जो तस्वीर बनाई अपनी,वह तस्वीर तुम्हारी निकली
जब-जब अपना चित्र बनाया
तब-तब ध्यान तुम्हारा आया
मन में कौंध गई बिजली -सी
छवि का इंन्द्रधनुष मुसकाया
सुख की एक घटा सी छाई
भीग गया जीवन आंगन-सा
घूम गई कूंची दिवानी, हर रेखा मतवाली निकली
जो अपनी तस्वीर बनाई, वह तस्वीर तुम्हारी निकली
मेरा रूप तुम्हारा निकला,
मेरा रंग तुम्हारा निकला,
जो अपनी मुद्रा समझी थी,
वह तो ढंग तुम्हारा निकला
धूप और छाया का मिश्रण
यौवन का प्रतिबिंब बन गया
होश समझ बैठा था जिसको, वह रंगीन खुमारी निकली
जो तस्वीर बनाई अपनी, वह तस्वीर तुमहारी निकली
तुमसे भिन्न कहां जग मेरा?
तुम से भिन्न कहां गति मेरी?
तुम से भिन्न स्वयं को समझा,
बहक गई कितनी मति मेरी
मेरी शक्ति तुम्हीं से संचित
मेरी कला तुम्हीं से प्रेरित,
जिसको मैं अपनी जय समझा, वह तो तुमसे हारी निकली
जो तस्वीर बनाई अपनी, वह तस्वीर तुम्हारी निकली
प्रस्तुति- अमोल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें