जिंदगी को मुहब्बत से निखारा जाए
इस हवेली को ज़रा और संवारा जाए।
माना, मुश्किल है बड़ा जीतना इसको लेकिन
खेल जीवन का भला किसलिए हारा जाए।
कोई तो होती है दु:ख सहने की हद ए यारो
कब तलक जीस्त में ये ज़हर उतारा जाए।
रोज़ ही पड़ती है कुछ गर्द जहां की इन पर
रोज़ ही क्यों न दिल-ओ-जां को बुहारा जाए।
पहली बौछार है सावन की उमंगों से भरी
जी में आता है कि साजन को पुकार जाए।
सच ही कहते हो कि उम्मीद पे जग जीता है
घर को ए "प्राण" चलों यूं ही उबारा जाए।
-प्राण
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