“कालसर्प दोष” का नाम सुनते ही जनमानस में भय व्यापत हो जाता है, वहीं कुछ विद्वान इसे सिरे से नकारते हैं। हमारी दृष्टि में दोनों ही भ्रमित हैं। कालसर्प योग से ना तो अनावश्यक डरने की आवश्यकता है और ना ही इसकी उपेक्षा करने की ज़रूरत है बल्कि इसे भी अन्य अशुभ योगों की तरह स्वीकार कर इसके शमन की आवश्यकता है। मूल रूप से कालसर्प योग एक प्रकार का महाकर्तरी योग होता है। ज्योतिष शास्त्र में कर्तरी योगों को सभी विद्वानों ने मान्यता प्रदान की है। जब किसी भाव या ग्रह के दोनों ओर पाप ग्रह उपस्थित हों तो इसे “कर्तरी या पाप कर्तरी” योग कहा जाता है। कर्तरी से आशय है काटने वाला, अतः इन पाप ग्रहों के मध्य जब कोई भाव या ग्रह आ जाता है तो उसका फल नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार कुण्डली के समस्त ग्रह जब राहु-केतु के मध्य आ जाते हैं तो इसे “कालसर्प योग” कहा जाता है। राहु को हमारे शास्त्रों में सर्प का मुख माना है वहीं केतु को पूंछ और सर्प को काल संज्ञा दी है, इसीलिए इस कर्तरी दोष को “कालसर्प योग” कहा जाता है क्योंकि इस प्रकार का कर्तरी योग राहु-केतु के कारण बनता है। “कालसर्प योग” को सिरे से नकारने वाले विद्वानों से यही प्रश्न है कि जब कोई एक ग्रह कर्तरी दोष से पीड़ित हो। कर अपना फल खो देता है तो क्या समस्त ग्रह कर्तरी योग से पीड़ित होकर अपना फल नष्ट नहीं करेंगे? अतः कालसर्प योग को ना तो बहुत बढ़ा-चढ़ा कर देखने की आवश्यकता है और ना ही इसकी उपेक्षा करने की आवश्यकता है। यह एक अशुभ योग है और “नागबली-नारायण बली” कर्म द्वारा इसकी विधिवत शांति करवाकर इसके दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसकी विधिवत शांति त्र्यंबकेश्वर (नासिक-महराष्ट्र) में होती है।
कुछ प्रसिद्ध कालसर्प योग वाले जातकों के नाम-
१. मोरारी बापू
२. जवाहर लाल नेहरू
३. हर्षद मेहता
४. मुसोलिनी
५. सम्राट अकबर
(विशेष-जिन मित्रों की कुण्डली में यह दुर्योग उपस्थित हो और वे त्र्यंबकेश्वर में इसकी विधिवत शांति करवाना चाहते हों तो वे “प्रारब्ध ज्योतिष संस्थान” में संपर्क कर सकते हैं।
हमारा ई-मेल पता है- astropoint_hbd@yahoo.in
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें