मंगलवार, 2 अगस्त 2011

अन्ना का आगाज़


जैसे-जैसे १६ अगस्त की तारीख पास आ रही है वैसे-वैसे केंद्र सरकार की धड़कन तेज़ हो रही है। भष्ट्र व्यवस्था एवं भष्ट्राचारियों को ध्वस्त करने वाले जन-लोकपाल को लेकर अन्ना हज़ारे का प्रस्तावित अनशन यूपीए-२ के सिपहसालारों के गले की फांस बना हुआ है। सरकार के नीति निर्माता ये बखूबी जानते हैं कि अन्ना ना तो बाबा रामदेव की तरह जोशवादी हैं और ना ही उनके पास विद्वान विचारकों की कमी है। सबसे बड़ी बात जो सरकार को परेशान कर रही है, वह है अन्ना को मिलने वाला जन-समर्थन। आज़ादी के लंबे समय बाद किसी आंदोलन में जनता के सभी वर्गों की इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति देखी गई,जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। अन्ना ने बड़े ही सरल और सहज ढंग से दिए गए अपने बयानों से ना सिर्फ जनता का विश्वास हासिल किया बल्कि जन-मानस के दिलों में अपनी जगह भी बनाई। जब भी कोई व्यक्ति जनता का चहेता बन जाता है तो उसकी आवाज़ को बलपूर्वक दबाना आसान नहीं होता। फिर अन्ना के आंदोलन का मुद्दा भी आम जनता से जुड़ा हुआ है। जिस भ्रष्ट व्यवस्था पर अन्ना कुठाराघात कर रहे हैं उसका सामना प्रतिदिन हम सभी को करना पड़ता है। आज हर नागरिक के दिलो-दिमाग में ये सवाल एक यक्ष प्रश्न की तरह गूंजता रहता है कि आखिर कब तक? और जब उसे इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता तो वह हार-थक कर या तो इस भ्रष्ट व्यवस्था से समझौता कर लेता या फिर इसका हिस्सा बन जाता। परंतु अन्ना ने बड़े ही विधायक ढंग से आम आदमी को भ्रष्टाचार के विरूद्ध इस मुहिम में अपने साथ खड़ा कर लिया। यहां तक तो अन्ना सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गए पर अब उनका सामना उस सरकारी तंत्र से है जिसके पास "पावर" अर्थात शक्ति है। और जब भी कोई किसी शक्ति के विरूद्ध सौम्य रूप में खड़ा होता है तो उसकी सफलता में संशय होता है। बाबा रामदेव इसका ताज़ा उदाहरण हैं। ये राजनेता आज इसीलिए स्वंछ्दता से जनता के हितों से खिलवाड़ कर रहे हैं क्योंकि उनके पास शक्ति है यदि यही शक्ति अन्ना जैसे किसी राष्ट्रवादी के हाथों में हो तो क्या देश की भ्रष्ट व्यवस्था परिवर्तित नहीं हो सकती? तो फिर क्यों अन्ना इस तरह की गांधीगिरी पर उतारू हैं। आज किसी भी सरकार को अपने इशारों पर चलाने के लिए बहुत थोड़े से "नंबरों" की आवश्यकता होती है। अन्ना जैसे प्रभावशाली समाजसेवी के लिए अपने लिए कुछ जनप्रतिनिधियों का निर्वाचन अब कोई मुश्किल काम नहीं रहा। इन कुछ सांसदो के बल पर अन्ना ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से अपनी बात मनवाने में कामयाब हो सकते हैं। मेरा मानना है कि इस तरह अनशन करने की बजाय अन्ना को चाहिए कि वह कुछ संसदीय क्षेत्रों का चुनाव कर वहां अपनी ज़मीन मज़बूत कर शक्ति को अपने हाथों में लेने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए क्योंकि इस तरह के अनशन का कोई बहुत प्रभावी दीर्घकालिक असर सत्तापक्ष पर पड़ता दिखाई नहीं देता और यह बात अन्ना बखूबी जानते भी हैं। फिर क्यों वे हमारे शास्त्रों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने से हिचकते हैं जो यह कहता है "शठे शाठ्यं समाचरेत"।
-हेमंत रिछारिया

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

बरखा रानी



कैसे करूं मैं स्वागत तेरा,
बता ओ बरखा रानी।
घर की छ्त गलती अक्सर,
जब-जब बरसे पानी॥

बारिश में लगता हर सूं मौसम बड़ा सुहाना,
बूंद-बूंद इक ताल सुनाए पंछी गाएं गाना।
मैं सोचूं कैसे चूल्हे की आग जलानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....


ठंडी-ठंडी बौछारें हैं पवन चले घनघोर,
बादल गरजे उमड़-घुमड़ नाचे वन में मोर।
मन मेरा सोचे कैसे गिरती दीवार बचानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....


इंद्रधनुष की छ्टा बिखेरी बरसा पानी जम के,
पांवों में नूपुरों को बांधे बरखा नाची छ्म से।
मैं ढूंढूं वो सूखा कोना जहां पे खाट बिछानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....


पृकृति कर रही स्वागत तेरा कर अपना श्रृंगार,
पपीहे ने किया अभिनंदन गा कर मेघ मल्हार।
मैं करता स्वागत तेरा भर अंखियों में पानी,
आ जा ओ बरखा रानी, आ जा ओ बरखा रानी॥

-हेमंत रिछारिया

दोहो का संसार

अपनी बेटी के लिए, लाड़; दुआ; ताबीज़
औरों की बेटी बने, बहलावे की चीज़।

प्यार;शराफत;आबरू, शर्म;वफा;ईमान
आओ यार खरीद लो बिकता है सामान।

करते हो ओ वैदजी कैसा कारोबार
भूखे लोगों का किया औषध से उपचार।

पायल हैं या बेड़ियां मत पूछो सरकार
कितने दिन से कैद हूं कह देगी झंकार।

आदर्शों के वो महक और बुलंद उसूल
इस आधुनिक दौर में चाट रहे हैं धूल।

- लक्ष्मण (गुजरात)

गज़ल

रंग जैसे हो ठहरे पानी का
है वही रंग ज़िंदगानी का।

कुछ निवाले ही दे के बच्चों को
मां करे शुक्रिया गिरानी का।

लकड़ियां काट के वो दिन काटे
था जिसे शौक बागबानी का।

सिमटे बैठे हैं एक जजीरे में
खौफ तारी हुआ पानी का।

ऐसे हंस-हंस के वार करता है
गुमां होता है मेहरबानी का।

मेरा किस्सा था और बयां उनका
उफ! वो अंदाज़ तर्जुमानी का।

-पूनम "कौसर"
लुधियाना (पंजाब)

शनिवार, 16 जुलाई 2011

धमाकों पर राजनीति


एक ओर जहां मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने देश की पेशानी पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं वहीं दूसरी ओर हमारे राजनेता अपनी नाकामी पर शर्मिंदा होने की बजाय बेहूदा बयानबाज़ियां कर अपने मानसिक दिवालिएपन का परिचय दे रहे हैं। इनमें से कुछ को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा है तो कुछ संगठन में महासचिव जैसे दायित्वों का निर्वाह कर रहे हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह कहकर कि "मुंबई बम धमाकों में हिंदू संगठनों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।" देश के लाखों-करोंड़ों हिंदुऒं का अपमान किया है। जिसके लिए उन्हें देशवासियों से क्षमा मांगनी चाहिए। चाहे गोधरा कांड हो, चाहे भट्टा-पारसौल या फिर कहीं बम धमाका हमारे राजनेता कोई कारगर कदम उठाने के बदले उस पर गंदी राजनीति करना शुरू कर देते हैं। सत्तापक्ष की विवशता तो समझ में आती है क्योंकि ना तो वह मंहगाई पर लगाम लगा पा रहा है, ना ही विकास दर में व्रध्दि कर पा रहा है, ना ही घोटालों को रोकने में सक्षम है और ना ही आतंकवाद से निपट पा रहा है इसलिए उसे सत्ता में बने रहने का जो सबसे आसान रास्ता दिखाई दे रहा है वह है अल्पसंख्यक समुदाय को अपने भरोसे में रखना। इसलिए तो अभी तक अफ़ज़ल गुरू को फ़ांसी नहीं दी गई, कसाब को बिरयानी की दावत दी जा रही है पर हमारे विपक्ष का यह मौन समझ से परे है। संसद में अभी तक विपक्ष की कोई हुंकार सुनाई नहीं दी गई, जो थी वह महज़ रस्म अदायगी थी। यहां गौरतलब बात यह भी है कि आज देश में लगभग सभी शीर्ष स्थानों पर महिलाएं विराजमान है तो क्या यह महिला सशक्तीकरण का परचम लहराने वालों के लिए नारी शक्ति की विफलता का संकेत है। बहरहाल जो भी हो इस तरह की घटनाऒं से जो सबसे अधिक खोता है; वह है आम इंसान, वह पिता;जिसका बेटा घर नहीं लौटा, वह पत्नि;जिसकी मांग का सिंदूर हमेशा-हमेशा के लिए पुछ गया, वह बच्चा;जो अनाथ हो गया। हमारे नीति-निर्माताओं को चाहिए कि इस तरह की घटनाओं पर घ्रणित राजनीति ना करते हुए ज़मीनी सच्चाई को समझे और आतंकवाद से निपटने के लिए मिलजुल कर कोई करगर और ठोस रणनीति बनाए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो शायद आने वाली पीढ़ियों को यह कहना पड़ेगा-
"घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले यह तय हो इस घर को बचाएं कैसे?"
-हेमंत रिछारिया

शनिवार, 1 जनवरी 2011

भोर की उजास


भोर की उजास हो
मन में उल्लास हो
गम का प्रवास हो
खत्म ना मधुमास हो
विजय हर संघर्ष करें
हो जीवन में उत्कर्ष
मंगलमय हो आपका
आगामी नूतन वर्ष...!

-हेमंत रिछारिया

नव वर्ष की शुभकामना

नए के आगमन के लिये पुराने का विदा होना आवश्यक है क्योंकि पुराने के स्थान पर ही नए का अवतरण होता है। प्रक्रति ने हर वस्तु की आयु निर्धारित की है और आयु पूर्ण होने पर उसका नष्ट होना स्वाभाविक है। अस्तित्व की समस्त वस्तुओं का एक नियत समय होता है जब वे अपने पूर्ण यौवन पर होती हैं तत्पश्चात उनकी जरावस्था प्रारंभ हो जाती है और फिर एक दिन वे उसी में विलीन हो जातीं है जिससे उनका उद्गगम हुआ है। जन्म, व्रध्दि और क्षय प्रक्रति के तीन अनिवार्य नियम है। समस्त जड़ व चेतन इन्हीं नियमों के अधीन है, इसलिए हमें सदा पुराने की विदाई के लिये राजी रहना चाहिए। परन्तु इसका यह आशय कतई नहीं कि हम पुराने को विस्म्रत कर दें क्योंकि यदि हम अपने अतीत को भुला देंगें तो भविष्य भी हमें याद नहीं रखेगा। हमें अतीत को याद तो रखना चाहिए पर अतीत से संबंध नहीं। हमारा संबंध तो सदा वर्तमान से होना चाहिए क्योंकि जीवन अभी, यहीं और इसी क्षण में है। यदि मंज़िल प्राप्त करना है तो उसके लिए एक कदम आगे बढाने के साथ ही दूसरा कदम पीछे से उठाना भी आवश्यक है तभी गति संभव है, चाहे मनुष्य की हो या प्रक्रति की।
तो आइए कोशिश करें कि जिस हर्षोउल्लास के साथ हम नए का स्वागत करते हैं उसी हर्षोउल्लास के साथ पुराने को विदा दे सकें।

"सरल-चेतना" के सभी पाठकों को नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
-हेमंत रिछारिया(संपादक)