
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती जाने कब तुरपाई अम्मां।
-आलोक शरीवास्तव
चुपके-चुपके कर देती जाने कब तुरपाई अम्मां।
-आलोक शरीवास्तव
बदन से तेरे आती है ए माँ वही खुशबू
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है।
-डॉ॰ कुँअर बेचैन
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है।
-डॉ॰ कुँअर बेचैन
बांट के अपना चेहरा, माथा, आंखें, जाने कहां गयी
फटे पुराने इक एलबम में चंचल लड़की जैसी मां।
-निदा फ़ाज़ली
जिसमें खुद भगवान ने खेले खेल विचित्र
मां की गोदी से नहीं कोई तीर्थ पवित्र
- नीरज
1 टिप्पणी:
बहुत ही खूबसूरत शब्दों को संकलित किया है आपने.....साथ में यह सुंदर और मनमोहक चित्र...बहुत अच्छा लगा पढ़कर
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