रविवार, 26 मई 2013

रिक्त


रिक्त


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शनिवार, 25 मई 2013

कुछ नए शेर...

"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकर  गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों की आरज़ू थी चांदनी बिखरे
रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
अदने से अश्क की बिसात ही क्या"


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"जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते"

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"हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं"


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"तुम छलकने का शिकवा ना करो
उसका पैमाना ही छोटा है"


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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना"


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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

-हेमन्त रिछारिया
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रविवार, 19 मई 2013

एक ग़ज़ल

मेरे शहर में हर सूं ये मंज़र क्यूं है
शीशे के घर हाथ में पत्थर क्यूं है

जब खाक में मिलना हश्र है सबका
फिर हर शख़्स बना सिकंदर क्यूं है

गाहे-बगाहे दिल का टूटना माना
ए मौला ये होता अक्सर क्यूं है

ये कसक उसे चैन से सोने नहीं देती
पड़ोसी का मकां घर से बेहतर क्यूं है

जो बुझा नहीं सकता तिश्नगी किसी की
मेरे साहिल से हो बहता वो समंदर क्यूं है

वो भी किसी की बहन,किसी की बेटी है
उसकी जानिब तेरी ये बदनज़र क्यूं है

-हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 3 मई 2013

राष्ट्रीय सम्मान का बनता मज़ाक-

पंजाब सरकार ने आज विधानसभा में एक प्रस्ताव पास करके सरबजीत सिह को "शहीद" का दर्ज़ा प्रदान कर दिया। सियासतदानों ने जहां इस प्रकार का प्रस्ताव पारित करके अपनी नाकामियों को छुपाने का प्रयास किया वहीं दूसरी "शहीद" शब्द की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सरबजीत के साथ जो हुआ वह निश्चय ही बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है परन्तु इस का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम सरबजीत की तुलना देश के लिये अपनी जान दांव पर लगा देने वाले हमारे जवानो और शहीदों से करें। मानवीय संवेदनाएं अपनी जगह है परन्तु भावनाओं का इस प्रकार अतिश्योक्तिपूर्ण अनुचित प्राकट्य सर्वथा एक गलत परंपरा की शुरूआत है।
अभी कुछ महीनों पहले १६ दिसंबर की शिकार युवती को भी राजकीय सम्मान देने की वकालत एक राजनेता द्वारा की गई थी। आखिर हम इस प्रकार की पहल करके साबित क्या करना चाहते हैं? यदि हम अपने नागरिकों की जान और इज़्ज़त की सुरक्षा नहीं कर पाते तो उन्हें इस प्रकार के मरहमों से सहलाकर या उपक्रत कर और उन्हें सरकारी अहसानों तले दबा कर उन्हें खामोशी का दामन ओढ़ने का मूक इशारा करते हैं। अपनी इस ओछी मानसिकता और राजनीति में हम ये भूल जाते हैं कि इससे इन शब्दों और सम्मानों के वास्तविक हकदारों के सम्मान को ठेस पहुंचती हैं। भावनाओं में बहकर परिजनों का इस प्रकार की मांग करना अलग बात है परन्तु सरकार को इस प्रकार की मांग स्वीकार करने से पहले हर पहलू पर विचार करना चाहिए। इस प्रकार के लोकप्रियता हासिल करने वाले हथकंडे अपनाने से बेहतर है कि हम अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए ठोस और कारगर नीति बनाएं। अभी कुछ दिनों पहले शहीद हेमराज का सिर काटकर ले जाने घटना के पश्चात जब पाकिस्तान के हुक्मरान भारत आए तो भारत के विदेश मंत्री उनका स्वागत सत्कार करने जा पहुंचे अच्छा होता विदेश मंत्री अजमेर शरीफ के काज़ी की भांति उनसे इनकार कर नापाक मुल्क को कड़ा संदेश देते। अपने नागरिकों पर हुए हमले का जिस प्रकार बदला अमेरिका ने लिया है वह सही मायने में हमले में हताहत हुए नागरिकों को सच्ची श्रद्धांजली है। सरकार अगर अपने नागरिकों को सही अर्थों में श्रद्धांजली देना चाहती हैं तो उनकी जान और इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ करने वालों पर सख़्त से सख़्त कार्रवाई करे ना कि अपने विरूद्ध उपजे आक्रोश को शांत करने के लिए इस प्रकार राष्ट्रीय सम्मानों व सम्मान सूचक शब्दों का अवमूल्यन कर एक गलत परम्परा की शुरूआत करे।

गुरुवार, 2 मई 2013

एक था सरबजीत...

आखिरकार सरबजीत सिंह रिहा हो गया; पाकिस्तान की कैद से नहीं बल्कि ज़िंदगी की कैद से। जो कुछ भी हुआ वो सरबजीत का नसीब था; पाकिस्तान की बर्बरता थी; हमारी सरकार का लचर रवैया था या फिर ये तीनों मगर एक हकीकत को हमें दिल में टीस और आंखों में आंसू लिए स्वीकार करना ही होगा कि सरबजीत अब हमारे बीच नहीं रहा। इसके लिए जितनी दोषी पाकिस्तानी सरकार है उतनी ही ज़िम्मेवार भारत सरकार भी है। आज हमारी विदेश नीति इतनी लचर और तुष्टिकरण से भरी हुई है कि इसके लिए वो किसी भी हद समझौता करने को तैयार है चाहे वो कैप्टन सौरभ कालिया हो, चाहे हमारे सेना के जवान जिनका सर काट दिया जाता है और हमारी सरकार खामोश बैठी रहती है इतना नहीं पाकिस्तानी हुक्मरानों का स्वागत सत्कार करने में भी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ती। सत्तारूढ़ दल के नेता अपनी इसी तुष्टिकरण नीति के चलते कभी ओसामा को ओसामा जी कहते हैं तो कभी दुर्दांत आतंकी हाफिज़ सईद को मि. हाफ़िज़ सईद कहते नज़र आते हैं। यदि भारत सरकार का ऐसा ही लचर रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम एक गंभीर संकट के मुहाने पर होंगे। आज चीन हमारी सीमा १९ किमी अंदर तक घुस आता है और हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि मामले को अधिक तूल ना दिया जाए। धिक्कार है ऐसे प्रधानमंत्री और सरकार पर जो अपनी तुष्टिकरण की नीति के चलते अपने देश की सीमा और देशवासियों की जान तक को दांव पर लगा देते हैं। यदि समय रहते ऐसी दुर्बल सरकार को सत्ता से उखाड़ नहीं फेंका गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक बार फिर से गुलामी की
जंजीरों के करीब होगा।