शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

मध्यप्रदेश जय हे....

जय जय मध्यप्रदेश जय हे !
विशालभारतवर्षह्रदय हे !
जय जय मध्यप्रदेश जय हे....
***
विन्ध्याचलमेखला नर्मदा
वहति लोकजीवनं सर्वदा !
विततसतपुडा श्रंगश्रंखला
तव वनधनशोभासमुज्जवला !!
क्षिप्राचंबल नदी सदय हे !
जय जय .............
***
जयति झाबुआलोकजीवनं
चित्रकूट तट रामकीर्तनमं !
कथयति सांची तवेतिहासं
खजुराहो तव कलाविलासमं !!
अभ्यारण-पुण्यपरिचय हे !
जय जय ....................
***
कालिदासधरणी सुसंस्क्रता
तानसेन-संगीत-झंक्रता
तव विक्रम-संवत्सर-रूचिरा
विविध रत्नगर्भा वसुंधरा !!
पंचराज्य-वलयति-परिसर हे !
जय जय मध्यप्रदेश........

-श्रीनिवास रथ

रिक्त


शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की स्थिति

नगरीय निकायों में चुनाव की घोषणा होते ही राजनैतिक गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। भाजपा के लिये यह चुनाव अत्यंत मह्त्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में हुए उप चुनावों में जिस तरह से पार्टी का सूपडा़ साफ हुआ है वह पार्टी के अस्तित्व के लिये एक गंभीर चिंता का विषय है। आज भाजपा एक अदद नेत्रत्व के लिये तरस रही है। वहीं पार्टी की छवि को लेकर भी जनता में असमंजस है। जहां एक ओर भाजपा अपने हिंदुत्ववादी चेहरे को बचा पाने में नाकाम दिखती है वहीं दूसरी ओर सेकुलर छवि बनाने में भी वह बुरी तरह असफल रही है। उसकी हालत ठीक ऐसी है कि ना ही खुदा मिला; ना विसाले-यार। भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि या तो वह कट्टर हिंदुत्व की बात करती है या उसके नेता सेकुलर छवि बनाने के मोह में जिन्ना का गुणगान करने लगते हैं और अपने ही दल के लोगों के कोपभाजन बन जाते हैं। इन सब बातों से जन मानस में एक कनफ्यूज़न पैदा होता है। जहां सत्तालोलुपता के चलते पार्टी ने कई बार अपनी मूल विचारधाराओं से समझौता किया है वहीं अपनी अंर्तकलह की वजह से गोविंदाचार्य, उमा भारती, जसवंत सिंह जैसे कद्दावर और "थिंक टैंक" माने जाने वाले नेताओं को खोया है। वरूण गांधी जैसे तेज-तर्रार युवा हिंदू चेहरे को भी पार्टी ने हाशिए पर धकेल रखा है। वहीं कांग्रेस ने बड़ी ही खूबसूरती से राहुल गांधी को एक संजीदा और कुशल युवा नेत्रत्व के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। जिसका खा़मियाज़ा यदा-कदा चुनावों में भाजपा को भुगतना पड़ता है। दल में सोच और नेत्रत्व का अभाव भाजपा के लिये गंभीर संकट का कारण बना है। बहरहाल, यहां हमारा मुख्य उद्देश्य नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा की स्थिति का आंकलन करना है जिसकी प्रष्ठभूमि के लिये उपरोक्त बातों की चर्चा आवश्यक थीं। मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अच्छा काम तो कर रहें हैं पर यहां भी वे दलगत बुराईयों को दूर करने में अक्षम व असहाय दिखाई देते हैं यह बात हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में साफ तौर पर उभर कर सामने आई है। जिससे उनका कद प्रभावित हुआ है। मप्र में शिवराज सिंह की स्थिति सर्कस के शेर की भांति है जो कर तो बहुत कुछ सकता है पर अपने रिंग मास्टर के आगे विवश हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वे विधायक जो पिछले सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बाहर कर दिये गए थे पुन: मंत्री पद प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते। शिवराज सरकार के मंत्री हो या निगम अध्यक्ष सभी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। कुछ तो मुख्यमंत्री से अपनी नज़दीकियों को भुनाने में लगे हैं तो कुछ दिल्ली के अपने आकाओं के वरदहस्त की बदौलत मुख्यमंत्री के स्वर्णिम मध्यप्रदेश के सपने को धता बता रहे हैं। कुल मिलाकर शिवराज सिंह अपने भ्रष्टाचारी मंत्रियों और बढ़ती गुटबाज़ी पर लगाम कसने में नाकाम रहे हैं। कम से कम ज़मीनी स्तर पर तो ऐसा ही लगता है। नगरीय निकाय चुनावों में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर नज़र आती है। जहां छवि पर गुटबाजी हावी रहने वाली है। जहां कुछ नेतागण अपने तथाकथित त्याग को भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे वहीं वे जो मंत्रीपद की मलाई चखने से वंचित रह गये थे पूरी कोशिश करेंगे कि इस बार मेयर या अध्यक्ष की कुर्सी उन्हे या उनके किसी चहेते को मिले। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप खुद समझदार हैं कि वे क्या करेंगे। इस बार नगरीय निकाय चुनाव शिवराज सिंह और भाजपा दोनों के लिये एक कसौटी है जिससे प्रदेश और राष्ट्र में उनकी स्थिति का आंकलन हो सकेगा। टिकिट वितरण में यदि पार्टी अपने तथाकथित मानकों के अनुरूप ही चलती है और स्वच्छ, ईमानदार छवि और विकास के मुद्दे को ध्यान में रखते हुए "अंधा बांटे रेवड़ी" वाली कहावत को नकारने में सफल हो जाती है तो निश्चित ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकती है। प्रदेश में कांग्रेस एक कमज़ोर विपक्ष की भूमिका में है परंतु अपनी अंर्तकलह और गुटबाजी से ऊपर उठकर भाजपा इसका फायदा ले सकेगी इसमें संदेह है। हाल ही में हुए उपचुनावों में मिली विजय से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद हैं और पार्टी उत्साह से भरपूर है सो वो इस परीक्षा में भी खरा उतरने का पूरा प्रयास करेगी। मुख्य मुकाबला भाजपा एवं कांग्रेस के बीच ही होना है। चूंकि यह नगरीय निकायों के चुनाव है इसलिये ऐसा माना जा सकता है कि इसमें केन्द्रीय नेत्रत्व या आलाकमान दखलंदाजी नहीं करेगा यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो शिवराज सिंह को अपनी छवि के अनुरूप "सिंह-गर्जना" का पूरा मौका मिलेगा। नए मंत्री भी उत्साह से लबरेज़ हैं उन्हे अपने आकाओं को कुछ कर दिखाने का मौका जो मिला है। यदि इन सब के बाद भी पार्टी नगरीय निकाय चुनावों में खराब प्रदर्शन करती है तो उसे कम से कम दस साल के वनवास को भोगने के लिये तैयार रहना चाहिए।

-हेमन्त रिछारिया
संपादक "सरल-चेतना"

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

चार दीपक सदा जगमगाते रहे.....

चांद सूरज दिये दो घड़ी के लिये
रोज़ आते रहे और जाते रहे
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा जगमगाते रहे।

मुख तुम्हारा अंधेरी डगर की शमा
रात बढ़ती गई तो हुआ चंद्र्मा
याद तुमको किया, रोज़ हमने जहां
आंधियों में वहीं छा गई पूर्णिमा
बादलों की झड़ी में जली फुलझड़ी,
बिजलियों में कमल मुस्कुराते रहे।
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

बीन तुम प्रीति की झनझनाती हुई
तुम हवा मेघ की सनसनाती हुई
हम हवा की लहर प्यार की राह पर
दर्द की रागिनी गुनगुनाती हुई
दूर तुमने किया, दर्द इतना दिया
हम जहां भी रहे गुनगुनाते रहे।

दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

दीपज्योति



शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धन संपदा ।
शत्रुबुध्दि विनाशाय दीपज्योतिर्नमोस्तुते ॥
दीपज्योति: परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दन:।
दीपो हरतु में पापं दीपज्योतिर्नामोस्तुते ॥

‍" हे दीपज्योति ! तू हमारा शुभ करने वाली, कल्याण करने वाली, हमें आरोग्य और धनसंपदा देने वाली ,
शत्रु बुध्दि का नाश करने वाली है। तुझे नमस्कार ! हे दीपज्योति ; तू परब्रह्म है, तू जनार्दन है, तू हमारे
पापों का नाश करती है, तुझे नमस्कार ।"

दीप तुम जलो

दीप तुम जलो कि अंधकार जले, अहंकार जले
रोशनी तले अंधेरा रो-रो ढले
फुलझडी़ के फूल लगे बडे़ भले
अनार खिलखिलाए आधी रात ढले
रोशनी अंधेरे को, जिंदगी मौत को छ्ले
ज्योति-कलश आप लें कालिमा हाथ मले॥
दीप तुम जलो कि अंधकार जले......

(साभार: तंत्र ज्योतिष)



अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए.....

जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूं ही,
भले ही दिवाली यहां रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएं नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

एक दीया होता है...


एक दीया होता है, जो सँध्या की आगवानी में नन्ही बिटिया के द्वारा तुलसी के बिरवे के सामने सँजोया जाता है।
एक दीया होता है, जो खतरे की सूचना देने वाले चौकीदार की तरह घने अँधकार में जलाया जाता है।
एक दीया होता है, जो बहन के द्वारा अपने भाई की आरती के लिये सँजोया जाता है।
एक दीया होता है, जो हल्दी भरे अंग वाली बहू के द्वारा सुख और सम्रध्दि की कामना के साथ एक परिवार से दूसरे परिवार में लाया जाता है।
एक दीया होता है, जो धरती पर आने वाले नये इन्सान के स्वागत में किसी बच्चे के जन्म लेने पर सँजोया जाता है।
एक दीया होता है, जिसके सहारे कोई विरहिणी अपने पिया की याद में सारी जिंदगी काट देती है।
एक दीया होता है, जिसकी लौ के तले वर-वधू पहली बार सुहाग कक्ष में एक-दूसरे का मुख निहारते हैं।
एक दीया होता है, जो जीवन की सम्पूर्ण पूजा समाप्त होने के उपरान्त प्रभु के चरणों में अर्पित किया किया जाता है।

जब इन सब दीयों को एक कतार में रख दिया जाता है तो दीपावली का त्यौहार बन जाता है।
 

"सरल-चेतना" के सभी सुधि पाठकों को दीपपर्व की हर्दिक शुभकामनाएं
- हेमंत रिछारिया (संपादक)