रंग जैसे हो ठहरे पानी का
है वही रंग ज़िंदगानी का।
कुछ निवाले ही दे के बच्चों को
मां करे शुक्रिया गिरानी का।
लकड़ियां काट के वो दिन काटे
था जिसे शौक बागबानी का।
सिमटे बैठे हैं एक जजीरे में
खौफ तारी हुआ पानी का।
ऐसे हंस-हंस के वार करता है
गुमां होता है मेहरबानी का।
मेरा किस्सा था और बयां उनका
उफ! वो अंदाज़ तर्जुमानी का।
-पूनम "कौसर"
लुधियाना (पंजाब)
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