शनिवार, 10 अगस्त 2013

"धर्म दण्डयोऽसि"

प्राचीनकाल में किसी राजा को चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ करना आवश्यक होता था। यज्ञ संपन्न करने के पश्चात पूर्णाहुति के समय राजा तीन बार उच्चार करता था-"अदण्डोऽस्मि....अदण्डोऽस्मि...अदण्डोऽस्मि..!"
अर्थात अब मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता, राजा के प्रत्येक उच्चार के बाद राजपुरोहित अपने धर्मदण्ड को राजा के मस्तक से स्पर्श कराकर उच्चार करता था-"धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...धर्म दण्डयोऽसि...!" जिसका अभिप्राय होता है-धर्म तुम्हें दण्ड दे सकता है।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सहर

होने लगी है अब सहर देखिए
कहां तक होता है असर देखिए

पांवो के छाले क्यूं देखते हैं आप
जानिबे-मंज़िल मेरा सफ़र देखिए

जाने कितने अपनी जां से गए
दोशीजा शबाब का कहर देखिए

भीड़ ही भीड़ नज़र आती है हर सूं
तन्हा-तन्हा सा हर बशर देखिए

नूरे-खुदा नज़र आएगा तुम्हें
बच्चों की मासूम नज़र देखिए

किसकी नज़र लगी है इसे
सुलगता मेरा शहर देखिए

दैरो-हरम में महदूद रहेगा?
वो है नुमाया जिधर देखिए

-हेमन्त रिछारिया


अर्ज़ किया है-

"छत पे आजा कि तेरी दीद हो जाए
 हम दीवानों की भी ईद हो जाए"

-हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा किए गए हमले में हमारे ५ जवान शहीद हो गए। इस तरह की खबरें मीडिया के लिए मानो संजीवनी का काम करतीं हैं। सारे राष्ट्रीय चैनल व पत्रकार इसका प्रभाव समझने के लिए निकल पड़े। होना भी यही चाहिए, देश की जनता को देश की सुरक्षा संबंधी घटनाओं से परिचित कराना हमारे इस चौथे स्तंभ का ही कार्य है। परन्तु जिस प्रकार की रिपोर्टिंग हमारे अधिकांश खबरनवीस कर रहे हैं उसे देखकर ऐसा लगता है कि इस प्रकार की सामरिक,संवेदनशील व राष्ट्रीय महत्व की घटनाओं को "कवर" करने की योग्यता का हमारे अधिकतर पत्रकारों व न्यूज़ चैनलों में अभाव है। कुछ पत्रकार बंधु शहीद हुए सैनिकों के गांव पहुंचकर उनके घर के हालात देशवासियों को दिखाकर इसलिए अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे क्योंकि वे वहां सबसे पहले पहुंचे हैं। घर में रोती-बिलखती;बेसुध पड़ी महिलाओं का चित्रण करना उन्हें शायद अपनी खबर में वज़न का अहसास कराता होगा। इतना नहीं कुछ पत्रकार शहीद हुए जवान के माता-पिता के गमगीन चेहरों के आगे माइक लगाकर "बाइट" लेने की कोशिश करते हुए पूछते हैं कि "आप कैसा महसूस कर रहे हैं?" महदआश्चर्य है! भला एक पिता जिसका जिसका पुत्र शहीद हो गया हो; एक पत्नी जिसका सुहाग उजड़ गया हो, कैसा महसूस करेगें? एक मीडिया समूह ने एसएमएम के जरिए सर्वे शुरू कर दिया कि क्या पाकिस्तान पर कार्रवाई की जानी चाहिए? जवाब में तकरीबन १ लाख लोगों के एसएमएस पहुचं गए कि "हां" कार्रवाई की जानी चाहिए। ये बात अलग है कि यदि इस बात का सर्वे किया जाए कि इन १ लाख लोगों में से कितनों के परिजन भारतीय सेना में हैं या आवश्यकता होने पर सेना में जा सकते हैं तो परिणाम अत्यंत निराशाजनक आएंगे। इस प्रकार की पत्रकारिता से आप क्या साबित करना चाहते हैं? मेरा यही निवेदन है इस प्रकार की घटनाओं को इस प्रकार "कवर" किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी कुछ प्रेरणा ले सके व उसे देश के प्रति अपने कर्तव्य का बोध हो, ना कि इस देश की जनता दिखाई गई खबरों को नाटक का अंश समझकर मनोरंजन मात्र करे।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

हम दागी हैं तो क्या हुआ....

 अभी कुछ दिनों पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए सजायाफ़्ता व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। यह पाबंदी जेल के अंदर से चुनाव लड़ने पर जारी रहेगी। इस फैसले का जहां देशवासियों ने दिल से स्वागत किया वहीं इसने राजनीतिक दलों व राजनेताओं की नींद उड़ा दी। खबर है कि जल्द ही सरकार इस फैसले के खिलाफ संसद में बिल पारित करने जा रही है। संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ की माने तो सभी दल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के विरूद्ध कानून में संशोधन करने के लिए एकजुट हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि गत वर्ष भ्रष्टाचार के विरूद्ध जब लोकपाल कानून के लिए आंदोलन हुआ था तो यही दल एक-दूसरे टांग खींचते नज़र आए थे। आज जब भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में कोई सार्थक कदम उठाया जा रहा तो यही दल अपना अंतर्विरोध भूलकर गलबहियां डाले एक साथ खड़े हैं। क्योंकि ये इनकी कुत्सित राजनीति का सवाल है;स्वार्थ का सवाल है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये राजनीतिक दल व राजनेता अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं इसके उदाहरण हमने समय-समय पर देखे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए और ना ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को भूलने देना चाहिए कि यह आज़ादी हमें बिना खड्ग-बिना ढाल के प्राप्त नहीं हुई है इसके लिए हमें भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इस आजादी को पाने के लिए जाने कितनी माताओं ने अपनी युवा संतानों को हंसते-हंसते देश पर न्यौछावर कर दिया है। कितनी बहनों ने अपना सुहाग खोया है। कितने युवक भर यौवन में काल के गाल में समा गए और आज भी जब देश पर संकट आता है तो ऐसा ही नज़र देखने को मिलता है। भला कारगिल को कौन भूल सकता है? इसलिए इस देश के लिए हमारा भी कुछ कर्तव्य है। जब ये दुष्चरित्र नेता अपने स्वार्थ के लिए देश को हानि पहुंचाने वाले कार्यों के लिए अपने अंतर्विरोध भूलकर एकजुट हो सकते हैं तो क्या हम देशवासी अपने देश के रक्षण के लिए अंतर्विरोध त्यागकर एक नहीं हो सकते। आज लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में अपराधियों व दागीयों की बहुतायत है। सभी दल अपनी सीटें बढ़ाने के उद्देश्य से दागी व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव मैदान में उतारते हैं और फिर इन्हीं के दम पर समर्थन देते समय सौदेबाजी करते हैं। आखिर अयोग्य व आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को देश की नीति निर्धारण का कार्य कैसे सौंपा जा सकता है? इन राजनेताओं का यह कहना है कि संसद की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं परन्तु ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि संसद से बढ़कर भी जन-संसद होती है जो देर-सबेर उनकी इस बुरी नीयत को समझ ही जाएगी। आज देशवासियों को यह संकल्प करना चाहिए कि भले ही संसद सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अपनी निम्नस्तरीय चालबाजियों के चलते अमान्य कर दे परन्तु हम उसका अक्षरशः पालन करते हुए आपराधिक व दागी छवि वाले अयोग्य व्यक्तियों को संसद में नहीं भेजेंगे। यदि ऐसा हुआ तो यह लोकतंत्र एवं राष्ट्र-रक्षण की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम होगा।

बुधवार, 31 जुलाई 2013

मां सुनाओ मुझे वो कहानी...



मां सुनाओ मुझे वो कहानी
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी
जो हमारी तुम्हारी कथा हो
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो
गंध जिसमें भरी हो धरा की
बात जिसमें ना हो अप्सरा की
हो ना परियां जहां आसमानी

वो कहानी जो हंसना सिखा दे
पेट की भूख जो भुला दे
जिसमें सच की भरी चांदनी हो
जिसमें उम्मीद की रोशनी हो
जिसमें ना हो कहानी पुरानी

*****
शायर-नन्दलाल पाठक
स्वर-सिज़ा राय
संगीत-जगजीत सिंह

सोमवार, 29 जुलाई 2013

आंख तो फूटी,अंजन काहे

कल श्री एन.रघुरामन जी के कार्यक्रम में एक अजीब किस्सा सामने आया। संस्क्रत विशारद महर्षि पाणिनी के नाम पर प्रारंभ किए गए विद्यालय के एक अध्यापक ने प्रश्नोत्तर कार्यक्रम के दौरान हिचकोलेदार अंग्रेजी में रघुरामन जी से एक प्रश्न किया। प्रश्न कितना सार्थक था ये एक अलग विषय है परन्तु उन महोदय ने वहां उपस्थित जनसमुदाय का;जो कि पूर्णरूपेण हिन्दीभाषी था,उसके समक्ष अंग्रेजी बोलकर जो अपमान किया उसे मैं सहन नहीं कर सका और अवसर की प्रतीक्षा करता रहा ताकि उन्हें इस मिथ्या अहम का बोध कराने वाली परम्परा का मर्म समझा सकूं,किंतु अवसर नहीं मिला। महदआश्चर्य की बात है कि वहां मुख्यवक्ता श्री रघुरामन जो कि मूलतः मद्रासी और अहिन्दी भाषी हैं वे स्तरीय हिन्दी बोल रहे थे और उन्होंने अपना संपूर्ण व्याख्यान भी सुस्पष्ट हिंदी में दिया,वहीं हमारे ये सज्जन उनसे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। विशेष  बात तो यह कि रघुरामनजी ने इनके अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्न का उत्तर भी हिन्दी में दिया। आखिर इस प्रकार अंग्रेजी भाषा का दिखावा करके हम क्या साबित करना चाहते हैं? यही कि हमें अपनी भाषा का गौरव नहीं है या हम भाषाई रूप से इतने दरिद्र हैं कि हमें वार्तालाप करने के लिए भी किसी पराई भाषा का अवलंबन लेना पड़ता है या फिर हमने अंग्रेजी को भद्र और विद्वान होने का स्थाई मानक मान रखा है जिसका प्रयोग करने वाला अन्य लोगों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझा जाएगा? निश्चित ही हर भाषा का अपना महत्व है; इस रूप में अंग्रेजी भी महत्वपूर्ण है किंतु वहां जहां इसकी महती आवश्यकता हो। मेरे देखे अंग्रेजी संपर्क की भाषा तो हो किंतु दिखावे या फैशन का मानक ना बने परन्तु आज हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यहां अंग्रेजी एक फैशन व भद्रता-मानक (स्टेट्स सिंबल) बनती जा रही है। मुझे यहां पूज्य संत श्री मोरारी बापू की एक बात स्मरण आ रही है उन्होंने एक बार कहा था "आंख तो फूटी, अंजन काहे" अर्थात जब आंख ही नहीं होगी तो अंजन का क्या करोगे। हिन्दी हमारा नेत्र है और अन्य समस्त भाषाएं उस नेत्र पर अल्प समय आंजने वाला अंजन। ये कहते हुए बड़ी लज्जा का अनुभव होता है कि आज हमारे अधिकांश युवा हिन्दी का सुस्पष्ट उच्चारण करने व लिखने में असमर्थ हैं और उन्हें इस बात की कोई पीड़ा नहीं क्योंकि वे अंग्रेजी भली-भांति जानते हैं। मेरा मेरे देशवासियों से इतना ही निवेदन है कि हमारे ह्रदय में सम्मान तो हर भाषा का;हर परम्परा का;हर धर्म का हो किंतु गौरव "निज" का हो;अपने का हो।

-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 जुलाई 2013

परमवीर चक्र विजेता

परमवीर चक्र विजेता
(1947-1999)

 

 (जम्मू काश्मीर में कार्रवाई)

1947-48 J & K Operations


मेजर सोमनाथ शर्मा (मरणोपरांत)
Major Somnath Sharma, 4 kumaon, (Posthumous)

राम राघोबा राने
2nd  Lt. Ram Raghoba rane,crops of engineers

पीरु सिंह (मरणोपरांत)
CHM Piru Singh,6 Rajputana Rifles, (Posthumous)

नायक जदुनाथ सिंह  (मरणोपरांत)
Naik Jadunath Singh, 1 Rajput, (Posthumous)

लांस नायक करम सिंह
Lance Naik Karam Singh, 1 Sikh

1962 indo-china war

(भारत-चीन युद्ध)


मेजर शैतान सिंह  (मरणोपरांत)
Major Shaitan Singh, 13 Kumaon, (Posthumous)

मेजर धनसिंह थापा
Major Dhan Singh Thapa,1/8 Gorkha Rifles

सूबेदार जोगिन्दर सिंह  (मरणोपरांत)
Subedar Joginder Singh,1 Sikh, (Posthumous)

1965 indo-pak war

(भारत-पाक युद्ध)


ए.बी.तारापोरे (मरणोपरांत)
Lt. Col. A.B.Tarapore, 17 poona horse, (Posthumous)

अब्दुल हामिद (मरणोपरांत)
CQMH Abdul Hamid,4 Grenadiers, (Posthumous)

1971 indo-pak war

(भारत-पाक युद्ध)


मेजर होशियार सिंह
Major Hoshiar Singh,3 Grenadiers

अरूण खेत्रपाल  (मरणोपरांत)
2nd Lt. Arun Khetarpal, 17 poona Horse, (Posthuomus)

फ्लाइंग आफीसर निर्मलजीत सिंग सेखों  (मरणोपरांत)
Fg. Off. Nirmal Jit Singh Sekhon, no.18 squadron, (Posthumous)

लांस नायक अल्बर्ट एक्का  (मरणोपरांत)
Lance Naik Albert Ekka,17 Gards, (Posthumous)

1999 Kargil operations
(कारगिल में कार्रवाई)


कैप्टन विक्रम बत्रा  (मरणोपरांत)
captain Vikram Batra,13 JAK Rifles, (Posthumous)

लेफ्टिनेंट मनोज के पांडे  (मरणोपरांत)
Lt. Manoj k. Pandey, 1/11 GR, (Posthumous)

ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव
Grenadier Yogendra Sing Yadav,18 Grenadiers

राइफलमेन संजय कुमार
Rifleman Sanjay Kumar,13 JAK Rifles

UN Operations


कैप्टन जी.एस.सलारिया  (मरणोपरांत)
Captain G.S. Salaria, 3/1 GR. (Posthumous)

Saichen Operations


नायब सूबेदार बानासिंह
Naib Subedar Bana Singh, 8 JAK,LI

 

 IPFK Operations


मेजर आर.परमेस्वरन  (मरणोपरांत)
Major R. Parameswaran,8 Mahar, (Posthumous)


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निवेदन- उपरोक्त जानकारी हमने विभिन्न समाचार-पत्रों, इलेक्ट्रानिक मीडिया, इस विषय पर प्रसारित कार्यक्रमों व इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त की है। इसकी प्रामाणिकता के संदर्भ में हमारा कोई आग्रह नहीं है। यद्यपि इसके स्रोत के संबंध में हमने पूर्ण सावधानी बरती है। अतः सुधि पाठकगण इसे पढ़ते व प्रयोग करते समय अपने स्वविवेक से काम लें।
-संपादक