कल रात न्यूज़ चैनल पर लोकसभा की सीधी कार्रवाई के दौरान लोकतंत्र का मज़ाक बनता देखता रहा।
रात ठीक ११ बजे जहां अन्ना और भारतीय लोकतंत्र की तबीयत बिगडी़ वहीं लोकसभा में सरकार का लोकपाल बिल आंशिक संशोधनों के साथ ध्वनिमत से पारित हो गया। उधर अन्ना हजारे ने डाक्टर की सलाह मान कर इंजेक्शन ले लिया तो इधर लोकसभा में सरकार ने विपक्ष के सारे संशोधन रूपी इंजेक्शनों को एक शरारती बच्चे की मानिंद झटक कर गिरा दिया। अन्ना जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे पर निकट भविष्य में सरकार की सेहत कैसी रहेगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। सपा,बसपा,और राजद ने अपने चित-परिचित अंदाज़ में सदन से वाक-आऊट कर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के हाथ मजबूत किए। उनकी अपनी राजनैतिक मजबूरियां जो थीं। वहीं दूसरी एनडीए भले ही ऊपर से ना सही, अंदर ही अंदर बहुत खुश होगा क्योंकि सरकार के इस कदम ने उसे सत्ता के एक पायदान और करीब ला खड़ा किया है। अब बात जनता की तो उसे इस सरकारी लोकपाल को अपनी हार के रूप में ना लेकर भ्रष्टाचार के विरूद्ध एक सकारात्मक पहल के रूप में लेना चाहिए और अपनी इस लडा़ई को जारी रखना चाहिए।
-हेमंत रिछारिया
सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
गुरुवार, 29 दिसंबर 2011
रविवार, 4 दिसंबर 2011
ज़िंदगी अपनी हो रही...
ज़िंदगी अपनी हो रही जो ग़म में बसर है
कुछ तो किस्मत कुछ तेरी आहों का असर है।
कटती नहीं शब तेरे आगोश के बिना
लगता है जैसे बड़ी दूर सहर है।
कब्र पे आकर वादा वो निभा गए
आज सुर्खियों में बनी ये ख़बर है।
मैं तो लिए बैठा हूं खाली जाम अपना
लेकिन मेरा साकी डाले ना नज़र है।
-हेमंत रिछारिया
कुछ तो किस्मत कुछ तेरी आहों का असर है।
कटती नहीं शब तेरे आगोश के बिना
लगता है जैसे बड़ी दूर सहर है।
कब्र पे आकर वादा वो निभा गए
आज सुर्खियों में बनी ये ख़बर है।
मैं तो लिए बैठा हूं खाली जाम अपना
लेकिन मेरा साकी डाले ना नज़र है।
-हेमंत रिछारिया
बुधवार, 30 नवंबर 2011
अभी स्वप्न मेरा अधूरा-अधूरा
कहो जागरण से ज़रा सांस ले ले,
अभी स्वप्न मेरा अधूरा-अधूरा।
लकीरें बनी है न तस्वीर पूरी
अभी ध्यान-साधना है अधूरी
मुझे देवता मत पुरूस्कार देना
अभी यत्न मेरा अधूरा-अधूरा।
अभी आरती आग कब बनी है
अभी भावना भारती कब बनी है
मुखर प्रार्थना मौन अर्चन नहीं है
निवेदन बहुत है समर्पण नहीं है
अभी कसौटी पे ना मुझको चढ़ाओ
अभी स्वर्ण मेरा अधूरा-अधूरा।
पवन पात की पायलों को बजाए
किरण फूल के कुंतलों को खिलाए
भ्रमर जब चमन में मुरलिया सुनाए
मुझे जब तुम्हारी कभी याद आए
तभी द्वार आकर तभी लौट जाना
ह्रदय भग्न मेरा अधूरा-अधूरा।
अभी स्वप्न मेरा अधूरा-अधूरा।
लकीरें बनी है न तस्वीर पूरी
अभी ध्यान-साधना है अधूरी
मुझे देवता मत पुरूस्कार देना
अभी यत्न मेरा अधूरा-अधूरा।
अभी आरती आग कब बनी है
अभी भावना भारती कब बनी है
मुखर प्रार्थना मौन अर्चन नहीं है
निवेदन बहुत है समर्पण नहीं है
अभी कसौटी पे ना मुझको चढ़ाओ
अभी स्वर्ण मेरा अधूरा-अधूरा।
पवन पात की पायलों को बजाए
किरण फूल के कुंतलों को खिलाए
भ्रमर जब चमन में मुरलिया सुनाए
मुझे जब तुम्हारी कभी याद आए
तभी द्वार आकर तभी लौट जाना
ह्रदय भग्न मेरा अधूरा-अधूरा।
गुरुवार, 4 अगस्त 2011
अपने मांहि टटोल

आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। आज गुरूवार है सांई बाबा का दिन और आज नागपंचमी भी है। लेकिन आज के दिन में एक और खा़स बात है आज संसद में बहुचर्चित लोकपाल बिल पेश होने वाला है। वह लोकपाल जो एक विषदंत-हीन नाग की तरह सिर्फ बाल मानसिकता वालों को डराने की वस्तु मात्र होगा। यह लोकपाल अन्ना का जनलोकपाल नहीं है; वो तो कब का ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसी से संबंधित आज एक समाचार पत्र में मशहूर फिल्मकार एवं पत्रकार प्रीतिश नंदी का एक लेख पढ़ा जिसमें उन्होने बड़ी ही साफगोई से जनलोकपाल का मौखिक समर्थन कर रहे व्यक्तियों को अक्स दिखाया है। अन्ना के जनलोकपाल को समझने और इसके समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद करने से पहले हमें भ्रष्टाचार को समझना होगा। आप कहेंगे उससे तो हम भली भांति परिचित है; मगर शायद नहीं। आप यदि भ्रष्टाचार से परिचित और पीड़ित होते तो स्वयं इसमें सहभागी नहीं होते। अब आप और भी चौकेंगे और कहेंगे कि हम भला भ्रष्टाचार में कैसे सहभागी हैं, हम तो इसके विरोध में हैं। मेरे देखे आज आम नागरिक भ्रष्टाचार के विरोध में नहीं बल्कि अपने शोषण के विरोध में है। क्योंकि भ्रष्टचार को तो अभी पूरी तरह समझा कहां है? अभी तो भ्रष्टचार का मतलब सिर्फ रिश्वतखोरी से लगाया जाता है, जो कि इसका बड़ा ही सीमित अर्थ है। शाब्दिक अर्थों में यदि देखें तो भ्रष्टाचार दो शब्दों से मिलकर बना है "भ्रष्ट"+"आचार", "आचार" संस्क्रत का शब्द है जिसका अर्थ होता है "आचरण", तो हम यह कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ हुआ "भ्रष्ट-आचरण"। अब इस व्यापक अर्थ में हर वो चीज़ भ्रष्टाचार है जो भ्रष्ट-आचरण से संबंधित है। मसलन, रेल रिजर्वेशन कराने; बिजली-टेलीफोन के बिल जमा करने या मंदिर में दर्शनों के लिए लाइन तोड़ना;भ्रष्टाचार है। अपने कर्तव्य स्थल से चाय-नाश्ते के बहाने घंटों गायब रहना;भ्रष्टाचार है। सरकारी वाहन का निजी कार्यों में उपयोग;भ्रष्टाचार है। दूध में पानी मिलाना, कम तौलना,मिलावट करना, भ्रष्टाचार है। अपने कर्तव्य स्थल पर समय से नहीं पहुंचना, भ्रष्टाचार है। मतदान नहीं करना, देशहित में भागीदारी नहीं करना, गलत जानकारी देना, ये सब भ्रष्टाचार है। ऐसी और भी कई बातें है पर मुख्य बात है जो कार्य-कलाप आपके आचरण को भ्रष्ट करता हो वह भ्रष्टाचार है। परंतु ये सब बातें हमारी आदत में शुमार है इसलिए हम इन्हे भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं रखते। परंतु यहीं से भ्रष्टाचार का बीज पड़ता है। आज हम निजी-हित के लिए देश-हित को एक तरफ रख देते हैं। आज हमने अपनी ज़िंदगी में अर्थ को इतना अधिक मूल्य दे दिया है जिसके चलते सारे मूल्य बौने हो गए हैं। इस देश में ऐसे कितने नागरिक जो अपने निजी हितों की बली चढा़कर देशहित को संवर्धित करना चाहेगें? संख्या बताने जैसी नहीं होगी। फिर इस तरह जनलोकपाल का समर्थन करना ठीक वैसा ही है जैसे किसी धर्मगुरू के सत्संग में जाकर आंख बंद कर ध्यानस्थ मुद्रा बनाकर अपने बगल वाले को अपने धार्मिक होने का धोखा देना।
आज टीम अन्ना को बार-बार सरकार के नुमाइंदों से यह चुनौती मिल रही है कि वो चुनाव क्यों नहीं लड़ लेते? और इसके जवाब में टीम अन्ना बगले झांकने लगती है क्योंकि वो भी ये जानती कि इसका नतीजा क्या होने वाला है। परंतु मेरा सुझाव यह है कि एक बार टीम अन्ना या बाबा रामदेव जैसे जितने भी लोग देश हित के झंडाबरदार हैं उन्हे चुनाव लड़ ही लेना चाहिए जिससे कम से कम ये तो पता चल जाएगा कि वास्तव में आखिर कितने लोग भ्रष्टाचार एवं भ्रष्ट व्यवस्था से त्रस्त हैं! आज जन-लोकपाल का मौखिक समर्थन करने वालों के निजी जीवन और जेब पर जब इस बिल की कसावट महसूस होगी तब वो इसके नाम मात्र से कोसों दूर नज़र आएगे। दुआ करता हूं मेरी यह धारणा गलत साबित हो। अंत में भ्रष्टाचार का मौखिक विरोध करने वाले सभी भद्रजनों को एक फकीर की बात याद दिलाना चाहता हूं जिसमें वह कहता है-"अपने मांहि टटोल"।
-हेमंत रिछारिया
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
अन्ना का आगाज़

जैसे-जैसे १६ अगस्त की तारीख पास आ रही है वैसे-वैसे केंद्र सरकार की धड़कन तेज़ हो रही है। भष्ट्र व्यवस्था एवं भष्ट्राचारियों को ध्वस्त करने वाले जन-लोकपाल को लेकर अन्ना हज़ारे का प्रस्तावित अनशन यूपीए-२ के सिपहसालारों के गले की फांस बना हुआ है। सरकार के नीति निर्माता ये बखूबी जानते हैं कि अन्ना ना तो बाबा रामदेव की तरह जोशवादी हैं और ना ही उनके पास विद्वान विचारकों की कमी है। सबसे बड़ी बात जो सरकार को परेशान कर रही है, वह है अन्ना को मिलने वाला जन-समर्थन। आज़ादी के लंबे समय बाद किसी आंदोलन में जनता के सभी वर्गों की इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति देखी गई,जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। अन्ना ने बड़े ही सरल और सहज ढंग से दिए गए अपने बयानों से ना सिर्फ जनता का विश्वास हासिल किया बल्कि जन-मानस के दिलों में अपनी जगह भी बनाई। जब भी कोई व्यक्ति जनता का चहेता बन जाता है तो उसकी आवाज़ को बलपूर्वक दबाना आसान नहीं होता। फिर अन्ना के आंदोलन का मुद्दा भी आम जनता से जुड़ा हुआ है। जिस भ्रष्ट व्यवस्था पर अन्ना कुठाराघात कर रहे हैं उसका सामना प्रतिदिन हम सभी को करना पड़ता है। आज हर नागरिक के दिलो-दिमाग में ये सवाल एक यक्ष प्रश्न की तरह गूंजता रहता है कि आखिर कब तक? और जब उसे इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता तो वह हार-थक कर या तो इस भ्रष्ट व्यवस्था से समझौता कर लेता या फिर इसका हिस्सा बन जाता। परंतु अन्ना ने बड़े ही विधायक ढंग से आम आदमी को भ्रष्टाचार के विरूद्ध इस मुहिम में अपने साथ खड़ा कर लिया। यहां तक तो अन्ना सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गए पर अब उनका सामना उस सरकारी तंत्र से है जिसके पास "पावर" अर्थात शक्ति है। और जब भी कोई किसी शक्ति के विरूद्ध सौम्य रूप में खड़ा होता है तो उसकी सफलता में संशय होता है। बाबा रामदेव इसका ताज़ा उदाहरण हैं। ये राजनेता आज इसीलिए स्वंछ्दता से जनता के हितों से खिलवाड़ कर रहे हैं क्योंकि उनके पास शक्ति है यदि यही शक्ति अन्ना जैसे किसी राष्ट्रवादी के हाथों में हो तो क्या देश की भ्रष्ट व्यवस्था परिवर्तित नहीं हो सकती? तो फिर क्यों अन्ना इस तरह की गांधीगिरी पर उतारू हैं। आज किसी भी सरकार को अपने इशारों पर चलाने के लिए बहुत थोड़े से "नंबरों" की आवश्यकता होती है। अन्ना जैसे प्रभावशाली समाजसेवी के लिए अपने लिए कुछ जनप्रतिनिधियों का निर्वाचन अब कोई मुश्किल काम नहीं रहा। इन कुछ सांसदो के बल पर अन्ना ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से अपनी बात मनवाने में कामयाब हो सकते हैं। मेरा मानना है कि इस तरह अनशन करने की बजाय अन्ना को चाहिए कि वह कुछ संसदीय क्षेत्रों का चुनाव कर वहां अपनी ज़मीन मज़बूत कर शक्ति को अपने हाथों में लेने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए क्योंकि इस तरह के अनशन का कोई बहुत प्रभावी दीर्घकालिक असर सत्तापक्ष पर पड़ता दिखाई नहीं देता और यह बात अन्ना बखूबी जानते भी हैं। फिर क्यों वे हमारे शास्त्रों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने से हिचकते हैं जो यह कहता है "शठे शाठ्यं समाचरेत"।
-हेमंत रिछारिया
शुक्रवार, 22 जुलाई 2011
बरखा रानी
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा,
बता ओ बरखा रानी।
घर की छ्त गलती अक्सर,
जब-जब बरसे पानी॥
बारिश में लगता हर सूं मौसम बड़ा सुहाना,
बूंद-बूंद इक ताल सुनाए पंछी गाएं गाना।
मैं सोचूं कैसे चूल्हे की आग जलानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....
ठंडी-ठंडी बौछारें हैं पवन चले घनघोर,
बादल गरजे उमड़-घुमड़ नाचे वन में मोर।
मन मेरा सोचे कैसे गिरती दीवार बचानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....
इंद्रधनुष की छ्टा बिखेरी बरसा पानी जम के,
पांवों में नूपुरों को बांधे बरखा नाची छ्म से।
मैं ढूंढूं वो सूखा कोना जहां पे खाट बिछानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....
पृकृति कर रही स्वागत तेरा कर अपना श्रृंगार,
पपीहे ने किया अभिनंदन गा कर मेघ मल्हार।
मैं करता स्वागत तेरा भर अंखियों में पानी,
आ जा ओ बरखा रानी, आ जा ओ बरखा रानी॥
-हेमंत रिछारिया
दोहो का संसार
अपनी बेटी के लिए, लाड़; दुआ; ताबीज़
औरों की बेटी बने, बहलावे की चीज़।
प्यार;शराफत;आबरू, शर्म;वफा;ईमान
आओ यार खरीद लो बिकता है सामान।
करते हो ओ वैदजी कैसा कारोबार
भूखे लोगों का किया औषध से उपचार।
पायल हैं या बेड़ियां मत पूछो सरकार
कितने दिन से कैद हूं कह देगी झंकार।
आदर्शों के वो महक और बुलंद उसूल
इस आधुनिक दौर में चाट रहे हैं धूल।
- लक्ष्मण (गुजरात)
औरों की बेटी बने, बहलावे की चीज़।
प्यार;शराफत;आबरू, शर्म;वफा;ईमान
आओ यार खरीद लो बिकता है सामान।
करते हो ओ वैदजी कैसा कारोबार
भूखे लोगों का किया औषध से उपचार।
पायल हैं या बेड़ियां मत पूछो सरकार
कितने दिन से कैद हूं कह देगी झंकार।
आदर्शों के वो महक और बुलंद उसूल
इस आधुनिक दौर में चाट रहे हैं धूल।
- लक्ष्मण (गुजरात)
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