सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

महाआहुतियां अर्पण कर पाएं देवी का आशीर्वाद

नवरात्र के नौ दिनों में श्रद्धालुगण पूर्ण श्रद्धाभाव से देवी की आराधना करते हैं। नवरात्र के नौ दिन यथाशक्ति भगवती की पूजा-अर्चना के उपरान्त अन्तिम दिवस "महानिशा-पूजा" की जाती है। जिसमें राजराजेश्वरी माँ जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु हवन किया जाता है। हमारे सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता हवन के माध्यम से ही की जाती है। देवी जी की आराधना में हवन का विशेष महत्त्व होता है। हवन के उपरान्त कन्या-भोज कराया जाता है। श्रद्धालुगण "महानिशा-पूजा" का हवन यथाशक्ति व सामर्थ्य अनुसार सम्पन्न कर सकते हैं। किन्तु जिन श्रद्धालुओं द्वारा नवरात्र में दुर्गासप्तशती के सम्पूर्ण तेरह अध्यायों का पाठ किया गया हो उन्हें दुर्गासप्तशती के मन्त्रों से हवन करना एवं प्रत्येक अध्याय की विशेष आहुति जिसे "महाआहुति" कहा जाता है, अर्पण करना श्रेयस्कर रहता है। जो श्रद्धालुगण सप्तशती के मन्त्रों से हवन करने के स्थान पर मात्र देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का पाठ कर हवन एवं महाआहुतियाँ अर्पण करना चाहते हैं वे देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की माला के उपरान्त प्रत्येक का अध्याय के निर्दिष्ट मन्त्र का उच्चारण करके माँ दुर्गा को "महाआहुति" अर्पण कर सकते हैं।
आईए जानते हैं कि सम्पूर्ण तेरह अध्यायों की महाआहुतियाँ कौन सी हैं-
1. पहला अध्याय-
मन्त्र- ॐ महाकाल्यै स्वाहा
महाआहुति- कमलगट्टा, काली मिर्च, शहद, महुआ, राई
2. दूसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- जायफ़ल, जावित्री, कद्दू, पीली सरसों, राई
3. तीसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- उड़द का बड़ा
4. चौथा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- पंचमेवा व छुआरा (खारक)
5. पांचवा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महासरस्वत्यै स्वाहा
महाआहुति- शक्कर व गन्ना
6. छ्ठा अध्याय-
मन्त्र- ॐ धूम्राक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- जासौन का फ़ूल
7. सातवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ चामुण्डायै स्वाहा
महाआहुति- बीला (बिल्वफ़ल), बिल्वपत्र, पालक
8. आठवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ रक्ताक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- रक्त चन्दन
9. नौवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भैरव्यै तारा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- केला, नागरमोंथा, अगर, तगर
10. दसवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भगवत्यै स्वाहा
महाआहुति- बिजोरा नींबू
11. ग्यारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ नारायण्यै स्वाहा
महाआहुति- खीरपूड़ी
12. बारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ राजराजेश्वर्यै स्वाहा
महाआहुति- दाड़िम (अनार)
13. तेरहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ दुर्गा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- श्रीफ़ल 

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

धन के अभाव में कैसे करें “श्राद्ध” -

सनातन हिन्दू परम्परा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण विधि-विधान अनुसार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। किन्तु कई बार आर्थिक संकट एवं विपन्नता के चलते व्यक्ति श्राद्धकर्म को पूर्ण विधि-विधान से करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। तब उसके मन में श्राद्धकर्म को पूर्ण विधि से सम्पन्न नहीं करने की ग्लानि होती है। लेकिन हमारे सनातन धर्म की खूबसूरती व औदार्य यही है कि इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की हर परिस्थिति का ख्याल रखकर नियमों व व्यवस्थाओं का निर्धारण किया गया है। हमारे शास्त्रों ने धन का अभाव होने पर भी श्राद्ध सम्पन्नता के कुछ नियम सुनिश्चित किए हैं। जिसमें अन्न-वस्त्र एवं श्राद्धकर्म की पूर्ण विधि के अभाव में केवल शाक (हरी सब्ज़ी) के द्वारा श्राद्ध सम्पन्न करने का विधान बताया गया है।
"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि।"
यदि शाक के द्वारा भी श्राद्ध सम्पन्न करने का सामर्थ्य ना हो तो शाक के अभाव में दक्षिणाभिमुख होकर आकाश में दोनों भुजाओं को उठाकर निम्न प्रार्थना करने मात्र से भी श्राद्ध की सम्पन्नता शास्त्रों द्वारा बताई गई है।
"न मेस्ति वित्तं धनं च नान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्न्तो·स्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य॥"
(विष्णुपुराण)
- हे मेरे पितृगण..! मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है, न धान्य आदि। हां मेरे पास आपके लिए श्रद्धा और भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त हों। मैंने शास्त्र के निर्देशानुसार दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है।

हमारे अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म सम्पन्न करना चाहिए। सामर्थ्य ना होने पर ही उपर्युक्त व्यवस्था का अनुपालन करना चाहिए। आलस एवं समयाभाव के कारण उपर्युक्त व्यवस्था का सहारा लेना दोषपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

2019 में क्या होंगी मोदी की ज्योतिषीय चुनौतियाँ


देश जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनावों की ओर अग्रसर हो रहा है वैसे-वैसे राजनीतिक क्षेत्रों के साथ-साथ आम जनमानस के मन में भी यह उत्कँठा एक यक्ष प्रश्न की भाँति जागृत हो रही है कि वर्ष 2019 में होने जा रहे आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी को पुन: सफलता प्राप्त होगी या नहीं! इस यक्ष प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ ज्योतिष जगत के विद्वान भी कर रहे हैं। हमने इस प्रश्न का समाधान प्राप्त करने हेतु “प्रश्नकुण्डली” को आधार बनाया क्योंकि जब किसी जन्मपत्रिका की प्रामाणिकता सुनिश्चित नहीं होती तब “प्रश्नकुण्डली” फलादेश करने का सर्वाधिक सटीक व उत्तम माध्यम होती है। आईए जानते हैं कि प्रश्नकुण्डली के आधार पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के लिए वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में कौन सी ज्योतिषीय चुनौतियाँ होंगी।
1. "मालव्य" राजयोग का निर्माण-
वर्ष 2019 के चुनावी भविष्य एवं मोदी जी की सफलता का आँकलन करने हेतु जिस “प्रश्नकुण्डली” का निर्माण हुआ वह तुला लग्न की है। लग्नेश शुक्र के लग्न में स्थित होने के कारण यहाँ "मालव्य" नामक पँचमहापुरूष राजयोग का निर्माण हो रहा है। इसके फलस्वरूप वर्ष 2019 के आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी अपने विरोधियों से कहीं आगे दिखाई दे रहे हैं। "मालव्य" योग के कारण उनकी लोकप्रियता बरकरार रहेगी। वे अपनी बातों से जनमानस को मोहित करने में सफल होगें। प्रश्नकुण्डली में दैवगुरू बृहस्पति भी लग्न में ही स्थित हैं जो विद्वत्तापूर्ण व बौद्धिक निर्णय लेने में सहायता करेंगे।
2. विपरीत राजयोग-
प्रश्नकुण्डली में द्वादशेश के द्वादश भाव में स्थित होने के कारण "विपरीत-राजयोग" का निर्माण हो रहा है जो अत्यन्त शुभ है। भाग्य के अधिपति के स्वराशि में स्थित होने के कारण भाग्य का साथ प्राप्त होने जा रहा है। प्रश्नकुण्डली में भाग्याधिपति बुध के स्वराशिस्थ होने एवं "विपरीत-राजयोग" के निर्माण में संलग्न होने के कारण वाणी व वाकचातुर्य का लाभ उन्हें प्राप्त होगा।
3. बुधादित्य योग-
प्रश्नकुण्डली सूर्य-बुध की युति होने से "बुधादित्य" नामक शुभ योग सृजन हुआ है। सूर्य सत्ता एवं राजसिंहासन का प्रतिनिधि है। यहां सूर्य के मित्रक्षेत्री होने के कारण सत्ता प्राप्ति की संभावनाओं को बल मिलेगा।
4. महलक्ष्मी योग-
प्रश्नकुण्डली में "महालक्ष्मी" योग का भी निर्माण हुआ है। जो अत्यन्त शुभ योग है। वहीं कर्मक्षेत्र के अधिपति चन्द्र की पूर्ण दृष्टि कर्मस्थान पर होने से कर्मक्षेत्र में लाभ प्राप्त होता दिखाई दे रहा है
5. शनि तृतीय भावस्थ-
प्रश्नकुण्डली में चतुर्थेश शनि अपने भाव से द्वादश स्थान में स्थित है जो शुभ नहीं है। चतुर्थ भाव जनता का प्रतिनिधि होता है इसके अधिपति का अपने भाव से 12 वें स्थित होना जनसहयोग में कमी को दर्शाता है। इसके फ़लस्वरूप उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा किन्तु साहस-पराक्रम के भाव में शनि की उपस्थिति इन आलोचनाओं का पूर्ण साहस व निडरता के साथ प्रतिकार करने में सहायक होगी।
6. राहु दशमस्थ-
“प्रश्नकुण्डली” में जो सर्वाधिक चिन्ताजनक सँकेत है, वह है राहु का दशम भाव में स्थित होना। दशम भाव कर्मक्षेत्र, यश, मान, प्रतिष्ठा, सत्ता आदि से सम्बन्धित होता है। राहु के दशमस्थ होने से स्पष्ट सँकेत है कि इस बार सत्ता प्राप्ति की राह अधिक कठिन होने वाली है। सत्ता प्राप्ति के लिए कठिन संघर्ष व अथक परिश्रम की आवश्यकता होगी।
7. मँगल की नीचदृष्टि-
प्रश्नकुण्डली में मँगल उच्चराशिस्थ होकर चतुर्थ भाव में स्थित हैं। यहां से मँगल दशभ भाव पर अपनी नीच दृष्टि डाल रहे हैं जो शुभ नहीं है। इसके चलते कर्मक्षेत्र में बाधाएँ आएँगी। मँगल एक मारणात्मक प्रभाव वाला ग्रह है। यह जब किसी भाव पर अपना प्रभाव डालता है तब उस भाव की हानि करता है। कर्मक्षेत्र पर मँगल का नीचदृष्टि प्रभाव सत्ता प्राप्ति में कठिनाईयाँ उत्पन्न करेगा।
8. दशाओं की अनुकूलता-
प्रश्नकुण्डली आधारित विंशोत्तरी दशाओं की गणना श्री नरेन्द्र मोदी जी के लिए अनुकूल दिखाई दे रही है। वर्तमान महादशा व अन्तर्दशा कर्मक्षेत्र के अधिपति की चल रही है जो शुभ व अनुकूल रहेगी।
निष्कर्ष-
प्रश्नकुण्डली की गणनाओं के अनुसार हमें यह सँकेत मिलता है कि श्री नरेन्द्र मोदी जी आगामी लोकसभा चुनावों में अपनी पूर्ववत् सफ़लता नहीं दोहरा पाएँगे किन्तु अपने सभी विरोधियों से अधिक सफल रहेंगे। सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें साझेदारों पर निर्भर रहना होगा। राहु-केतु के प्रभाव के कारण सहसा कोई ऐसी घटना घट सकती है जो सँभावित रुख में अचानक परिवर्तन कर दे। सम्पूर्ण तथ्यों के आँकलन के अनुसार श्री नरेन्द्र मोदी जी के लिए "सत्ता प्राप्ति एवं चुनावों में सफ़लता" के प्रश्न के उत्तर हेतु निर्मित प्रश्नकुण्डली के ग्रह उनके अनुकूल व पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।

***उद्घोषणा- उपर्युक्त विवरण मोदी जी की "चुनावों में सफ़लता" के प्रश्न के उत्तर हेतु निर्मित प्रश्नकुण्डली की गणना पर आधारित है, ना कि उनकी जन्मपत्रिका पर.


-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com







मंगलवार, 28 अगस्त 2018

अन्त:करण में भी कृष्ण प्रकट हों

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देश के कोने-कोने में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं के भी जन्मोत्सव व प्राकट्योत्सव मनाए जाते हैं। मेरे देखे यह बहुत सांकेतिक है जिससे जीव को यह स्मरण बना रहे कि उसे अपने अन्त:करण में भी एक दिन परमात्मा का प्राकट्य करना है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण के प्राकट्योत्सव की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म आततायी कंस के कारागार में मध्यरात्रि में हुआ। मनुष्य का अन्त:करण भी विकारों एक कारागार है जिसमें षड्विकारों के पहरेदार सदैव तैनात रहते हैं। जब मनुष्य के मन में विकार हो तो उसे अन्धकार घेर लेता है। इस स्थिति में जब अन्त:करण में परमात्मा का प्राकट्य होता है तब ठीक श्रीकृष्ण जन्म के जैसे ही हमारे विकारों के बन्धन स्वत: ही कट जाते हैं और हमारे अन्त:करण का कारागार स्वयमेव खुल जाता है। श्रीकृष्ण के जन्म कथा बहुत ही प्रेरक है अत: हम लौकिक रूप से तो यह पर्व अवश्य मनाएं किन्तु हमारा प्रयास यह हो कि एक दिन हमारे अन्त:करण रूपी कारागार में भी श्रीकृष्ण का प्राकट्य हो।
!!वृन्दावन बिहारीलाल की जय!!
!!जय जय श्री राधे!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 22 अगस्त 2018

रक्षाबन्धन



भाई-बहन के स्नेह का त्यौहार रक्षाबन्धन प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार देवी लक्ष्मी ने सर्वप्रथम दैत्यराज बलि को राखी बांधकर अपना भाई बनाया था। व्यावहारिक रूप में देखें तो रक्षाबन्धन भाई-बहन के मध्य प्रेम व स्नेह का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं। वहीं भाई इस दिन अपनी बहन को उसकी सर्वत्र रक्षा करने का वचन देता है। हमारे सनातन धर्म में सामाजिक व पारिवारिक ताने-बाने को सुदृढ़ रखने के लिए ऐसी कई प्रथाएं प्रचलित हैं जो सामाजिक व पारिवारिक सौहार्द के लिए बड़ी कारगर साबित हुई हैं। प्राचीन काल से सहोदर (सगे) भाई-बहन के अभाव में मुंहबोले भाई-बहनों का सम्बन्ध प्रचलित है। जिनके मध्य किसी प्रकार का रक्त सम्बन्ध ना होकर केवल "राखी" का सम्बन्ध हुआ करता है। यह पर्व विशुद्ध प्रेम का पर्व है। आज के दौर में जहां नारी को केवल भोग्य वस्तु मानकर उसका यत्र-तत्र-सर्वत्र अनादर किया जाने लगा है वहीं हमारे सनातन में धर्म में रक्षाबन्धन पर्व के माध्यम से नारी के सम्मान की रक्षा का निर्देश है।
आईए जानते हैं इस वर्ष 2018 में रक्षाबन्धन का पर्व कब मनाया जाएगा-
इस वर्ष रक्षाबन्धन का पर्व प्रतिवर्षानुसार श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिनांक 26 अगस्त 2018 को मनाया जाएगा। इस वर्ष रक्षाबन्धन के दिन पंचक रहेगा क्योंकि इस माह पंचक 25 अगस्त से प्रारम्भ होकर दिनांक 30 अगस्त तक रहेंगे। रक्षाबन्धन के दिन दोपहर 12 बजकर 35 मिनिट तक "धनिष्ठा" नक्षत्र रहेगा तत्पश्चात् "शतभिषा" नक्षत्र प्रारम्भ होगा। ये दोनों ही नक्षत्र पंचक कारक है। अत: इस बार राखी पंचककाल में ही बंधेगी।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
                                                                                                                                                                                                         

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

पोखरण परमाणु विस्फोट: सिंहावलोकन

 
1. दिनांक व समय- 11 मई (सोमवार) एवं 13 मई (बुधवार) दोपहर 3 बजकर 45 मिनिट 47 सेकण्ड।
2. स्थान- पोखरण (राजस्थान)
3. परीक्षण का प्रकार-  
(i) विमान के पंखों के नीचे से ले जाकर गिराया जाने वाला (Conventional Atom Bomb) अणु बम।
(ii) प्रक्षेपास्त्र (राकेट) के अग्रभाग (Neuclear Warhead) जैसा कम भारवाहक क्षमतावाला।
(iii) थर्मो न्यूक्लियर (Thermo Neuclear) डिवाइस जिससे हाईड्रोजन बम बनाया जा सकता है।
4. नियन्त्रण कक्ष- घटनास्थल से 5 किमी दूर स्थित था।
5. नेतृत्व- परमाणु परीक्षण दल का नेतृत्व सुविख्यात वैज्ञानिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. .पी.जे.अब्दुल कलाम कर रहे थे। उनके साथ दल में डा. चिदम्बरम और डा. काकोड़कर सहित लगभग 250 सदस्य शामिल थे।
6. प्रथम परीक्षण- भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण वर्ष 1974 में किया था। अपने प्रथम परमाणु परीक्षण के 24 वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद यह भारत दूसरा सफलतम परमाणु परीक्षण था।
7. न्यूक्लियर कार्पोरेशन की स्थापना- आजादी के तुरन्त पश्चात् भारत में वर्ष 1948 "न्यूक्लियर कार्पोरेशन" (Neuclear Corporation) की स्थापना हुई। इसके बाद वर्ष 1951 में एटमिक एस्टाब्लिशमेन्ट (Atomic Establishment) की शुरुआत हुई। वर्ष 1955 में इसका नामकरण प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. भाभा के नाम पर "भाभा एटमिक रिसर्च सेन्टर"( Bhabha Atomic Research Center, BARC) किया गया।
8. पाठ्यक्रम का प्रारम्भ- वर्ष 1951 में भविष्य की आवश्यकताओं संभावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में न्यूक्लियर फ़िजिक्स (Neuclear Physics) नामक विभाग का प्रारम्भ किया गया। जिसके अन्तर्गत एक स्नातक स्तर का पाठ्यक्रम प्रारम्भ हुआ। विशेष बात यह है कि इस पाठ्यक्रम के लिए वहां उस समय कोई भी प्रयोगशाला नहीं थी।
9. रिएक्टर- वर्ष 1955 में देश में ब्रंग (Brung) नामक एक्सपेरिमेन्टल रिएक्टर (Experimental Reactor) आया। जो केवल प्रयोगशाला में प्रयोग के लिए ही उपयुक्त था। वर्ष 1990 तक भारत ने आश्चर्यजनक रूप से प्रगति करते हुए 21 रिएक्टर (Reactor), 8 हेवी वाटर उत्पादन प्लांट और एक स्वयंपूर्ण अत्याधुनिक टेस्ट रेंज (Test Range) का निर्माण कर लिया था।
10. यूरेनियम की अनुपलब्धता- परमाणु बम के लिए आवश्यक यूरेनियम भारत में उपलब्ध नहीं था। केरल के समुद्र तट की रेत में थोरियम नाम का एक रेडियोएक्टिव तत्व विपुल मात्रा में प्राप्त हुआ। थोरियम पर प्रयोग कर यूरेनियम प्राप्त करने पद्धति अत्यधिक मंहगी और कठिन थी किन्तु फ़िर भी हमने उपलब्ध सामग्री से ही अनुसन्धान कर इस दिशा में प्रगति की।
11. गोपनीयता- पोखरण परमाणु विस्फोट की जानकारी इस अभियान में शामिल सदस्यों उनके परिजनों के लिए भी गोपनीय रखी गई। इस अभियान में शामिल सदस्यों को विमान में बैठने तक इस अभियान के बारे में कुछ भी पता नहीं था। अमेरिका ने भारत के प्रथम परमाणु परीक्षण के बाद हमारी सैन्य गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए तीन जिओ स्टेशनरी और एक जियो सिन्क्रोनाइज़ उपग्रह छोड़े थे। इसके बाद भी अमेरिका को इन उपग्रहों से कोई सहायता नहीं मिली और ना ही अमेरिकी खुफ़िया ऐजेंसी सी.आई..(CIA) को उसके ज़मीनी तन्त्र से कोई सूचना प्राप्त हुई।
इस घोर असफलता के लिए अमेरिका ने एक जांच समीति का भी गठन किया जिसके अध्यक्ष ने अपने एक लेख में बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही थी-"We could not turn even one Indian towards us" अर्थात् हमने एक भी भारतीय को अपनी तरफ़ मोड़ने में सफ़लता प्राप्त नहीं की।
12. अनुमति- 11 अप्रैल 1998 को डा. चिदम्बरम ने बताया कि अणु परीक्षण की अनुमति मिल गई है। लेकिन हमें एक नहीं अपितु पाँचो डिवाईसीस का परीक्षण करना है। महज़ एक महीने की परीक्षण पूर्व तैयारी के पाँच परीक्षण करना एक बड़ी चुनौती थी।
13. परीक्षण पूर्व तैयारी- परीक्षण के 200 मीटर गहरा कुआ चाहिए था। जो साठ मंजिला भवन के समकक्ष होता है। इसके अन्दर उपकरणों की व्यवस्था करना, अलग-अलग ऊंचाई पर सेन्सर्स लगाना और सदस्यों उपकरणों के आने-जाने के लिए लिफ़्ट भी चाहिए थी। लेकिन बंगाल इन्जीनियरिंग ट्रुप के जवानों द्वारा इस चुनौतीपूर्ण कार्य को निश्चित समयावधि सफ़लतापूर्वक पूर्ण कर लिया गया।
14. परीक्षण का दिन- इस अभियान का नेतृत्व कर रहे डा. कलाम ने परीक्षण का दिन तय किया था।
15. तापमान- मई में पोखरण का तापमान 46 से लेकर 52 डिग्री तक होता है।
16. बजट- इस अभियान के लिए भारत सरकार द्वारा केवल वर्ष 1985 से लेकर 1999 तक कुल 1500 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया था। जो बहुत ही कम था।
17. रोचक तुलना- एक व्यापारिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में अप्रैल से मई के मध्य ग्रीष्मकाल में शीतलपेय की बिक्री से लगभग 900 करोड़ रु. का मुनाफ़ा विदेशी कम्पनियों को प्रतिवर्ष होता है। जबकि देश की सुरक्षा से जुड़े इतने महत्त्वपूर्ण अभियान के लिए 14 वर्षों में महज़ 1500 करोड़ रु. का बजट उपलब्ध कराया गया था। ज़रा विचार कीजिए कि स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग ना करने के कारण हमारे देश की अर्थव्यवस्था को कितना भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
18. सफ़ल परीक्षण- उपर्युक्त सभी चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर अन्तत: भारत ने 11 और 13 मई 1998 के दिन पोखरण में परमाणु बम का सफ़ल परीक्षण कर इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली ऐतिहासिक कहानी रच डाली।
-(साभार:विजय संकेत)

विशेष- उपर्युक्त सभी तथ्य पोखरण परमाणु परीक्षण दल के सदस्य के वार्तालाप के आधार पर लिखी अद्वितीय पुस्तक "विजय-संकेत" से लिए गए हैं। यह पुस्तक पाठकगण अर्चना प्रकाशन, दीनदयाल परिसर के समीप, एम.पी.नगर, भोपाल (.प्र.) से प्राप्त कर सकते हैं।
!!जय हिन्द!!

तत्तकालीन प्रधानमन्त्री "भारत-रत्न" श्री अटल बिहारी वाजपेयी पत्रकारों को 11-13 मई 1998 को पोखरण में हुए परमाणु परीक्षणों की जानकारी देते हुए-                                                    
                                        
                                                          

प्रस्तुति-पं. हेमन्त रिछारिया