मंगलवार, 5 जनवरी 2010

आओ मन गांठे खोलें

यमुना तट, टीले रेतीले
घास फूस का घर डंडे पर
गोबर से लीपे आंगन में,
तुलसी का बिरवा; घंटी स्वर,
मां के मुंह से दोहे चौपाई रस घोलें,
आओं मन की गांठें खोलें!!

बाबा की बैठक में बिछी
चटाई बाहर रखें खड़ाऊं
मिलने वाले के मन में
असमंजस; जाऊं कि ना जाऊं?
माथे तिलक; आंख पर ऐनक; पोथी खुली स्वयं से बोले,
आओ मन की गांठे खोलें!!

सरस्वती की देख साधना
लक्ष्मी ने संबंध न जोड़ा
मिट्टी ने माथे का चंदन
बनने का संकल्प न छोड़ा
नये वर्ष की अगुवानी में
टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें!
आओ मन की गांठे खोलें !!

-श्री अटल बिहारी वाजपेयी
(भूतपूर्व प्रधानमंत्री)

ग़ज़ल

जिंदगी को मुहब्बत से निखारा जाए
इस हवेली को ज़रा और संवारा जाए।

माना, मुश्किल है बड़ा जीतना इसको लेकिन
खेल जीवन का भला किसलिए हारा जाए।

कोई तो होती है दु:ख सहने की हद ए यारो
कब तलक जीस्त में ये ज़हर उतारा जाए।

रोज़ ही पड़ती है कुछ गर्द जहां की इन पर
रोज़ ही क्यों न दिल-ओ-जां को बुहारा जाए।

पहली बौछार है सावन की उमंगों से भरी
जी में आता है कि साजन को पुकार जाए।

सच ही कहते हो कि उम्मीद पे जग जीता है
घर को ए "प्राण" चलों यूं ही उबारा जाए।
-प्राण

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नववर्ष मंगलमय हो


सरल-चेतना के सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
-संपादक

प्रार्थना


ज्योति जला निज प्राण की

ज्योति जला निज प्राण की, बाती गढ़ बलिदान की
आओ हम सब चलें उतारें, मां की पावन आरती
यह वसुंधरा मां जिसकी, गोद में हमने जन्म लिया।
खाकर जिसका अन्न-अमरत सम, निर्मल शीतल नीर पिया॥
श्वासें भरीं समीर में, जिसका रक्त शरीर में।
आज उसी की व्याकुल होकर, ममता हमें पुकारती॥

//२//

जिसका मणिमय मुकुट सजाती, स्वर्णमयी कंचन जंघा।
जिसके वक्षस्थल से बहती, पावनतम यमुना-गंगा॥
संध्या रचे महावरी, गाये गीत विभावरी।
अरूण करों से ऊषा सलोनी, जिसकी मांग संवारती॥

//३//

जिस धरती के अभिनंदन को, कोटि-कोटि जन साथ बढे़।
जिसके चरणों के वंदन को, कोटि-कोटि तन-माथ चढ़े॥
लजा न जिसके क्षीर को, त्रण-सा तजा शरीर को।
अमर शहीदों की यशगाथा, जिसका स्नेह दुलारती॥

//४//

देखो इसीं धरा जननी पर, संकट के घन छाये हैं।
घनीभूत होकर सीमाओं पर, फिर से घिर आये हैं॥
शपथ तुम्हें अनुराग की, लुटते हुए सुहाग की।
पल भर की देरी न तनिक, माता खड़ी निहारती॥
चलें उतारें आरती, मां की पावन आरती...
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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

मध्यप्रदेश जय हे....

जय जय मध्यप्रदेश जय हे !
विशालभारतवर्षह्रदय हे !
जय जय मध्यप्रदेश जय हे....
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विन्ध्याचलमेखला नर्मदा
वहति लोकजीवनं सर्वदा !
विततसतपुडा श्रंगश्रंखला
तव वनधनशोभासमुज्जवला !!
क्षिप्राचंबल नदी सदय हे !
जय जय .............
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जयति झाबुआलोकजीवनं
चित्रकूट तट रामकीर्तनमं !
कथयति सांची तवेतिहासं
खजुराहो तव कलाविलासमं !!
अभ्यारण-पुण्यपरिचय हे !
जय जय ....................
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कालिदासधरणी सुसंस्क्रता
तानसेन-संगीत-झंक्रता
तव विक्रम-संवत्सर-रूचिरा
विविध रत्नगर्भा वसुंधरा !!
पंचराज्य-वलयति-परिसर हे !
जय जय मध्यप्रदेश........

-श्रीनिवास रथ

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