सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
बुधवार, 27 सितंबर 2017
सुरक्षा श्रेणी
1. SPG : Special Protection Group Gaurds.
2. Z+ : Security cover of 55 Personal.
Including [10+ Commando]
+[ Police Personnel ]
3. Z : Security cover of 22 Personal.
Including [4 or 5 NSG Commando]
+[ Police Personnel ]
4. Y : Security cover of 11 Personal.
Including [1 or 2 Commando]
+[ Police Personnel ]
5. X : Security cover of 5 or 2 Personal.
[ NO Commando ]
[Only Armed Police Personnel ]
(source: wikipedia)
रविवार, 24 सितंबर 2017
काम उर्जा का उर्ध्वगमन हो, दमन नहीं
विगत कुछ वर्षों से जितने भी फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे गए हैं उनमें से अधिकाँश पर यौन शोषण के आरोप हैं। धर्म-जगत् से जुड़े व्यक्तियों पर यौन शोषण व बलात्कार जैसे आरोप यह सिद्ध करते हैं कि हमने ब्रह्मचर्य की गलत परिभाषा गढ़ रखी है। हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मचर्य से आशय काम-शक्ति के उर्ध्वगमन से है, ना कि काम-शक्ति के दमन से। ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते समय अधिकाँश तथाकथित धर्मोपदेशक काम उर्जा के दमन की सीख देते नज़र आते हैं। हमें यह समझना होगा कि काम एक उर्जा है जिसका किसी भी परिस्थिति में दमन नहीं किया जा सकता। इस उर्जा के सदुपयोग का एकमात्र उपाय इसका सम्यक् रूपान्तरण ही है। काम उर्जा का केवल उर्ध्वगमन ही किया जा सकता है अन्यथा उसका बहिर्गमन सुनिश्चित है, जो स्वाभाविक है। किन्तु जब हम इस उर्जा के स्वाभाविक बहिर्गमन को रोक कर इसका दमन करते हैं तब यह उर्जा विकृत होती है और एक दिन इस दमित उर्जा का विस्फ़ोट हो जाता है। काम उर्जा का यह विस्फ़ोट सामाजिक अराजकता का मुख्य कारण है। वर्तमान समय में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। इसके पीछे वैसे तो कई कारण है लेकिन सबसे अहम् कारण यौन शिक्षा का अभाव एवं काम उर्जा का दमन है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि हम अमर्यादित काम उर्जा के निर्गमन को मान्यता दें, नहीं; कदापि नहीं। वर्तमान समय में तो काम उर्जा के रूपान्तरण एवं उर्ध्वगमन की महती आवश्यकता है क्योंकि आज आध्यात्मिक जगत् भी इस दमित काम उर्जा के विस्फोट के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष असर हमारे सनातन धर्म पर पड़ रहा है। आज कुछ अपराधियों के कारण समूचे सन्त समाज व साधकों को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। धर्म-जगत् से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों के आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त होने के कारण आज धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं में श्रद्धा एवं विश्वास कम हो रहा है। यदि समय रहते धर्म-जगत् का यह प्रदूषण समाप्त नहीं किया गया तो भविष्य में इसके दुष्प्रभावों को रोकना असम्भव हो जाएगा। आज आवश्यकता है ऐसे सन्तों की जो एक देशना की भान्ति समाज के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर सकें। जिनका समूचा जीवन ही एक उपदेश हो। जो ध्यान-धारणा-समाधि से सुपरिचित हों और अपने अनुयायियों व साधकों को भी इन साधनाओं में अग्रसर करने में सक्षम हों। वर्तमान समय में जब सूचना-क्रान्ति के चलते मोबाईल एवं इंटरनेट जैसे साधनों से सभी प्रकार की बातें सहज सुलभ हैं, ध्यान एवं भक्ति ही वे दो मार्ग हैं जिनसे अमर्यादित कामोपभोग जैसी दुष्प्रवृत्तियों से बचा जा सकता है। ध्यान और भक्ति के आधार पर ही हम इस प्रकृति-प्रदत्त काम उर्जा का सम्यक् उपयोग करने में सफल हो सकते हैं। अत: काम उर्जा का दमन नहीं वरन् उर्ध्वगमन करने का प्रयास करें।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
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| "किल्पर टाइम्स" रायपुर (छग) में प्रकाशित हमारा लेख |
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
अप्प दीपो भव:
लोग खुश हैं
कि एक फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे पहुँच गया। लेकिन जब तक हम धर्म के नाम पर रुढ़ और
अन्धभक्त बने रहेंगे तब ऐसे बाबा पैदा होते रहेंगे। दरअसल, हम धर्म और शास्त्रों के नाम पर इतने भीरू होते हैं कि हमें
इनका नाम लेकर कोई भी बरगला सकता है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो
सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक
होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक
व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष
हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। इस बात को सदैव स्मरण रखें कि आपके और परमात्मा के
बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। फ़िर आप कहेंगे कि गुरू का क्या महत्त्व? मेरे देखे गुरू का महत्त्व बस इतना ही है कि वह आपको यह समझा
दे कि आपके और आपके परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं, स्वयं उसकी भी नहीं। वास्तविक गुरू अपने शिष्य को हर अटकाव; हर बाधा से मुक्त करता है जो उसे परमात्मा तक पहुँचने में आती
है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं- "अप्प दीपो भव:।" जब ऐसे गुरू जीवन में होंगे
तभी बुद्धत्व घटित होगा अन्यथा बुद्धू तो लोग बन ही रहे हैं, धर्म के नाम पर।
-ज्योतिर्विद् पं.
हेमन्त रिछारिया
रविवार, 17 सितंबर 2017
एम्बुलेंस दादा : करीमुल-हक
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| राष्ट्रपति से पद्म श्री प्राप्त करते हुए करीमुल-हक |
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| एम्बुलेंस दादा की बाईक-एम्बुलेंस |
बुधवार, 6 सितंबर 2017
पहाड़-पुरूष
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| "माउण्टेनमेन" दशरथ माँझी |
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| दशरथ माँझी द्वारा निर्मित मार्ग |
शुक्रवार, 1 सितंबर 2017
एक सेनानी का संघर्ष
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| श्री गौर हरिदास जी अपनी धर्मपत्नि के साथ |
न्याय व सम्मान यदि उचित समय पर ना मिलें तो वे अपना मूल्य खो देते हैं। आज हमारे देश में ऐसे हज़ारों उदाहरण मौजूद हैं जिनमें देरी से मिले न्याय व सम्मान ने अपना मूल्य खो दिया। अपनी गौरवपूर्ण पहचान व सम्मान को प्राप्त करने के लिए किए ऐसे ही एक सँघर्ष का नाम है- स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी श्री गौर हरिदास। जिन्हें स्वयं को स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी साबित करने में तीस वर्ष से भी अधिक का समय लगा। श्री गौर हरिदास जी ने स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए सन् 1976 में आवेदन दिया था जो उन्हें हमारे आजाद देश की लचर व्यवस्थाओं के चलते 33 वर्षों बाद सन् 2009 में प्राप्त हुआ। 85 वर्षीय श्री गौर हरिदास पाँच वर्षों तक स्वतन्त्रता आन्दोलन का हिस्सा रहे थे। वानर सेना के सदस्य के रूप में वे छिपकर स्वतन्त्रता सँग्राम से सम्बन्धित साहित्य और सन्देशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे। सन् 1945 में उन्होंने अंग्रेज़ों के आदेश के ख़िलाफ़ भारत का झण्डा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े थे। ओडिशा में पैदा हुए श्री गौर हरिदास तेरह भाई-बहनों में दूसरी सन्तान थे। उनके पिता गाँधीवादी थे और अपने पिता से ही उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली। श्री गौर हरिदास जी ने 'ख़ादी ग्रामोद्योग आयोग' में लम्बे समय तक कार्य किया। श्री गौर हरिदास जी का सँघर्ष तब शुरू हुआ जब उन्हें अपने पुत्र को एक सँस्थान में प्रवेश दिलाने के लिए स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता महसूस हुई। स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र के लिए श्री गौर हरिदास जी ने आवेदन दिया जो उन्हें विभिन्न सरकारी कार्यालयों व मन्त्रालय के चक्कर लगाने के उपरान्त 33 वर्षों बाद प्राप्त हुआ। उनके बेटे को तो अपनी प्रतिभा के आधार पर उस सँस्थान में प्रवेश मिल गया लेकिन श्री गौर हरिदास जी का जीवन अपनी गौरवपूर्ण पहचान पाने के लिए एक लम्बे सँघर्ष में बदल गया। एक ऐसा सँघर्ष जिसमें ना कोई धरना-प्रदर्शन था; ना ही कोई नारा था; यदि था, तो बस श्री गौर हरिदास जी के हाथों में अपनी फ़ाईलों का एक बण्डल जिसे लेकर वह अत्यन्त शान्तिपूर्ण ढँग से एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक वर्षानुवर्ष भटकते रहे। सम्मान से कहीं अधिक यह स्वयं की पहचान की लड़ाई थी। वर्ष 2009 में स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के साथ श्री गौर हरिदास जी के सँघर्ष को तो विराम लग गया लेकिन इस सँघर्ष ने उनसे उनके जीवन के कई अनमोल पल छीन लिए जो उन्हें अब कभी प्राप्त नहीं होंगे।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक
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