बुधवार, 17 अक्टूबर 2018

शमी पूजन कर मनाएं विजयादशमी-

नवरात्र की पूर्णता के साथ ही देशभर में विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। विजयादशमी का पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का सन्देश देता है। विजयादशमी पर्व है संकल्प का कि हम अपने अन्तर्तम में उपजी बुराईयों पर विजय प्राप्त कर सन्मार्ग पर अग्रसर हो सकें। देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी का पर्व अपनी-अपनी लोकपरम्पराओं के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन रावण दहन भी किया जाता है जो बुराई एवं अहंकार का प्रतीक है। विजयादशमी के दिन शस्त्रपूजा एवं शमी वृक्ष की पूजा का विशेष महत्त्व होता है। विजयादशमी के दिन देश के कुछ हिस्सों में अश्व-पूजन भी किया जाता है। सनातन धर्मानुसार विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमी वृक्ष का पूजन अवश्य किया जाना चाहिए। आईए जानते हैं कि शमीवृक्ष का पूजन किस प्रकार किया जाना श्रेयस्कर रहता है-
- विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमीवृक्ष के समीप जाकर उसे प्रणाम करें। तत्पश्चात शमीवृक्ष की जड़ में गंगालज/नर्मदाजल/शुद्धजल का सिंचन करें। जल सिंचन के उपरान्त शमीवृक्ष के सम्मुख दीपक प्रज्जवलित करें। दीप प्रज्जवलन के पश्चात शमीवृक्ष के नीचे कोई सांकेतिक शस्त्र रखें। तत्पश्चात शमीवृक्ष एवं शस्त्र का यथाशक्ति धूप,दीप,नैवेद्य,आरती से पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। पूजन के उपरान्त हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करें-
"शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता॥"
-अर्थात हे शमी वृक्ष आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की, हम भी करेंगे। हमारी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।
-प्रार्थना उपरान्त यदि आपको शमीवृक्ष के समीप शमीवृक्ष की कुछ पत्तियां गिरी मिलें तो उन्हें आशीर्वाद स्वरूप ग्रहण कर लालवस्त्र में लपेटकर सदैव अपने पास रखें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपको शमीवृक्ष से स्वयमेव गिरी पत्तियां ही एकत्र करना है शमीवृक्ष से पत्तियां तोड़नी नहीं हैं। इस प्रयोग से आप शत्रुबाधा से मुक्त एवं शत्रु पराभव करने में सफ़ल होंगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

धर्म, आस्था और न्यायपालिका


विगत कुछ दिनों में देश की न्यायपालिका से कुछ ऐसे फ़ैसले आए जिन्हें स्वीकारने में समाज के एक बड़े वर्ग ने झिझक महसूस की। कुछ फ़ैसले सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे, वहीं कुछ धार्मिक क्षेत्र से। इन फ़ैसलों ने देश में चिन्तन का एक नया अध्याय प्रारम्भ किया। समाज का प्रत्येक वर्ग इन फ़ैसलों को अपनी बुद्धिमत्ता के अनुसार अपनी तर्कसरणी की कसौटी पर कसकर जाँचने-परखने लगा और इन फ़ैसलों के पक्ष व विपक्ष में खड़ा होने लगा। अब प्रश्न यह उठता है कि लैंगिक समानता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और निजता के अधिकार की ढ़ाल के पीछे छिपकर अपनी सनातन सँस्कृति पर प्रहार करना कहाँ तक उचित व स्वीकार्य है। भारतीय मनीषा को इस यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही होगा। ईश्वर ने सभी व्यक्तियों को समान बनाया है यह बात सत्य है लेकिन इस समानता का आधार क्या है! क्या इस तथ्य को जानने व समझने का प्रयास कभी किया गया है? ईश्वर की बनाई समानता और इस समानता का तर्क देकर प्रकृति प्रदत्त विभेद को मिटाने का प्रयास दो विपरीत बाते हैं। जैसे ईश्वर ने प्रत्येक स्त्री-पुरूष को आत्मा व सात चक्रों के आधार पर समानता प्रदान की है किन्तु प्रकृति ने स्त्री-पुरूषों में शारीरिक भेद भी किया है। प्रकृति द्वारा किया गया यह भेद किसी भी प्रकार से नहीं मिटाया जा सकता। जो लैंगिक समानता की बातें करते हैं वे मूलरूप में अपने अहंकार को तुष्ट करने की बात करते हैं क्योंकि हमारे सनातन धर्म में कहीं भी स्त्री-पुरूषों में श्रेष्ठ व निकृष्ट का कोई भेद नहीं किया गया है। जिसे कुछ लोग असमानता समझने की भूल करते हैं वास्तविक रूप में वह स्त्री-पुरूष की विशिष्टताएँ हैं जो एक-दूसरे के समान नहीं हो सकती। स्त्री को जो विशिष्टताएँ प्राप्त हैं वह पुरूषों में नहीं हो सकती जैसे गर्भधारण व सन्तान को जन्म एवं उसे पोषण देना, ठीक पुरूषों में कुछ विशिष्टताएँ हैं जो स्त्री में नहीं हो सकती। हमारे सनातन धर्म में कई ऐसे कर्मकाण्ड हैं जिनमें स्त्रियों को वरीयता प्राप्त है इसका जीवन्त उदाहरण है- नवरात्रि में कन्या पूजन। हिन्दू देवी-देवताओं के नामों में भी अक्सर प्रथम नाम स्त्रीसूचक ही होता है जैसे राधाकृष्ण, लक्ष्मीनारायण, सीताराम आदि। इन बातों को श्रेष्ठ व निकृष्ट में बाँटकर सामाजिक सौहार्द को विखण्डित करना सर्वथा अनुचित है। अब बात करें लोक परम्पराओं व मान्यताओं की, तो हर देश; हर समाज; हर वर्ग एवं हर क्षेत्र की कुछ अपनी मान्याएँ होती हैं जिनसे सामाजिक ताना-बाना सुदृढ़ होता है। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार समय-समय पर इन मान्यातों व परम्पराओं की समीक्षा होकर इनमें परिवर्तन भी होता रहता है किन्तु लोक-परम्पराओं व मान्यताओं में होने वाला यह परिवर्तन यदि जागरूकता के आधार पर होता है तब यह अधिक सुदृढ़ व ग्राह्य होता है। यदि यह परिवर्तन बलपूर्वक एक-दूसरे को नीचा दिखाकर जय-पराजय के उद्देश्य से किया जाता है तब यह सामाजिक विद्वेष का कारण बनता है। हमारे मतानुसार धर्म एक व्यवस्था है जो व्यवस्था बनाने में सहायक होता है वही धार्मिक है और जो व्यवस्था बिगाड़ता है वह अधार्मिक है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, साधना तो केवल उस जन्म से प्राप्त ईश्वर के अंश को अनुभूत करने मात्र की है। जब श्रद्धा से कहीं पर भी शीश झुका दिया जाता है तत्क्षण वहीं परमात्मा अवतरित हो जाता है और वह स्थल मन्दिर बन जाता है। भक्त और भगवान के मध्य ना तो मन्दिर की आवश्यकता है और ना ही किसी विशिष्ट कर्मकाण्ड या पूजा-पद्धाति की। भक्त और भगवान के मध्य यदि कुछ अनिवार्य है तो वह है-प्रेम। अब इस प्रेम को श्रद्धा कहें, भक्ति कहें, भाव कहें, पूजा-पद्धति कहें, या फ़िर लोकमान्यता कहें, जो भी नाम देना चाहें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जब भक्त का भाव ईश्वरानुराग में लग जाता है तब उसे किसी बाहरी वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं होती। लोकपरम्पराओं व मान्यताओं के मध्य खींचतान अहंकार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अत: सामाजिक सौहार्द के लिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए है कि इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप यदि आवश्यक हो तो वह जागरूकता के आधार पर हो ना कि बल के आधार पर। तभी हम हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ समाज दे पाएँगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
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सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

महाआहुतियां अर्पण कर पाएं देवी का आशीर्वाद

नवरात्र के नौ दिनों में श्रद्धालुगण पूर्ण श्रद्धाभाव से देवी की आराधना करते हैं। नवरात्र के नौ दिन यथाशक्ति भगवती की पूजा-अर्चना के उपरान्त अन्तिम दिवस "महानिशा-पूजा" की जाती है। जिसमें राजराजेश्वरी माँ जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु हवन किया जाता है। हमारे सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता हवन के माध्यम से ही की जाती है। देवी जी की आराधना में हवन का विशेष महत्त्व होता है। हवन के उपरान्त कन्या-भोज कराया जाता है। श्रद्धालुगण "महानिशा-पूजा" का हवन यथाशक्ति व सामर्थ्य अनुसार सम्पन्न कर सकते हैं। किन्तु जिन श्रद्धालुओं द्वारा नवरात्र में दुर्गासप्तशती के सम्पूर्ण तेरह अध्यायों का पाठ किया गया हो उन्हें दुर्गासप्तशती के मन्त्रों से हवन करना एवं प्रत्येक अध्याय की विशेष आहुति जिसे "महाआहुति" कहा जाता है, अर्पण करना श्रेयस्कर रहता है। जो श्रद्धालुगण सप्तशती के मन्त्रों से हवन करने के स्थान पर मात्र देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का पाठ कर हवन एवं महाआहुतियाँ अर्पण करना चाहते हैं वे देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की माला के उपरान्त प्रत्येक का अध्याय के निर्दिष्ट मन्त्र का उच्चारण करके माँ दुर्गा को "महाआहुति" अर्पण कर सकते हैं।
आईए जानते हैं कि सम्पूर्ण तेरह अध्यायों की महाआहुतियाँ कौन सी हैं-
1. पहला अध्याय-
मन्त्र- ॐ महाकाल्यै स्वाहा
महाआहुति- कमलगट्टा, काली मिर्च, शहद, महुआ, राई
2. दूसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- जायफ़ल, जावित्री, कद्दू, पीली सरसों, राई
3. तीसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- उड़द का बड़ा
4. चौथा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- पंचमेवा व छुआरा (खारक)
5. पांचवा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महासरस्वत्यै स्वाहा
महाआहुति- शक्कर व गन्ना
6. छ्ठा अध्याय-
मन्त्र- ॐ धूम्राक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- जासौन का फ़ूल
7. सातवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ चामुण्डायै स्वाहा
महाआहुति- बीला (बिल्वफ़ल), बिल्वपत्र, पालक
8. आठवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ रक्ताक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- रक्त चन्दन
9. नौवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भैरव्यै तारा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- केला, नागरमोंथा, अगर, तगर
10. दसवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भगवत्यै स्वाहा
महाआहुति- बिजोरा नींबू
11. ग्यारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ नारायण्यै स्वाहा
महाआहुति- खीरपूड़ी
12. बारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ राजराजेश्वर्यै स्वाहा
महाआहुति- दाड़िम (अनार)
13. तेरहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ दुर्गा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- श्रीफ़ल 

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
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मंगलवार, 25 सितंबर 2018

धन के अभाव में कैसे करें “श्राद्ध” -

सनातन हिन्दू परम्परा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण विधि-विधान अनुसार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। किन्तु कई बार आर्थिक संकट एवं विपन्नता के चलते व्यक्ति श्राद्धकर्म को पूर्ण विधि-विधान से करने में स्वयं को असमर्थ पाता है। तब उसके मन में श्राद्धकर्म को पूर्ण विधि से सम्पन्न नहीं करने की ग्लानि होती है। लेकिन हमारे सनातन धर्म की खूबसूरती व औदार्य यही है कि इसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की हर परिस्थिति का ख्याल रखकर नियमों व व्यवस्थाओं का निर्धारण किया गया है। हमारे शास्त्रों ने धन का अभाव होने पर भी श्राद्ध सम्पन्नता के कुछ नियम सुनिश्चित किए हैं। जिसमें अन्न-वस्त्र एवं श्राद्धकर्म की पूर्ण विधि के अभाव में केवल शाक (हरी सब्ज़ी) के द्वारा श्राद्ध सम्पन्न करने का विधान बताया गया है।
"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि।"
यदि शाक के द्वारा भी श्राद्ध सम्पन्न करने का सामर्थ्य ना हो तो शाक के अभाव में दक्षिणाभिमुख होकर आकाश में दोनों भुजाओं को उठाकर निम्न प्रार्थना करने मात्र से भी श्राद्ध की सम्पन्नता शास्त्रों द्वारा बताई गई है।
"न मेस्ति वित्तं धनं च नान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्न्तो·स्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य॥"
(विष्णुपुराण)
- हे मेरे पितृगण..! मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है, न धान्य आदि। हां मेरे पास आपके लिए श्रद्धा और भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं। आप तृप्त हों। मैंने शास्त्र के निर्देशानुसार दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है।

हमारे अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्धकर्म सम्पन्न करना चाहिए। सामर्थ्य ना होने पर ही उपर्युक्त व्यवस्था का अनुपालन करना चाहिए। आलस एवं समयाभाव के कारण उपर्युक्त व्यवस्था का सहारा लेना दोषपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
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गुरुवार, 20 सितंबर 2018

2019 में क्या होंगी मोदी की ज्योतिषीय चुनौतियाँ


देश जैसे-जैसे 2019 के लोकसभा चुनावों की ओर अग्रसर हो रहा है वैसे-वैसे राजनीतिक क्षेत्रों के साथ-साथ आम जनमानस के मन में भी यह उत्कँठा एक यक्ष प्रश्न की भाँति जागृत हो रही है कि वर्ष 2019 में होने जा रहे आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी को पुन: सफलता प्राप्त होगी या नहीं! इस यक्ष प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ ज्योतिष जगत के विद्वान भी कर रहे हैं। हमने इस प्रश्न का समाधान प्राप्त करने हेतु “प्रश्नकुण्डली” को आधार बनाया क्योंकि जब किसी जन्मपत्रिका की प्रामाणिकता सुनिश्चित नहीं होती तब “प्रश्नकुण्डली” फलादेश करने का सर्वाधिक सटीक व उत्तम माध्यम होती है। आईए जानते हैं कि प्रश्नकुण्डली के आधार पर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के लिए वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में कौन सी ज्योतिषीय चुनौतियाँ होंगी।
1. "मालव्य" राजयोग का निर्माण-
वर्ष 2019 के चुनावी भविष्य एवं मोदी जी की सफलता का आँकलन करने हेतु जिस “प्रश्नकुण्डली” का निर्माण हुआ वह तुला लग्न की है। लग्नेश शुक्र के लग्न में स्थित होने के कारण यहाँ "मालव्य" नामक पँचमहापुरूष राजयोग का निर्माण हो रहा है। इसके फलस्वरूप वर्ष 2019 के आम चुनावों में श्री नरेन्द्र मोदी अपने विरोधियों से कहीं आगे दिखाई दे रहे हैं। "मालव्य" योग के कारण उनकी लोकप्रियता बरकरार रहेगी। वे अपनी बातों से जनमानस को मोहित करने में सफल होगें। प्रश्नकुण्डली में दैवगुरू बृहस्पति भी लग्न में ही स्थित हैं जो विद्वत्तापूर्ण व बौद्धिक निर्णय लेने में सहायता करेंगे।
2. विपरीत राजयोग-
प्रश्नकुण्डली में द्वादशेश के द्वादश भाव में स्थित होने के कारण "विपरीत-राजयोग" का निर्माण हो रहा है जो अत्यन्त शुभ है। भाग्य के अधिपति के स्वराशि में स्थित होने के कारण भाग्य का साथ प्राप्त होने जा रहा है। प्रश्नकुण्डली में भाग्याधिपति बुध के स्वराशिस्थ होने एवं "विपरीत-राजयोग" के निर्माण में संलग्न होने के कारण वाणी व वाकचातुर्य का लाभ उन्हें प्राप्त होगा।
3. बुधादित्य योग-
प्रश्नकुण्डली सूर्य-बुध की युति होने से "बुधादित्य" नामक शुभ योग सृजन हुआ है। सूर्य सत्ता एवं राजसिंहासन का प्रतिनिधि है। यहां सूर्य के मित्रक्षेत्री होने के कारण सत्ता प्राप्ति की संभावनाओं को बल मिलेगा।
4. महलक्ष्मी योग-
प्रश्नकुण्डली में "महालक्ष्मी" योग का भी निर्माण हुआ है। जो अत्यन्त शुभ योग है। वहीं कर्मक्षेत्र के अधिपति चन्द्र की पूर्ण दृष्टि कर्मस्थान पर होने से कर्मक्षेत्र में लाभ प्राप्त होता दिखाई दे रहा है
5. शनि तृतीय भावस्थ-
प्रश्नकुण्डली में चतुर्थेश शनि अपने भाव से द्वादश स्थान में स्थित है जो शुभ नहीं है। चतुर्थ भाव जनता का प्रतिनिधि होता है इसके अधिपति का अपने भाव से 12 वें स्थित होना जनसहयोग में कमी को दर्शाता है। इसके फ़लस्वरूप उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा किन्तु साहस-पराक्रम के भाव में शनि की उपस्थिति इन आलोचनाओं का पूर्ण साहस व निडरता के साथ प्रतिकार करने में सहायक होगी।
6. राहु दशमस्थ-
“प्रश्नकुण्डली” में जो सर्वाधिक चिन्ताजनक सँकेत है, वह है राहु का दशम भाव में स्थित होना। दशम भाव कर्मक्षेत्र, यश, मान, प्रतिष्ठा, सत्ता आदि से सम्बन्धित होता है। राहु के दशमस्थ होने से स्पष्ट सँकेत है कि इस बार सत्ता प्राप्ति की राह अधिक कठिन होने वाली है। सत्ता प्राप्ति के लिए कठिन संघर्ष व अथक परिश्रम की आवश्यकता होगी।
7. मँगल की नीचदृष्टि-
प्रश्नकुण्डली में मँगल उच्चराशिस्थ होकर चतुर्थ भाव में स्थित हैं। यहां से मँगल दशभ भाव पर अपनी नीच दृष्टि डाल रहे हैं जो शुभ नहीं है। इसके चलते कर्मक्षेत्र में बाधाएँ आएँगी। मँगल एक मारणात्मक प्रभाव वाला ग्रह है। यह जब किसी भाव पर अपना प्रभाव डालता है तब उस भाव की हानि करता है। कर्मक्षेत्र पर मँगल का नीचदृष्टि प्रभाव सत्ता प्राप्ति में कठिनाईयाँ उत्पन्न करेगा।
8. दशाओं की अनुकूलता-
प्रश्नकुण्डली आधारित विंशोत्तरी दशाओं की गणना श्री नरेन्द्र मोदी जी के लिए अनुकूल दिखाई दे रही है। वर्तमान महादशा व अन्तर्दशा कर्मक्षेत्र के अधिपति की चल रही है जो शुभ व अनुकूल रहेगी।
निष्कर्ष-
प्रश्नकुण्डली की गणनाओं के अनुसार हमें यह सँकेत मिलता है कि श्री नरेन्द्र मोदी जी आगामी लोकसभा चुनावों में अपनी पूर्ववत् सफ़लता नहीं दोहरा पाएँगे किन्तु अपने सभी विरोधियों से अधिक सफल रहेंगे। सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें साझेदारों पर निर्भर रहना होगा। राहु-केतु के प्रभाव के कारण सहसा कोई ऐसी घटना घट सकती है जो सँभावित रुख में अचानक परिवर्तन कर दे। सम्पूर्ण तथ्यों के आँकलन के अनुसार श्री नरेन्द्र मोदी जी के लिए "सत्ता प्राप्ति एवं चुनावों में सफ़लता" के प्रश्न के उत्तर हेतु निर्मित प्रश्नकुण्डली के ग्रह उनके अनुकूल व पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।

***उद्घोषणा- उपर्युक्त विवरण मोदी जी की "चुनावों में सफ़लता" के प्रश्न के उत्तर हेतु निर्मित प्रश्नकुण्डली की गणना पर आधारित है, ना कि उनकी जन्मपत्रिका पर.


-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

अन्त:करण में भी कृष्ण प्रकट हों

भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देश के कोने-कोने में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं के भी जन्मोत्सव व प्राकट्योत्सव मनाए जाते हैं। मेरे देखे यह बहुत सांकेतिक है जिससे जीव को यह स्मरण बना रहे कि उसे अपने अन्त:करण में भी एक दिन परमात्मा का प्राकट्य करना है। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण के प्राकट्योत्सव की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रीकृष्ण का जन्म आततायी कंस के कारागार में मध्यरात्रि में हुआ। मनुष्य का अन्त:करण भी विकारों एक कारागार है जिसमें षड्विकारों के पहरेदार सदैव तैनात रहते हैं। जब मनुष्य के मन में विकार हो तो उसे अन्धकार घेर लेता है। इस स्थिति में जब अन्त:करण में परमात्मा का प्राकट्य होता है तब ठीक श्रीकृष्ण जन्म के जैसे ही हमारे विकारों के बन्धन स्वत: ही कट जाते हैं और हमारे अन्त:करण का कारागार स्वयमेव खुल जाता है। श्रीकृष्ण के जन्म कथा बहुत ही प्रेरक है अत: हम लौकिक रूप से तो यह पर्व अवश्य मनाएं किन्तु हमारा प्रयास यह हो कि एक दिन हमारे अन्त:करण रूपी कारागार में भी श्रीकृष्ण का प्राकट्य हो।
!!वृन्दावन बिहारीलाल की जय!!
!!जय जय श्री राधे!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 22 अगस्त 2018

रक्षाबन्धन



भाई-बहन के स्नेह का त्यौहार रक्षाबन्धन प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार देवी लक्ष्मी ने सर्वप्रथम दैत्यराज बलि को राखी बांधकर अपना भाई बनाया था। व्यावहारिक रूप में देखें तो रक्षाबन्धन भाई-बहन के मध्य प्रेम व स्नेह का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगा कर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं। वहीं भाई इस दिन अपनी बहन को उसकी सर्वत्र रक्षा करने का वचन देता है। हमारे सनातन धर्म में सामाजिक व पारिवारिक ताने-बाने को सुदृढ़ रखने के लिए ऐसी कई प्रथाएं प्रचलित हैं जो सामाजिक व पारिवारिक सौहार्द के लिए बड़ी कारगर साबित हुई हैं। प्राचीन काल से सहोदर (सगे) भाई-बहन के अभाव में मुंहबोले भाई-बहनों का सम्बन्ध प्रचलित है। जिनके मध्य किसी प्रकार का रक्त सम्बन्ध ना होकर केवल "राखी" का सम्बन्ध हुआ करता है। यह पर्व विशुद्ध प्रेम का पर्व है। आज के दौर में जहां नारी को केवल भोग्य वस्तु मानकर उसका यत्र-तत्र-सर्वत्र अनादर किया जाने लगा है वहीं हमारे सनातन में धर्म में रक्षाबन्धन पर्व के माध्यम से नारी के सम्मान की रक्षा का निर्देश है।
आईए जानते हैं इस वर्ष 2018 में रक्षाबन्धन का पर्व कब मनाया जाएगा-
इस वर्ष रक्षाबन्धन का पर्व प्रतिवर्षानुसार श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिनांक 26 अगस्त 2018 को मनाया जाएगा। इस वर्ष रक्षाबन्धन के दिन पंचक रहेगा क्योंकि इस माह पंचक 25 अगस्त से प्रारम्भ होकर दिनांक 30 अगस्त तक रहेंगे। रक्षाबन्धन के दिन दोपहर 12 बजकर 35 मिनिट तक "धनिष्ठा" नक्षत्र रहेगा तत्पश्चात् "शतभिषा" नक्षत्र प्रारम्भ होगा। ये दोनों ही नक्षत्र पंचक कारक है। अत: इस बार राखी पंचककाल में ही बंधेगी।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com