नवरात्र के नौ दिनों में श्रद्धालुगण पूर्ण श्रद्धाभाव से देवी की आराधना करते हैं। नवरात्र के नौ दिन यथाशक्ति भगवती की पूजा-अर्चना के उपरान्त अन्तिम दिवस "महानिशा-पूजा" की जाती है। जिसमें राजराजेश्वरी माँ जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु हवन किया जाता है। हमारे सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता हवन के माध्यम से ही की जाती है। देवी जी की आराधना में हवन का विशेष महत्त्व होता है। हवन के उपरान्त कन्या-भोज कराया जाता है। श्रद्धालुगण "महानिशा-पूजा" का हवन यथाशक्ति व सामर्थ्य अनुसार सम्पन्न कर सकते हैं। किन्तु जिन श्रद्धालुओं द्वारा नवरात्र में दुर्गासप्तशती के सम्पूर्ण तेरह अध्यायों का पाठ किया गया हो उन्हें दुर्गासप्तशती के मन्त्रों से हवन करना एवं प्रत्येक अध्याय की विशेष आहुति जिसे "महाआहुति" कहा जाता है, अर्पण करना श्रेयस्कर रहता है। जो श्रद्धालुगण सप्तशती के मन्त्रों से हवन करने के स्थान पर मात्र देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का पाठ कर हवन एवं महाआहुतियाँ अर्पण करना चाहते हैं वे देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की माला के उपरान्त प्रत्येक का अध्याय के निर्दिष्ट मन्त्र का उच्चारण करके माँ दुर्गा को "महाआहुति" अर्पण कर सकते हैं।
सनातन हिन्दू परम्परा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण विधि-विधान अनुसार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। किन्तु कई बार आर्थिक संकट एवं विपन्नता के चलते व्यक्ति श्राद्धकर्म को पूर्ण विधि-विधान से करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। तब उसके मन में श्राद्धकर्म को पूर्ण विधि से सम्पन्न नहीं करने की ग्लानि होती है। लेकिन हमारे सनातन धर्म की खूबसूरती व औदार्य यही है कि इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की हर परिस्थिति का ख्याल रखकर नियमों व व्यवस्थाओं का निर्धारण किया गया है। हमारे शास्त्रों ने धन का अभाव होने पर भी श्राद्ध सम्पन्नता के कुछ नियम सुनिश्चित किए हैं। जिसमें अन्न-वस्त्र एवं श्राद्धकर्म की पूर्ण विधि के अभाव में केवल शाक (हरी सब्ज़ी) के द्वारा श्राद्ध सम्पन्न करने का विधान बताया गया है।
"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि।"
यदि शाक के द्वारा भी श्राद्ध सम्पन्न करने का सामर्थ्य ना हो तो शाक के अभाव में दक्षिणाभिमुख होकर आकाश में दोनों भुजाओं को उठाकर निम्न प्रार्थना करने मात्र से भी श्राद्ध की सम्पन्नता शास्त्रों द्वारा बताई गई है।
"न मेस्ति वित्तं धनं च नान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्न्तो·स्मि।
- हे मेरे पितृगण..! मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है, न धान्य आदि। हां मेरे पास आपके लिए श्रद्धा और भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त हों। मैंने शास्त्र के निर्देशानुसार दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है।
हमारे अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म सम्पन्न करना चाहिए। सामर्थ्य ना होने पर ही उपर्युक्त व्यवस्था का अनुपालन करना चाहिए। आलस एवं समयाभाव के कारण उपर्युक्त व्यवस्था का सहारा लेना दोषपूर्ण है।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
देश जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनावों की ओर अग्रसर हो रहा है वैसे-वैसे राजनीतिक क्षेत्रों के साथ-साथ आम जनमानस के मन में भी यह उत्कँठा एक यक्ष प्रश्न की भाँति जागृत हो रही है कि वर्ष 2019 में होने जा रहे आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी को पुन: सफलता प्राप्त होगी या नहीं! इस यक्ष प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ ज्योतिष जगत के विद्वान भी कर रहे हैं। हमने इस प्रश्न का समाधान प्राप्त करने हेतु “प्रश्नकुण्डली” को आधार बनाया क्योंकि जब किसी जन्मपत्रिका की प्रामाणिकता सुनिश्चित नहीं होती तब “प्रश्नकुण्डली” फलादेश करने का सर्वाधिक सटीक व उत्तम माध्यम होती है। आईए जानते हैं कि प्रश्नकुण्डली के आधार पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के लिए वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में कौन सी ज्योतिषीय चुनौतियाँ होंगी।
1. "मालव्य" राजयोग का निर्माण-
वर्ष 2019 के चुनावी भविष्य एवं मोदी जी की सफलता का आँकलन करने हेतु जिस “प्रश्नकुण्डली” का निर्माण हुआ वह तुला लग्न की है। लग्नेश शुक्र के लग्न में स्थित होने के कारण यहाँ "मालव्य" नामक पँचमहापुरूष राजयोग का निर्माण हो रहा है। इसके फलस्वरूप वर्ष 2019 के आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी अपने विरोधियों से कहीं आगे दिखाई दे रहे हैं। "मालव्य" योग के कारण उनकी लोकप्रियता बरकरार रहेगी। वे अपनी बातों से जनमानस को मोहित करने में सफल होगें। प्रश्नकुण्डली में दैवगुरू बृहस्पति भी लग्न में ही स्थित हैं जो विद्वत्तापूर्ण व बौद्धिक निर्णय लेने में सहायता करेंगे।
2. विपरीत राजयोग-
प्रश्नकुण्डली में द्वादशेश के द्वादश भाव में स्थित होने के कारण "विपरीत-राजयोग" का निर्माण हो रहा है जो अत्यन्त शुभ है। भाग्य के अधिपति के स्वराशि में स्थित होने के कारण भाग्य का साथ प्राप्त होने जा रहा है। प्रश्नकुण्डली में भाग्याधिपति बुध के स्वराशिस्थ होने एवं "विपरीत-राजयोग" के निर्माण में संलग्न होने के कारण वाणी व वाकचातुर्य का लाभ उन्हें प्राप्त होगा।
3. बुधादित्य योग-
प्रश्नकुण्डली सूर्य-बुध की युति होने से "बुधादित्य" नामक शुभ योग सृजन हुआ है। सूर्य सत्ता एवं राजसिंहासन का प्रतिनिधि है। यहां सूर्य के मित्रक्षेत्री होने के कारण सत्ता प्राप्ति की संभावनाओं को बल मिलेगा।
4. महलक्ष्मी योग-
प्रश्नकुण्डली में "महालक्ष्मी" योग का भी निर्माण हुआ है। जो अत्यन्त शुभ योग है। वहीं कर्मक्षेत्र के अधिपति चन्द्र की पूर्ण दृष्टि कर्मस्थान पर होने से कर्मक्षेत्र में लाभ प्राप्त होता दिखाई दे रहा है
5. शनि तृतीय भावस्थ-
प्रश्नकुण्डली में चतुर्थेश शनि अपने भाव से द्वादश स्थान में स्थित है जो शुभ नहीं है। चतुर्थ भाव जनता का प्रतिनिधि होता है इसके अधिपति का अपने भाव से 12 वें स्थित होना जनसहयोग में कमी को दर्शाता है। इसके फ़लस्वरूप उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा किन्तु साहस-पराक्रम के भाव में शनि की उपस्थिति इन आलोचनाओं का पूर्ण साहस व निडरता के साथ प्रतिकार करने में सहायक होगी।
6. राहु दशमस्थ-
“प्रश्नकुण्डली” में जो सर्वाधिक चिन्ताजनक सँकेत है, वह है राहु का दशम भाव में स्थित होना। दशम भाव कर्मक्षेत्र, यश, मान, प्रतिष्ठा, सत्ता आदि से सम्बन्धित होता है। राहु के दशमस्थ होने से स्पष्ट सँकेत है कि इस बार सत्ता प्राप्ति की राह अधिक कठिन होने वाली है। सत्ता प्राप्ति के लिए कठिन संघर्ष व अथक परिश्रम की आवश्यकता होगी।
7. मँगल की नीचदृष्टि-
प्रश्नकुण्डली में मँगल उच्चराशिस्थ होकर चतुर्थ भाव में स्थित हैं। यहां से मँगल दशभ भाव पर अपनी नीच दृष्टि डाल रहे हैं जो शुभ नहीं है। इसके चलते कर्मक्षेत्र में बाधाएँ आएँगी। मँगल एक मारणात्मक प्रभाव वाला ग्रह है। यह जब किसी भाव पर अपना प्रभाव डालता है तब उस भाव की हानि करता है। कर्मक्षेत्र पर मँगल का नीचदृष्टि प्रभाव सत्ता प्राप्ति में कठिनाईयाँ उत्पन्न करेगा।
8. दशाओं की अनुकूलता-
प्रश्नकुण्डली आधारित विंशोत्तरी दशाओं की गणना श्री नरेन्द्र मोदी जी के लिए अनुकूल दिखाई दे रही है। वर्तमान महादशा व अन्तर्दशा कर्मक्षेत्र के अधिपति की चल रही है जो शुभ व अनुकूल रहेगी।
निष्कर्ष-
प्रश्नकुण्डली की गणनाओं के अनुसार हमें यह सँकेत मिलता है कि श्री नरेन्द्र मोदी जी आगामी लोकसभा चुनावों में अपनी पूर्ववत् सफ़लता नहीं दोहरा पाएँगे किन्तु अपने सभी विरोधियों से अधिक सफल रहेंगे। सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें साझेदारों पर निर्भर रहना होगा। राहु-केतु के प्रभाव के कारण सहसा कोई ऐसी घटना घट सकती है जो सँभावित रुख में अचानक परिवर्तन कर दे। सम्पूर्ण तथ्यों के आँकलन के अनुसार श्री नरेन्द्र मोदी जी के लिए "सत्ता प्राप्ति एवं चुनावों में सफ़लता" के प्रश्न के उत्तर हेतु निर्मित प्रश्नकुण्डली के ग्रह उनके अनुकूल व पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
***उद्घोषणा- उपर्युक्त विवरण मोदी जी की "चुनावों में सफ़लता" के प्रश्न के उत्तर हेतु निर्मित प्रश्नकुण्डली की गणना पर आधारित है, ना कि उनकी जन्मपत्रिका पर.
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देश के कोने-कोने में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं के भी जन्मोत्सव व प्राकट्योत्सव मनाए जाते हैं। मेरे देखे यह बहुत सांकेतिक है जिससे जीव को यह स्मरण बना रहे कि उसे अपने अन्त:करण में भी एक दिन परमात्मा का प्राकट्य करना है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण के प्राकट्योत्सव की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म आततायी कंस के कारागार में मध्यरात्रि में हुआ। मनुष्य का अन्त:करण भी विकारों एक कारागार है जिसमें षड्विकारों के पहरेदार सदैव तैनात रहते हैं। जब मनुष्य के मन में विकार हो तो उसे अन्धकार घेर लेता है। इस स्थिति में जब अन्त:करण में परमात्मा का प्राकट्य होता है तब ठीक श्रीकृष्ण जन्म के जैसे ही हमारे विकारों के बन्धन स्वत: ही कट जाते हैं और हमारे अन्त:करण का कारागार स्वयमेव खुल जाता है। श्रीकृष्ण के जन्म कथा बहुत ही प्रेरक है अत: हम लौकिक रूप से तो यह पर्व अवश्य मनाएं किन्तु हमारा प्रयास यह हो कि एक दिन हमारे अन्त:करण रूपी कारागार में भी श्रीकृष्ण का प्राकट्य हो।
भाई-बहन के स्नेह का त्यौहार रक्षाबन्धन प्रतिवर्ष श्रावण मास
की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक पौराणिक
कथा के अनुसार देवी लक्ष्मी ने सर्वप्रथम दैत्यराज बलि को राखी बांधकर अपना भाई बनाया
था। व्यावहारिक रूप में देखें तो रक्षाबन्धन भाई-बहन के मध्य प्रेम व स्नेह का पर्व
है। इस दिन बहनें अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र (राखी)
बांधती हैं। वहीं भाई इस दिन अपनी बहन को उसकी सर्वत्र रक्षा करने का वचन देता है।
हमारे सनातन धर्म में सामाजिक व पारिवारिक ताने-बाने को सुदृढ़ रखने
के लिए ऐसी कई प्रथाएं प्रचलित हैं जो सामाजिक व पारिवारिक सौहार्द के लिए बड़ी कारगर
साबित हुई हैं। प्राचीन काल से सहोदर (सगे) भाई-बहन के अभाव में मुंहबोले भाई-बहनों
का सम्बन्ध प्रचलित है। जिनके मध्य किसी प्रकार का रक्त सम्बन्ध ना होकर केवल
"राखी" का सम्बन्ध हुआ करता है। यह पर्व विशुद्ध प्रेम का पर्व है। आज के
दौर में जहां नारी को केवल भोग्य वस्तु मानकर उसका यत्र-तत्र-सर्वत्र अनादर किया जाने
लगा है वहीं हमारे सनातन में धर्म में रक्षाबन्धन पर्व के माध्यम से नारी के सम्मान
की रक्षा का निर्देश है।
आईए जानते हैं इस वर्ष 2018 में रक्षाबन्धन का पर्व कब मनाया जाएगा-
इस वर्ष
रक्षाबन्धन का पर्व प्रतिवर्षानुसार श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिनांक 26 अगस्त 2018 को मनाया जाएगा। इस वर्ष रक्षाबन्धन के दिन
पंचक रहेगा क्योंकि इस माह पंचक 25 अगस्त से प्रारम्भ होकर दिनांक
30 अगस्त तक रहेंगे। रक्षाबन्धन के दिन दोपहर 12 बजकर 35 मिनिट तक "धनिष्ठा" नक्षत्र रहेगा
तत्पश्चात् "शतभिषा" नक्षत्र प्रारम्भ होगा। ये दोनों ही नक्षत्र पंचक कारक
है। अत: इस बार राखी पंचककाल में ही बंधेगी।
इसघोरअसफलताकेलिएअमेरिकानेएकजांचसमीतिकाभीगठनकियाजिसकेअध्यक्षनेअपनेएकलेखमेंबड़ीमहत्त्वपूर्णबातकहीथी-"We could not turn
even one Indian towards us" अर्थात्हमनेएकभीभारतीयकोअपनीतरफ़मोड़नेमेंसफ़लताप्राप्तनहींकी।