रविवार, 10 फ़रवरी 2013

जय नाद

कर्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे
हर एक सांस को एक सबक यह याद रहे,
अपनी हस्ती क्या, रहें;रहें या नहीं रहें
यह देश रहे आजाद, देश आजाद रहे।

इस देह धर्म के नाते हमको जाना है
कुछ ऐसा करके जाएं अपनी याद रहे,
आज़ाद रहे; आज़ाद रहे धरती-माता
जग से गुंजित इस माता जय नाद रहे।
-सरलजी

सिंह जननी



धूम धरती पर मचा विद्रोह का वरदान,
यहाँ मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।
सो गया उल्लास मेरा सो गया आमोद,
एक माँ की गोद तज कर; दूसरी की गोद।

ओज अन्तस कर यहाँ कर रहा विश्राम,
वत्स! तुमको क्या बता दूँ उस हठी का नाम?
लाल वह मेरा "भगत" था सिंह ही साकार,
जन्म से ही कहाया गया था वह सरदार।

गर्जना उसकी विकट सुन काँपते थे लाट,
निर्धना मैं; वह शहीदों का बना सम्राट।
सुन लिया क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?
यहाँ मेरी भावना का सो रहा आवेश।

- श्रीकृष्ण "सरल"

भगतसिंह की माताजी

' मैं दम्बूक बोदाँ हाँ '

बाल भगत

पीठ थपथपा पूछ रहे-"बेटे ! तुम क्या करने बैठे?
कुआँ खोद कर क्या तुम उसमें हो पानी भरने बैठे?

"नहीं-नहीं चाचाजी ! मैं तो अच्छा बाग लगाऊँगा।
मैं दम्बूक (बन्दूक) बो रहा, दंबूकों का पेड़ उगाऊँगा।"


"अच्छा तुम बन्दूक बो रहे पर फल किसे चखाओगे?
क्या चिड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे मार गिराओगे?"

"दम्बूकों के फल चाचाजी मेरे दुश्मन खाएँगे,
चिड़िया के बच्चे तो मेरे साथ खेलने आएँगे।


"मुन्ने कौन तुम्हारा दुश्मन यह भी तो बतलाओ
चले निशाना किसे बनाने,यह भी मुझको समझाओ।"

"राज कर रहे जो भारत पर, वे सब अपने दुश्मन हैं
उन्हें भगा कर अपनी माँ के हमें काटने बन्धन हैं।"


- श्रीकृष्ण "सरल"

(भगतसिंह के पिता के मित्र श्री आनन्दकिशोर मेहता जो काँग्रेस कमेटी के मन्त्री थे। उन्होंने भगतसिंह को खेत में बन्दूक गड़ाते देखा। प्रश्न करने पर भगतसिंह ने उत्तर दिया "मैं दम्बूक बोदाँ हाँ"। उस समय बाल भगत बन्दूक को ’दम्बूक’ कहता था।)

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

कौन श्रीकृष्ण सरल?

 "नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊँ,
  'सरल' शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊँ।"
 यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण सरल? यह हमारी विडम्बना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रान्तिकारियों के योगदान को हम तक पहुँचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियाँ, पत्नी के गहने यहाँ तक कि स्वयँ की जान भी दाँव पर लगा दी, उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालाँकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयँ परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रान्तिकारियों पर इसलिए लिखता हूँ जिससे आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍ "जीवित-शहीद" की उपाधि से अलँकृतश्रीकृष्ण "सरल" सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल"  का जन्म 1 जनवरी 1919 को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पाँच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहान्त हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारम्भ कर दिया था। प्रारम्भ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रान्तिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रान्तिकारियों के जीवन को खँगालने के उद्देश्य से की। 15 महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से 125 पुस्तकें,45 काव्य-ग्रन्थ,4 खण्ड काव्य,31 काव्य संकलन,8 उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण सरल तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत् "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहाँ? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएँगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दाँव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है। वे कहते हैं-
"पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
 फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

- पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक, "सरल-चेतना"

मैं अमर शहीदों का चारण


मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ,
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।

यह सच है याद शहीदों की हम लोगों ने दफ़नाई है
यह सच है उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है।


पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
तोपों के मुँह से कौन अकड़ अपनी छातियाँ अड़ाएगा?

चूमेगा फँदे कौन; गोलियाँ कौन वक्ष खाएगा?
अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?


पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?

पूजे ना गए शहीद तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा?
धरती को माँ कहकर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?


मैं चौराहे-चौराहे पर ये प्रश्न उठाया करता हूँ,
मैं अमर शहीदों का चारण उनके यश गाया करता हूँ।

- श्रीकृष्ण "सरल" 




जब मनुष्य असभ्य था तब नदियां स्वच्छ थी, आज मनुष्य सभ्य है तो नदियां अस्वच्छ और विषाक्त हैं-बेगड़ जी

दिनांक ८ फरवरी २०१३ को बान्द्राभान में तीसरे अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन किया गया। चार दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए नर्मदा समग्र के अध्यक्ष श्री अम्रतलाल बेगड़ जी ने कहा कि जब मनुष्य असभ्य था तब नदियां स्वच्छ थी। आज मनुष्य सभ्य है तो नदियां अस्वच्छ और विषाक्त हैं। उन्होंने कहा कि हमारी नदियों में रसायन बह रहा है। गंगा और यमुना आई.सी.यू में है। नदी और पेड़ के संबंध को व्यक्त करते हुए वे बोले कि नदी और पेड़ में भाई-बहन जैसा संबंध है। जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है ठीक वैसे ही पेड़ नदियों की रक्षा करतें हैं। यदि पेड़ ही ना होंगे तो नदियों को कौन बचाएगा। नदी प्रदूषण के लिए उन्होंने बढ़ती आबादी को जिम्मेवार बताया। उनके अनुसार बढ़ती जनसंख्या ने देश को नर्क बना दिया है और हमारी नदियों को प्रदूषित कर दिया है। वे कहते हैं कि नर्मदा ने मुझे कलाकार से लेखक बना दिया। उनका मानना है कि यदि कहीं नदियों की सौंदर्य प्रतियोगिता हो तो उसमें निश्चय ही नर्मदा को प्रथम स्थान प्राप्त होगा।