इसीलिए तो होली हंसती आज है
इसी ठिठोली में फागुन की लाज है,
इसकी लाली में खिलता श्रंगार है
मलो अबीर गुलाल तुम्हे तो अधिकार है।
आओ आज प्यार कर लें फिर प्यार को
इसी रंग में रंग दें सब संसार को।
-शिवमंगल सिंह "सुमन"
सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
प्रेम ही परमात्मा है

प्रेम चतुर्दशी यानि वेलेंटाइन-डे का विरोध करना तो जैसे कुछ लोगों का कर्तव्य बन गया है। जब भी यह त्यौहार आता है ये लोग अपनी पिटी पिटाई दलीलों के जरिए इसका विरोध करना शुरु कर देते हैं। ये लोग तो इतना भी नहीं जानते कि जिन शिव के ये सैनिक होने का दावा करते हैं उन्ही शिव ने प्रेम के वशीभूत होकर ही पार्वती के बिछोह से क्षुब्द होकर स्रष्टि का प्रलय कर दिया था। जीसस, मीरा, क्रष्ण, महावीर, बुध्द आदि सभी ने प्रेम को स्वीकार किया है। जीसस का प्रसिध्द वचन है- प्रेम ही परमात्मा है। फिर ये लोग इतना भी नहीं जानते कि ये किसका विरोध कर रहे हैं प्रेम का या पाश्चात्य संस्क्रति का। यदि प्रेम का तो यह एक कुत्सित मानसिकता है और यदि पाश्चात्य संस्क्रति का तो ये सिर्फ अपने अहंकार का पोषण है। मान लीजिए यदि किसी भारतीय पर्व को विदेशों में इस तरह मनाया जाय तब भी क्या ये इसी प्रकार विरोध करेंगे? प्रेम तो वह मार्ग है जिस पर चलकर परमात्मा को पाया जाता है। रामक्रष्ण ने एक बार अपने शिष्य से कहा था कि यदि तुमने संसार में किसी से भी प्रेम किया हो तो मैं उसे शुध्द करके तुम्हारा साक्षात्कार परमात्मा से करा सकता हूं परंतु यदि तुमने किसी से भी प्रेम नहीं किया है तो तुम्हें परमात्मा से मिला पाना कठिन है। समाज के तथाकथित ठेकेदार उसी प्रेम की संभावना को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।हालांकि इस प्रकार विरोध प्रदर्शन करके वो इसे और स्थापित कर रहे हैं। इस बात से वो अनजान हैं क्योंकि जिस चीज़ को जितना दबाया जाता है वह उतनी ही उद्दीप्त होकर प्रकट होती है। आज आवश्यकता प्रेम के विरोध की नहीं बल्कि प्रेम के शुध्दिकरण की है। प्रेम का विरोध तो स्वयं परमात्मा का विरोध है इसलिये ही संत कबीर ने कहा है-
"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया ना कोय !
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय !!
- हेमन्त रिछारिया
शुक्रवार, 8 जनवरी 2010
दे दान, दे बलिदान!

चाहिए क्या तुम्हें,
हंसते-महकते गुलाबों की सुगन्ध?
तो राह कांटो की करो स्वीकार।
देखना है क्या तुम्हें,
प्रात: के सूर्य बिम्ब की हंसती सौंदर्य-राशि?
तो दूर भगाओ मध्यरात्रि से स्याह-काले क्षण।
चाहिए क्या तुम्हें,
स्वर्गानन्द स्वतंत्रता का;
और मधुर फल मुक्ति का?
तो फिर अदा करो उसकी कीमत,
आजादी को चाहिए
दु:ख; वेदना और बलिदान!
दे दान, दे बलिदान !!
- सुभाषचंद्र बोस
(महानायक, प्र.क्र.२२४)
मेरे सपनों का भारत

" हमें चाहिए एक शक्ति-संपन्न संघराज्य, जहां किसानों और मजदूरों की हिमायत करने वाली जागरूक सरकार हो।
रूस की तरह पंचवार्षिक नियोजन हो, देश में आधारभूत उद्योगों और औद्योगीकरण की बुनियाद डाली जाय, ग्रामोद्योगों को भी
प्रोत्साहन मिले, जनसंख्या व्रद्धि पर समयोचित अंकुश लगाया जाय, जात-पात का भेदभाव समाप्त हो, विभिन्न भाषा-भाषियों में अपनत्व बढ़े। अपनी ही माटी की गंध से रचा-बना हम एक ऐसा नया साम्यवाद ले आएं जो प्राचीन काल की ही भांति आधुनिक काल में भी विश्व का नेत्रत्व करे।"
-नेताजी सुभाषचंद्र बोस
(महानायक, प्र.क्र.२२७)
आजादी का गाना

मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना
मात्रभूमि के दीवानों का गाओ एक तराना ॥
एक समय था पारतंत्र्य के लगे हुए थे बन्ध
प्राणों पर पहरा लगता था, वाणी पर प्रतिबन्ध।
भाई की गर्दन, भाई की असि ही चूम रही थी,
देश-द्रोहियों के चरणों पर लक्ष्मी झूम रही थी।
शिक्षा; दीक्षा और परीक्षा, सब पर अनुशासन था,
जहां फिरंगी हमें बिठाएं, वह ही निज आसन था।
प्रथ्वी;वायु;गगन पर केवल उनका था अधिकार,
जो वे कहते, मन मसोस कर करते हम स्वीकार।
किन्तु देश के कुछ वीरों ने इसको सत्य न माना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥
//१//
उर स्पंदित हुआ, बुद्धि में व्याकुलता छाई।
स्वतंत्रता के महायग्य-हित नव-चेतना आई॥
जिसके मुख को स्वाद लगा हो, रक्त सदा पीने का।
वह कब शीघ्र स्वत्व देता है मानव को जीने का॥
अत्याचारों की परंपरा ने ले ली अंगड़ाई।
हाथों में हथकड़ी पैर में बेड़ी गई पहनाई॥
देशभक्त की अंतरात्मा इस में भी मुस्काई।
बेड़ी की झन-झन में उसको वीणा पड़ी सुनाई॥
तप:पूत ऐसे जीवन को मस्तक सदा झुकाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥
//३//
यह आजादी पूज्य तिलक की वाणी से आई है।
यह आजादी भगतसिंह की फांसी ला पाई है॥
इस आजादी ने मांगे हैं बड़े-बड़े प्रतिदान।
बिस्मिल,शेखर और बोस का वह महान बलिदान॥
यह आजादी गांधीजी का सत्याग्रह लाया है।
मालवीय की नैष्ठिक चर्या से इसको पाया है॥
आजादी का दुर्ग बन गया ध्वज फहरा अपना है।
जिनके तन-मन प्राण रक्त से इतना भव्य बना है॥
देशवादियों! उनके प्रति ही मत क्रतघ्न बन जाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥
-प.पू. स्वामी सत्यमित्रानन्द जी
पुष्प की अभिलाषा
बुधवार, 6 जनवरी 2010
"आपको अधिकार न था"

शहीदे-आज़म भगत सिंह का पत्र
(३० सित. १९३० को भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह ने ट्रिब्यूनल को एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की मांग की। उससे आहत होकर भगतसिंह ने ४ अक्टूबर १९३० को अपने पिता को यह पत्र लिखा)
पूज्य पिता जी,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई है कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को आवेदन भेजा है। यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे खामोशी से बर्दाश्त नहीं कर सका। इस खबर ने मेरे भीतर की शांति भंग कर उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियॊं में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं? आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैत्रक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान करता हूं। लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूं कि आपको मेरे साथ सलाह-मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था।
पिता जी, मैं बहुत दु:ख का अनुभव कर रहा हूं। मुझे भय है आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निंदा करते हुए मैं कहीं सभ्यता की सीमाएं न लांघ जाऊं और मेरे शब्द ज़्यादा सख़्त न हों जाएं। लेकिन मैं स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूंगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके संदर्भ में मैं इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है; निचले स्तर की कमजोरी।
आपका
भगतसिंह
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