुस्थानं प्रचक्ष्यते॥
(बृहस्पति आगम)


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उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये
पयपानं भुजंगानां केवल विषवर्धनमं।


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न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला॥
(मनुस्मृति ५-५३)
अर्थ-मांसभक्षण,मद्यपान और मैथुन में दोष नहीं है। मनुष्यों में यह गुण प्रकृति प्रदत्त हैं, किन्तु इनसे निवृत्ति लेना अधिक श्रेष्ठ है।