रविवार, 9 अप्रैल 2017

सुरक्षाकर्मियों का अपमान करना निन्दनीय

अभी कुछ दिन पहले न्यूज़ चैनल पर एक ख़बर देखी फ़िर उसका वीडियो भी "वायरल" हो गया। इस वीडियो में म.प्र. के मुखिया अपने सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए "गेट-आउट" कहते नज़र आ रहे हैं। उन सुरक्षाकर्मियों का अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक बीजेपी कार्यकर्ता को सीएम के पास जाने रोका था जिस पर इस छुटभैये नेता ने वबाल मचा दिया और घटना का राजनीतिकरण करते हुए अपने आपको एक जाति विशेष का होने के कारण इस प्रकार का दुर्व्यवहार होने की बात कहकर हंगामा कर दिया जिस पर मुख्यमंत्री जी ने अपने ही सुरक्षाकर्मियों को डांटते हुए बाहर निकल जाने का निर्देश दे डाला। यह पूरी घटना मुझे आहत कर गई। आखिर ये राजनेता अपने वोट बैंक के लिए संवेदनाओं को किस प्रकार ताक पर रख दिया करते हैं यह इस बात का जीवन्त उदाहरण है। मेरे देखे किसी भी वीआईपी या वीवीआईपी की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही उन महत्त्वपूर्ण व अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा करना होता है। अपने इस कर्त्तव्य को निभाते हुए कभी-कभार किसी व्यक्ति के साथ थोड़ी धक्का-मुक्की हो जाती है लेकिन यह तभी होता है जब वह व्यक्ति अनाधिकार चेष्टा कर रहा होता है। सुरक्षाकर्मियों का कार्य एक बेहद दुष्कर कार्य है। ये सुरक्षाकर्मी अपनी घंटों की थका देने वाली ड्यूटी में शायद ही आपको कभी शान्ति से बैठे नज़र आते हों। सदैव तत्परता के साथ खड़े रहना; हमेशा चौकस रहना; स्वयं जनसमूह के धक्के खाकर अपने नेता को आरामदायक व सुरक्षित स्थिति-परिस्थिति प्रदान करते ये सुरक्षाकर्मी धन्यवाद के पात्र होते हैं इस प्रकार अपमान के नहीं, खासकर वह भी तब; जब वे अपना कर्त्तव्य पूरी मुस्तैदी से निभा रहे हों। यदि ये सुरक्षाकर्मी किसी गरीब व असहाय व्यक्ति को जो अपनी समस्या से सीएम को अवगत कराना चाहता हो, धकेल कर दूर करते और सीएम साहब इन पर भड़कते तो शायद हमें इतना दु:ख ना भी होता किन्तु केवल अपनी पार्टी एक कार्यकर्ता को दूर करने पर सीएम का इस प्रकार अपने सुरक्षाकर्मियों का सार्वजनिक रूप से अपमान करना बेहद निन्दनीय है। यदि इस प्रकार ये सुरक्षाकर्मी पार्टी कार्यकर्ताओं व भीड़ की सुविधा के अनुसार कार्य करने लगें और कोई दुर्घटना हो जाए तब भी सारा दोष इन्हीं सुरक्षाकर्मियों को दिया जाएगा, शायद इन्हें तत्काल प्रभाव से निलम्बित या बर्खास्त भी कर दिया जाए। यहां मुझे पूर्व राष्ट्रपति स्व. श्री ए पी जे अब्दुल कलाम साहब का स्मरण आ रहा है जिन्होंने अपनी सुरक्षा में लगे एक सुरक्षाकर्मी को देर तक खड़े देखकर अपने निज सहायक को कहा था कि "वह कब तक खड़ा रहेगा उसे बैठने को कहो" और जब वह सुरक्षाकर्मी नहीं माना तब गंतव्य पर पहुंचकर सबसे पहले कलाम साहब ने अपने उस सुरक्षाकर्मी को अपने कमरे में बुलाकर उसे "धन्यवाद" कहा और पूछ-"मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं।" क्या कलाम साहब के अतिरिक्त कभी आपने ऐसा वाकया सुना है; क्या कभी किसी भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति ने अपनी सुरक्षा में लगे इन सुरक्षाकर्मियों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की है, या उन्हें धन्यवाद कहा है? हां वोट बैंक के लिए सार्वजनिक रूप उनके अपमान कि किस्से अवश्य सुनाई दे जाते हैं। जिस कार्यकर्ता के तथाकथित दुर्व्यवहार को लेकर सीएम अपने सुरक्षाकर्मियों पर इतने नाराज़ हो गए क्या उस कार्यकर्ता को अपने नेता की सुरक्षा का अन्दाज़ा नहीं था, क्या उसे उनकी सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों का कार्य पता नहीं था? फ़िर क्यों उस कार्यकर्ता ने अनाधिकार चेष्टा की क्योंकि यदि वह सीएम साहब का इतना खा़स होता तो वे स्वयं उसे देखते ही अपने पास बुला लेते! किन्तु इस प्रकार सीएम या मन्त्री के पास जाकर सेल्फ़ी लेना और फ़ोटो खिंचाना इन छुटभैए नेताओं की आदत में शुमार होता है फ़िर इसी के आधार पर वे स्थानीय अधिकारियों पर यदा-कदा धौंस जमाते नज़र आते है। हमारे सुरक्षाप्राप्त नेताओं को ये सदैव स्मरण होना चाहिए कि सुरक्षाकर्मियों का कार्य ही आपकी सब प्रकार से सुरक्षा करना होता है जिसमें भीड़ से सुरक्षा भी शामिल है। यदि इन नेताओं को जनता से मेल-मिलाप इतना प्रीतिकर है तो फ़िर सुरक्षा लेते ही क्यों है? वहां तो स्टेटस सिम्बल व प्रतिष्ठा आड़े आ जाती है। ज़रा किसी नेता की सुरक्षा की समीक्षा या उनकी सुरक्षा में कटौती की बात क्या होती है, उस नेता के द्वारा हंगामा बरपा दिया जाता है। इस प्रकार  "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और" वाली कहावत चरितार्थ कर आप जनता को अधिक देर तक मूर्ख़ नहीं बना सकते क्योंकि वास्तविकता कभी न कभी सामने आ ही जाती है। मैं म.प्र. के मुख्यमन्त्री के द्वारा अपने सुरक्षाकर्मियों के सार्वजनिक रूप से अपमान की इस घटना की कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

खूबसूरती


सूखे पेड़ की भी अपनी खूबसूरती होती है। आज दोपहर जैसे ही एक सूखे पेड़ पर निगाह पड़ी तो पाया कि सूखा पेड़ भी कितना सुन्दर हो सकता है। खूबसूरती फ़ूलों की मोहताज नहीं, ये आज समझ आया। ऐसे नए-नए सबक सिखाने के लिए ज़िंन्दगी तेरा शुक्रिया।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

"सन्देह" श्रद्धा की पहली सीढ़ी है-

मेरे देखे अज्ञान मनुष्य को उतना नहीं भटकाता जितना उधार ज्ञान भटका देता है। आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है जिसमें एक युवती एक तथाकथित कथावाचक से कुछ सार्थक प्रश्न करती नज़र आ रही है और वे तथाकथित कथावाचक उसके प्रश्नों के सटीक उत्तर देने के स्थान पर "लकीर के फ़कीर" वाली कहावत चरितार्थ करते प्रतीत हो रहे हैं। इस वीडियो को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह कान्वेंट में अपने बच्चों को पढ़ाने का परिणाम है। हम इस वीडियो को इस ढंग से प्रचारित करने से कतई सहमत नहीं हैं। आज एक युवती के सार्थक प्रश्न पर एक तथाकथित कथावाचक की पोल खुल गई। इस युवती के प्रश्न का सही उत्तर देने के स्थान पर प्राचीन रुढ़ियों की आड़ लेकर अपने अज्ञान का प्रदर्शन कर इस कथावाचक ने समाज को जिस प्रकार दिग्भ्रमित किया वह घोर निन्दनीय है। ये तथाकथित कथावाचक भागवत कथा करने के लिए लाखों रु. दक्षिणा के रुप में लेते हैं और रुकने के लिए इन्हें "एसी कमरा" आवश्यक होता है। ये शुभ है कि आज इस युवती ने एक स्वस्थ परम्परा की शुरुआत की। मेरी समझ नहीं आता हम प्रश्नों से इतना भागते क्यों हैं? प्रश्नों का तो समाधान होना चाहिए, सन्देह श्रद्धा की पहली सीढ़ी है चाहे वह जगज्जननी पार्वती का हो या युगपुरुष विवेकानन्द का। लेकिन हमारे ये उधार ज्ञान के धनी पोंगा पण्डितजन सिर्फ़ एकालाप जानते हैं, संवाद नहीं इसलिए आज का समाव व युवा धर्म से विमुख हैं क्योंकि उसके सन्देहों का उचित समाधान नहीं होता अपितु उसे सन्देह के स्थान पर धर्म के नाम पर मौन रहना सिखाया जाता है। मेरे देखे इन कथावाचकों की भी क्या गलती? इन्हें खुद ही प्रश्नों के उत्तर नहीं पता तो ये समाज व जनमानस को क्या उत्तर देंगे। ये तो तोतारंटत जानते हैं, श्रद्दालुओं को नचाना जानते हैं। यदि इन्हें प्रश्नों के उत्तर पता होते तो आज इस समाज का स्वरूप कुछ और ही होता। शुभ है कि परम्परा की शुरुआत तो हुई। मैं चाहता हूं जनता ऐसे पोंगा पण्डितों से खूब प्रश्न करे ताकि इनकी वास्तविकता समाज के सामने आ सके। जो खरे स्वर्ण की भांति हैं वे और उजले होकर निखर जाएंगे और जो खार हैं वे  जल कर नष्ट हो जाएंगे, मेरे देखे खार का जल जाना श्रेयस्कर ही है।
राधे-राधे!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

बुधवार, 22 मार्च 2017

"दीप" के दोहे

कहाँ प्रीत की माधुरी, कहाँ नेह की गँध।
मुँह देखे की बतकही सुविधा के सम्बन्ध॥

आ हिलमिलकर बाँट लें आज मिलें जो फ़ूल।
मौसम का विश्वास क्या फ़िर कब हो अनुकूल॥

मित्र दु:खों की पोटली इधर-उधर मत खोल।
भूल गये हैं लोग अब हमदर्दी के बोल॥

जो तू हमसे रुठता कर लेते मनुहार।
तू खुद से नाराज़ है कौन मनाये यार॥

जीवन पथ पर मिल गया इक दिन दुष्ट यथार्थ।
सपनों की सब थैलियाँ सौंपी उसके हाथ॥

अतिथि सरीखे के आ गए दुर्दिन के अक्रूर।
सुख के श्याम चले गए सखे बहुत ही दूर॥

सबको इक सी चाँदनी सबको इक सी धूप।
देना मेरे रामजी भिक्षुक हो या भूप॥

सपने आकर कह गए तुम जाने क्या बात।
सुधियों की बारादरी महकी सारी रात॥

महकी-महकी नींद में बहके-बहके ख़्वाब।
तकिये के नीचे रखे किसने खिले गुलाब॥

बस्ती-बस्ती वेदना, डगर-डगर थी पीर।
सागर जैसी प्यास थी, चुल्लू भर था नीर॥

भाभी मिसरी की डली भैया खुली किताब।
आँगन में नित नेह के खिलते रहे गुलाब॥

कवि-प्रदीप दुबे "दुबे"


शुक्रवार, 10 मार्च 2017

होली के दोहे



इन्द्र-जाल चहुँ फाग का, रंगों की रस-धार।
हुई राधिका साँवरी, और कृष्ण रतनार।।

फागुन ने तहजीब पर, तानी जब संगीन।
बरजोरी कर सादगी, हुई स्वयँ रंगीन।।

क्या धरती? आकाश तक, है होली के संग।
चहरे-चहरे पर टँके, इंद्र-धनुष के रंग।।
-अखिलेश तिवारी

*****

गोरे गोरे अंग पै, चटख चढि गये रंग।
रंगीले आँचर उडैं, जैसें नवल पतंग ।।

लाल हरे पीले रँगे, रँगे अंग-प्रत्यंग।
कज़्ज़ल-गिरि सी कामिनी, चढौ न कोऊ रंग।।

भरि पिचकारी सखी पर, वे रँग-बान चलायँ।
लौटें नैनन बान भय, स्वयं सखा रँगि जायँ।।

भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय।
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रँगि जाय।।

भक्ति ग्यान औ प्रेम की, मन में उठै तरंग।
कर्म भरी पिचकारि ते, रस भीजै अंग-अंग।।

ऐसी होली खेलिये, जरै त्रिविधि संताप।
परमानन्द प्रतीति हो, ह्रदय बसें प्रभु आप ।।
-डा. श्याम गुप्त

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होली पर साजन दिखे, छूटा मन का धीर।
गोरी के मन-आँगने, उड़ने लगा अबीर ।।

होली अब के बार की, ऐसी कर दे राम।
गलबहिंया डाले मिलें, ग़ालिब अरु घनश्याम ।।


मनसा-वाचा-कर्मणा, भूल गए सब रीत।
होली के संतूर से, गूँजे ऐसे गीत ।।

इक तो वो मादक बदन, दूजे ये बौछार।
क्यों ना चलता साल भर, होली का त्यौहार ।।

थोड़ी-थोड़ी मस्तियाँ, थोड़ा मान-गुमान।
होली पर 'साहिल' मियाँ, रखना मन का ध्यान ।।
-लोकेश ‘साहिल

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होली में जलता जिया, बालम हैं परदेश।
मोबाइल स्विच-ऑफ है, कैसे दूँ संदेश।।


भोर हुई कब की, मगर, बोल रहा ना काग।
बिन सजना इस बार भी, 'फाग' लगेगा 'नाग'।।


कभी कभी हत्थे चढ़ें, माधव कृष्ण मुरारि।
फिर काहे को छोड़ दें, उन को ब्रज की नारि।।
-वंदना गुप्ता

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किस से होली खेलिए, मलिए किसे गुलाल।
चेहरे थे कुछ चाँद से डूब गए इस साल ।।

नेताओं ने पी रखी, जाने कैसी भंग।
मुश्किल है पहचानना, सब चेहरे बदरंग ।।

योगी तो भोगी हुए, संसारी सब संत।
जिनकी कुटियों में रहे, पूरे बरस बसंत ।।

कैसी थीं वो होलियाँ, कैसे थे अहसास।
ज़ख़्मी है अब आस्था, टूट गए विशवास।।
-(साभार)

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नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।
ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर।।
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बरसाने की लाठियाँ, खाते हैं बड़भाग।
जो पावैं सौगात ये, तन मन बागो बाग़।।
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तन मन पे यूँ छा गई, होली की तासीर।
राँझे को रँगने चली, ले पिचकारी हीर।।
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होली के हुडदंग में, योगी राज उवाच।
पटिआले की भांग ने,फेल करी इस्काच।।

रंग लगावें सालियाँ, बापू भयो जवान।
हुड़ हुड़ हुड़ करता फिरे, बन दबंग सलमान।।
-योगराज प्रभाकर

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निरखत बासंती छटा, फागुन हुआ निहाल।
इतराता सा वह चला, लेकर रंग गुलाल।।

कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर।
वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर।।

टेसू पर उसने किया, बंकिम दृष्टि निपात।
लाल लाज से हो गया, वसन हीन था गात।।

अमराई की छाँव में, फागुन छेड़े गीत।
बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत।।

फागुन और बसंत मिल, करें हास-परिहास।
उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास।।
-महेन्द्र वर्मा

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सब चेहरे हैं एक से हुई पृथकता दंग।
लोकतंत्र में घुल गया साम्यवाद का रंग।।

रंग - भंग - हुड़दंग का, समवेती आहंग।
वातायन ढोलक हुआ, मन बन गया मृदंग।।

आज अबीर-गुलाल में, हुई मनोरम जंग।
इन्द्रधनुष सा हो गया, युद्धक्षेत्र का रंग।।
-मयंक अवस्थी

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फागुन में नीके लगें, छींटे औ' बौछार।
सुन्दर, सुखद-ललाम है, होली का त्यौहार।।

शीत विदा होने लगा, चली बसन्त बयार।
प्यार बाँटने आ गया, होली का त्यौहार।।

पाना चाहो मान तो, करो मधुर व्यवहार।
सीख सिखाता है यही, होली का त्यौहार।।

रंगों के इस पर्व का, यह ही है उपहार।
भेद-भाव को मेंटता, होली का त्यौहार।।

तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।
लाया नव-उल्लास को, होली का त्यौहार।।

भंग न डालो रंग में, वृथा न ठानो रार।
देता है सन्देश यह, होली का त्यौहार।।

छोटी-मोटी बात पर, मत करना तकरार।
हँसी-ठिठोली से भरा, होली का त्यौहार।।

सरस्वती माँ की रहे, सब पर कृपा अपार।
हास्य-व्यंग्य अनुरक्त हो, होली का त्यौहार।।
-रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

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फगुनाहट की थाप पर,बजा फाग का राग।
पिचकारी की धार पर, मच गइ भागम भाग।।

कुंज गली में जा छुपे, नटखट मदन गुपाल।
ब्रजबाला बच के चली, फिर भी हो गइ लाल।।

मने प्रीत का पर्व ये, सद्‌भावों के साथ।
दो ऐसा सन्देश अब, तने गर्व से माथ।।
-ऋता शेखर ‘मधु’

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रंगों के सँग घोलकर, कुछ, टूटे-संवाद।
ऐसी होली खेलिए, बरसों आए याद।।

जाकर यूँ सब से मिलो, जैसे मिलते रंग।
केवल प्रियजन ही नहीं, दुश्मन भी हों दंग।।

तुमरे टच से, गाल ये, लाल हुये, सरताज।
बोलो तो रँग दूँ तुम्हें, इसी रंग से आज।।

सूखे रंगों से करो, सतरंगी संसार।
पानी की हर बूँद को, रखो सुरक्षित यार।।
-धर्मेन्द्र कुमार ‘सज्जन’

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लगा गयी हर डाल पर, रुत बसंत की आग।
उड़ा धूल की आंधियां, हवा खेलती फाग।।

टल पाया ना इस बरस, सलहज का इसरार।
कुगत कराने को स्वयँ, पहुँचे सासू द्वार।।

जम कर होली खेलिए, बिछा रंग की सेज।
जात धरम ना रंग का, फिर किसलिए गुरेज।।

पल भर हजरत भूल कर, दुःख,पीड़ा,संताप।
जरा नोश फरमाइए, नशा ख़ुशी का आप।।
-सौरभ शेखर

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अबके कुछ ऐसा करो, होली पर भगवान।
हर भूखे के थाल में, भर दो सब पकवान।।

हिरण्यकश्यप मार कर, करी धर्म की जीत।
हे नरसिँह कब आउगे, जनता है भयभीत।।

खुशियों का त्यौहार है, खुल कर खेलो फाग।
बैर, दुश्मनी, द्वेष का, दिल से कर दो त्याग।।
-साधना वैद

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गहरे रंगों से रँगी, भीगा सारा अंग।
एक रंग ऐसा लगा, छोड़ न पाई संग।।

विजया सर चढ़ बोलती, तन मन हुआ अनंग।
चंग संग थिरके क़दम, उठने लगी तरंग।।
-आशा सक्सेना

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बच्चे, बूढ़े, नौजवाँ, गाएं मिलकर फाग।
एक ताल, सुर एक हो, एकहि सबका राग।।

सेन्दुर, टिकुली, आलता, कब से हुए अधीर।
प्रिय आयें तो फाग में, फिर से उड़े अबीर।।

महँगाई ने सोख ली, पिचकारी की धार।
गुझिया मुँह बिचका रही, फीका है त्यौहार।।

अबके होली में बने, कुछ ऐसी सरकार।
छोटा जिसका पेट हो, छोटी रहे डकार।।

मिली नहीं छुट्टी अगर, मत हो यार उदास।
यारों सँग होली मना, यार बड़े हैं खास।।
-राणा प्रताप सिंह

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फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप।
भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप।।

फगुनाई ऐसी चढ़ी, टेसू धारें आग।
दोहे तक तउआ रहे, छेड़ें मन में फाग।।

भइ! फागुन में उम्र भी, करती जोरमजोर।
फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर।।

जबसे सिंचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।
मन में फागुन झूमता, चैताती है देह।।

बोल हुए मनुहार से, जड़वत मन तस्वीर।
मुग्धा होली खेलती, गुद-गुद हुआ अबीर।।

धूप खिली, छत, खेलती, अल्हड़ खोले केश।
इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष।।

करता नंग अनंग है, खुल्लमखुल्ले भाव।
होश रहे तो नागरी,  जोशीले को ताव ।।

हम तो भाई देस के,  जिसके माने गाँव ।
गलियाँ घर-घर जी रहीं - फगुआ, कुश्ती-दाँव।।

नये रंग, सुषमा नई, सरसे फाग बहाव ।
लाँघन आतुर, देहरी, उत्सुक के मृदु-भाव।।
-सौरभ पाण्डेय

*****

इंतज़ार  के  रंग  में, गई  बावरी   डूब।
होली पर इस बार भी, आये ना महबूब।।

सरहद से  आया नहीं,  होली  पे  क्यूँ  लाल।
भीगी  आँखें  रंग से,  करती  रहीं सवाल।।

मौक़ा था पर यार ने, डाला नहीं गुलाल।
मुरझाये से  ही  रहे,  मेरे  दोनों  गाल।।

कौन बजावे फाग पे,  ढोल, नगाड़े, चंग।
कहाँ किसी को चाव है, गायब हुई उमंग।।

गीली - गीली आँख से, करे शिकायत गाल।
बैरी ख़ुद आया नहीं, भिजवा दिया गुलाल।।
-विजेंद्र शर्मा

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’हो ली’, ’हो ली’ सब करें, मरम न जाने कोय।
क्या हो ली क्या ना हुई, मैं समझाऊँ तोय।।

हो ली पूजा हस्ति की, माया जी के राज।
हाथी पे परदे पड़े, बिगड़ गए सब काज।।

हो ली लूट-खसूट बहु, राजा के दरबार।
पहुँचे जेल तिहाड़ में, जुगत भई बेकार।।

हो ली बहु बिध भर्त्सना, हे चिद्दू म्हाराज।
नहीं नकारो सत्य को, अब तो आओ बाज।।

हो ली अन्ना की 'ख़लिश', जग में जय जयकार।
शायद उनको हो रही, अब गलती स्वीकार।।
-महेश चंद्र गुप्ता ‘ख़लिश’

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होली होली हो रही, होगी बारम्बार।
होली हो अबकी बरस, जीवन का श्रृंगार।।

होली में हुरिया रहे, खीसें रहे निपोर।
गौरी-गौरा एक रंग, थामे जीवन डोर।।

होली अवध किशोर की, बिना सिया है सून।
जन प्रतिनिधि की चूक से, आशाओं का खून।।

होली में बृजराज को, राधा आयीं याद।
कहें रुक्मिणी से -'नहीं, अब गुझियों में स्वाद'।।

होली में कैसे डले, गुप्त चित्र पर रंग।
चित्रगुप्त की चातुरी, देख रहे सबरंग।।

होली पर हर रंग का, 'उतर गया है रंग'।
जामवंत पर पड़ हुए, सभी रंग बदरंग।।

होली में हनुमान को, कहें रँगेगा कौन।
लाल-लाल मुँह देखकर, सभी रह गए मौन।।

होली में गणपति हुए, भाँग चढ़ाकर मस्त।
डाल रहे रँग सूंढ से, रिद्धि-सिद्धि हैं त्रस्त।।

होली में श्री हरि धरे, दिव्य मोहिनी रूप।
कलशा ले ठंडाइ का, भागे दूर अनूप।।

होली में निर्द्वंद हैं, काली जी सब दूर।
जिससे होली मिलें, हो, वह चेहरा बेनूर।।

होली मिलने चल पड़े, जब नरसिंह भगवान्।
ठाले बैठे  मुसीबत, गले पड़े श्रीमान।।
-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

रविवार, 5 मार्च 2017

"कही जाए सो व्यथा, बही जाए सो कथा"

आज जब भी समाचार पत्र देखते हैं उसमें कहीं ना कहीं भागवत कथा या रामकथा का समाचार अवश्य होता है। उसी ख़बर के आसपास कुछ ऐसी घटनाओं के समाचार भी होते हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि हमारा समाज शीघ्रता से अनैतिकता की ओर अग्रसर हो रहा है। समाज में अनैतिकता को यदि रोग की संज्ञा दी जाए और इन कथाओं व उपदेशों को औषधि की तो निष्कर्ष यह निकलता है कि औषधि यदि कारगर है तो रोग नष्ट होना चाहिए। यदि रोग नष्ट होने के स्थान पर बढ़ रहा है तो औषधि ठीक नहीं है। मेरे देखे आज के अधिकांश कथावाचक अभिनेता हैं; साधक नहीं। अभिनेता होना एक बात है, साधक होना बिल्कुल दूसरी बात। कथा समय के ३ घण्टे अभिनय को कथा के अनुरूप साधा जा सकता है किन्तु सम्पूर्ण जीवन को कथाओं के बताए अनुसार परिवर्तित कर लेना बड़ी साधना है। आजकल के अधिकतर सदगुरू लोगों को जगाते कम; सुलाते अधिक हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण है पहले तो वे खुद ही सोए हुए हैं क्योंकि जो स्वयं ही सोया है वह किसी और क्या जगाएगा और दूसरा जिस दिन उन्होंने लोगों को जगाना प्रारम्भ कर दिया उसी दिन से उनका विरोध होना शुरू हो जाएगा क्योंकि शारीरिक नींद ही इतनी मीठी और गहरी होती है तो चित्त की निद्रा की तो बात ही क्या, जब उसे तोड़ा जाता है तो बहुत कष्ट होता है इसीलिए उस निद्रा को तोड़ने वाले का विरोध होना स्वाभाविक है। विरले ही इस प्रकार की साधना में प्रवृत्त हो पाते हैं। जिस प्रकार यदि हम किसी पात्र को किसी वस्तु से भरते जाएं और जब वह पात्र पूर्णरूपेण भर जाए तब क्या होगा! वह वस्तु उस पात्र के ऊपर से बहने या झलकने लगेगी। ठीक उसी प्रकार जब हम अपने अन्त:करण को परमात्मतत्व रूपी गुण से भरते जाते हैं और हमारा यह अन्तर्घट जब पूर्ण हो जाता है तब जो झलकने लगता है वही सच्चा उपदेश व सही कथा है। मेरे देखे जो सप्रयास कही जाए वह व्यथा, जो अनायास बही जाए वह कथा है। जब साधक की वाणी निमित्त मात्र बनकर उपकरण का कार्य करती है तब मुख से जो निकलता है वह दिव्य होता है क्योंकि वह अलौकिक होता है। तब वह किसी और तल का; किसी और जगत का होता है, साधक तो केवल एक निमित्त और उपकरण मात्र होता है। जिस दिन इस प्रकार कथाएं व उपदेश कहे जाएंगे उसी दिन से समाज परिवर्तित होना प्रारम्भ हो जाएगा। !! राधे...राधे....!!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

बुधवार, 1 मार्च 2017

"प्रधानमन्त्री" या "स्टार प्रचारक"...!

आज कोई भी न्यूज़ चैनल देखिए आपको किसी ना किसी चैनल पर हमारे प्रधानमन्त्री जनसभा को सम्बोधित करते हुए मिल जाएंगे। मेरे देखे प्रधानमन्त्री को वाचाल नहीं होना चाहिए। प्रधानमन्त्री पद की एक गरिमा होती है। यदि देश का प्रधानमन्त्री इस प्रकार पार्टी का स्टार प्रचारक मात्र बनकर रह जाएगा तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा। प्रधानमन्त्री देश का होता है पार्टी का नहीं, उसे उस पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। यह कोई आम चुनाव नहीं हैं, यह राज्यों के चुनाव हैं इनमें यदि प्रधानमन्त्री इस प्रकार प्रचार कर रहें हैं तो यह चिन्ता का विषय है। क्या राज्य में बीजेपी का कोई बड़ा नेता या प्रदेश संगठन का कोई ऐसा नेता नहीं है जो इन चुनावों की कमान संभाल सके? प्रधानमन्त्री की जनसभाएं बड़ी सीमित और गरिमामय होनी चाहिए क्योंकि जब इस प्रकार अत्यधिक सभाएं व भाषण होते हैं तो वाणी का स्तर स्वयमेव ही गिर जाता है। हमारे प्रधानमन्त्री ने राज्यों में इस प्रकार अत्यधिक प्रचार करके वहां के मुख्यमन्त्री पद के उम्मीदवारों का कद अनजाने में ही बड़ा कर दिया। आप महसूस कर रहे होंगे कि इन दिनों बीजेपी मोदीमय हो चुकी है। एक पुरानी कहावत के परिप्रेक्ष्य में कहें तो "ना ख़ाता ना बही, जो मोदी कहें वही सही"। बीजेपी में मोदी ने अपना कद इतना बढ़ा लिया है कि कोई दूसरा नेता जन्मने ही नहीं पा रहा। शायद मोदी स्वयं इस बात से अनजान हैं कि उनका यह कार्य संघ की विचारधारा के विपरीत है। आज नहीं तो कल बीजेपी को उनके इस बढ़े कद का खामियाज़ा भुगतना ही पड़ेगा।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया