रविवार, 15 जनवरी 2017

अच्छा स्वयंसेवक कौन..?

"एक अच्छा स्वयंसेवक वह नहीं है, जिनके बिना संघकार्य चल नहीं सकता। एक अच्छा स्वयंसेवक तो वह है जो अपने जैसे अन्य अच्छे स्वयंसेवकों का निर्माण करता है। जिनसे उसके अभाव में भी संघकार्य चलाया जा सकता है। अच्छा स्वयंसेवक वह नहीं है, जिसने स्वयं को ही मुख्य बिन्दु बना लिया है, अपितु वह है जो इस केन्द्र-बिन्दु को विकीर्ण कर सकता है।"
-प.पू. स्व. डा. हेडगेवार
(संस्थापक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)

रविवार, 8 जनवरी 2017

"ब्राह्मण समाज" में घुसपैठ

अभी-अभी समाचार पत्र देखा। उसमें दो समाचारों पर दृष्टि ठिठक सी गई। एक ओर सर्वब्राह्मण समाज के सम्मेलन की खबर है वहीं दूसरी ओर "गौड़ मालवीय ब्राह्मण समाज" के संगठन की ख़बर है। शनै: शनै: ये सारे विजातीय "ब्राह्मण समाज" में घुसपैठ कर लेंगे और हमारे तथाकथित ब्राह्मण समाज के हितैषीगण बड़े-बड़े फ्लैक्स में अपनी तस्वीर छपवाते रह जाएंगे। मैं हमेशा से इस बात को पुरज़ोर से उठाता रहा हूं कि अभी भी समय है जब इस प्रकार के कुप्रयास का विरोध होना चाहिए एवं इस पर रोक लगनी चाहिए। जिन श्री मदनमोहन मालवीय का नाम लेकर ये विजातीय अपने आप को ब्राह्मण साबित करने में लगे हैं उनके इतिहास के बारे में ये लोग स्वयं ही नहीं जानते कि वे कोई लकड़ी इत्यादि का कार्य करने वाले सुतार या बढ़ई नहीं थे, अपितु ब्राह्मण थे। उनका पूरा नाम पं. मदनमोहन चतुर्वेदी था। उनके पिता पं.  बृजनाथ चतुर्वेदी सुप्रसिद्ध कथावाचक थे। उज्जैन (मालवा प्रान्त) के होने के कारण वे अपने नाम के साथ "मालवीय" जोड़ने लगे थे। मेरा आशय किसी समाज को निम्नतर साबित करना नहीं है मुझे तो आश्चर्य यह है कि ये समाज स्वयं को ब्राह्मणों से निम्न क्यों समझ रहा है जो इस प्रकार के हास्यास्पद कार्य कर रहा है। मेरे देखे सभी समाज समान है एवं सभी का सम्मान है। मात्र सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से यह विभाजन है शेष सभी समान है। बहरहाल, यदि इन लोगों में इतनी बुद्धिमत्ता होती तो यह जन्म से ब्राह्मण समाज का अंग ना होते। मेरी चिन्ता इन तथाकथित ब्राह्मण हितैषियों से हैं जो ब्राह्मण संगठनों के नाम पर अपना नाम चमकाने में लगे रहते हैं और ब्राह्मण समाज की मुख्य समस्याओं की ओर पीठ करे रहते हैं। कल जब यह विजातीय ब्राह्मण समाज में स्थापित हो जाएंगे तब ये तथाकथित हितैषीगण ठीक वैसे ही शोर मचाएंगे और हाथ-पैर पटकेंगे जैसे कुछ समय पूर्व साईं बाबा की पूजा को लेकर शंकराचार्य ने छाती पीटी थी। ये घोर आश्चर्यजनक है कि किसी गलत परम्परा का विरोध उसके प्रारम्भ में ही क्यों नहीं किया जाता उसके स्थापित होने की राह क्यों देखी जाती है। यदि महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ती का साधन मात्र समझे जाने वाले हमारे संगठन एवं अति-महत्त्वाकांक्षी संगठनकर्ता रहेंगे तो समाज में इन विकृतियों का आना तो स्वाभाविक व अवश्यंभावी है। समाज का भविष्य आप स्वयं सोच सकते हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

संगठनों के माध्यम से अहं तुष्टि का प्रयास निन्दनीय

मित्रों, अक्सर आपने कई संगठनों के बारें सुना होगा, कितने संगठनों में आपमें से कई मित्र रहे भी होंगे। संगठन के नाम पर जो सबसे प्रचलित संगठन है वह है राजनीतिक संगठन। इस संगठन का कार्य यूं तो समाजसेवा बताया जाता है कि किन्तु इसमें विशुद्ध रूप राजनीति और सत्ता का खेल चलता है। अत: इस संगठन के सम्बन्ध में शुचिता व नैतिकता की बात करना व्यर्थ है। किन्तु आजकल कई सामाजिक संगठन भी इसी तर्ज़ पर गठित होने लगे हैं। "सर्वब्राह्मण समाज" एक ऐसा ही नाम है जिसका आधार लेकर ना जाने कितने संगठन कितनी बार गठित हुए और अन्त में विघटित भी हुए कारण सिर्फ़ एक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा व राजनीति। इन दिनों भी ऐसा एक संगठन सक्रिय है जो एक बड़ा सम्मेलन करने भी जा रहा है। अब इसके आयोजकों की बुद्धिमत्ता देखिए वे चले तो हैं सर्वब्राह्मण के नाम पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने और दिखावा कर रहे हैं ब्राह्मण समाज के हित व एकजुटता का। वास्तविक रूप में उन्हें वार्ड के ब्राह्मण परिवारों की संख्या तक ज्ञात नहीं है। केवल आयोजनों के नाम पर चन्दा ग्रहण के उद्देश्य से इन्हें ब्राह्मण समाज के हित याद आते हैं शेष समय नहीं। हकीकत यह है कि इस प्रकार के संगठन के नाम पर कुछ अति-महत्वाकांक्षी लोग अपने अहम की क्षुधा पूर्ती करने एवं अपने प्रतिस्पर्धियों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। एक सफल संगठन का निर्माण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक वृक्ष का, जिसमें बीज स्वयं को मिटाकर; अंधरों में खोकर वृक्ष, फूल व फल का निर्माण करता है। जब हम एक सुन्दर फूल देखतें है या स्वादिष्ट फल खाते हैं तो उसी की प्रशंसा करते हैं उस बीज को विस्मृत कर देते है; भूल जाते हैं जिसने अपने अस्तित्व को नष्ट कर इनके निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। यदि बीज अपने अस्तित्व को बचाकर अपने अहंकार को तुष्ट करने का प्रयास करता को आज एक भी वृक्ष हमें दिखाई नहीं देता। यही बात सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होती है जब तक उनके संस्थापकगण अपने अहंकार को तुष्ट करने एवं अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए संगठनों का निर्माण करते रहेंगे तब तक समाज में संगठनों प्रामाणिकता शून्य रहेगी और वे अल्पकाल के उपरान्त ही विखण्डित होकर समय की धारा से विलोपित हो जाएंगे। मैं इस प्रकार संगठनों के माध्यम से व्यक्तिगत अहं तुष्टि के प्रयासों की घोर निन्दा व भर्त्सना करता हूं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

पंचांग की त्रुटि -

हिन्दू नववर्ष आने वाला है। नववर्ष के आगमन के साथ ही पण्डित व ज्योतिषीगण नया पंचांग क्रय करते हैं। नवीन पंचांगों में सबसे ऊपर नए "संवत्सर" का नाम व संख्या प्रकाशित की जाती है। इस वर्ष "साधारण" (२०७४) नाम का संवत्सर प्रारम्भ होने जा रहा है। एक ज्योतिषी होने के नाते जब मैंने आज नवीन पंचांग क्रय किए तो "संवत्सर" का नाम देखते ही मुझे पिछले वर्ष की एक घटना याद आ गई जो "निर्णय सागर पंचांग" (नीमच, म.प्र.) से सम्बन्धित है। घटना कुछ इस प्रकार है कि मैंने प्रतिवर्षानुसार जब पिछले वर्ष हिन्दू नववर्ष के अवसर पर पंचांग क्रय किए तो देखा कि "निर्णय सागर पंचांग" में संवत्सर का नाम त्रुटिवश "सौम्य" के स्थान पर "साधारण" (यह आगामी संवत्सर का नाम है) छपा हुआ है जबकि अन्य सभी पंचांगों में तत्कालीन संवत्सर का नाम सही छपा हुआ था। मैंने "निर्णय सागर पंचांग" की इस त्रुटि की ओर ध्यानाकर्षण कराना अपना दायित्व समझते हुए उनके कार्यालय को पत्र लिखकर इस सम्बन्ध में सूचित किया। कुछ दिनों बाद मुझे "निर्णय सागर पंचांग" के कार्यालय से एक फोन आया। फोन करने वाले महानुभाव (जिनका नाम मुझे स्मरण नहीं है) ने अपने कुतर्कों के माध्यम से इस त्रुटि को सही ठहराने का असफ़ल प्रयास किया। मैंने उनके कुतर्कों से असहमत होते हुए बात समाप्त कर दी। आज जब मैंने नववर्ष हेतु नवीन पंचांग क्रय किए तो "निर्णय सागर पंचांग" में संवत्सर का नाम पुन: "साधारण" छपा हुआ पाया (जो कि इस वर्ष सही है)। शास्त्रों में संवत्सरों के नाम उनके क्रम के अनुसार दिए गए हैं, एक संवत्सर के बीतने के बाद दूसरा संवत्सर ठीक वैसे ही आता है जैसे अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार जनवरी के बाद फरवरी और हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार चैत्र के बाद वैशाख। उसी प्रकार "सौम्य" (२०७३) के बाद "साधारण" (२०७४) संवत्सर के आने का क्रम है और "साधारण" के बाद "विरोधकृत" (२०७५) नामक संवत्सर आएगा। यदि पिछले वर्ष "निर्णय सागर पंचांग" द्वारा प्रकाशित संवत्सर का नाम सही था जैसा कि उनके कार्यालय ने अपने कुतर्कों के आधार पर सिद्ध करने की कोशिश की थी तो इस वर्ष "निर्णय सागर" पंचांग में संवत्सर का नाम "विरोधकृत" प्रकाशित होना चाहिए था, किन्तु ऐसा नहीं है। इसका आशय यह है कि वे स्वयं भी यह जानते थे कि पिछले वर्ष के पंचांग में संवत्सर का नाम प्रकाशित करने में उनसे त्रुटि हुई है किन्तु उन्होंने हठधर्मिता के चलते अपनी इस त्रुटि को स्वीकार नहीं किया अपितु अपने कुतर्कों के माध्यम से इसे सही ठहराने का असफल प्रयास भी किया। इस प्रकार हठधर्मितापूर्वक अपनी त्रुटि को उचित ठहराए जाने के "निर्णय सागर पंचांग" कार्यालय के व्यवहार की मैं कड़ी निन्दा व भर्त्सना करता हूं। मेरे देखे त्रुटि करना करना मानवीय स्वभाव है किन्तु त्रुटि को स्वीकारना सज्जन का स्वभाव है लेकिन अपनी त्रुटि को सुधारना सन्त का स्वभाव है। अब ज़रा सोचिए जिन पंचांगों को आधार मानकर पण्डित व ज्योतिषीगण ग्रह-नक्षत्र आदि की गणना करते हैं आज के दौर में वे पंचांग कितने प्रामाणिक हैं!

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

"कुबेर" नहीं "अर्थपिशाच" कहिए

अभी-अभी एक न्यूज़ चैनल पर खबर देखी कि एक वकील का कालधन पकड़ाया। खबर के तथाकथित विद्वान सम्पादक ने खबर का शीर्षक किया "कालेधन के कुबेर"....ऐसी ही यदि कहीं कोई कुकृत्य करता पाया जाता है तो उस खबर का शीर्षक देते हैं....."रासलीला"। मुझे इस प्रकार के शीर्षकों से सख़्त आपत्ति है मैं इस प्रकार की शब्दावली की कड़ी निन्दा करता हूं। हिन्दू धर्म के सहिष्णु होने का यह तो अर्थ नहीं कि उनके आराध्य को चाहे जिसके साथ सम्बद्ध कर दें। हिन्दू धर्म में कुबेर खज़ाने अर्थात धन का अधिपति व रक्षक माना गया है। मैं इन ख़बरनबीसों से पूछना चाहता हूं क्या कुबेर के खजाने का धन कालाधन था? ऐसे ही क्या "रासलीला" कोई व्यभिचार कर्म था? यदि नहीं तो इस प्रकार के कुकृत्यों के साथ ऐसे पवित्र प्रतीकों को क्यों सम्बन्धित किया जाता है और कोई शंकराचार्य आवाज़ नहीं उठाता, कोई पंडित मौन नहीं तोड़ता। इस प्रकार के कालेधन के स्वामियों को नाम ही देना है तो इन्हें "अर्थपिशाच" कहिए कुबेर कहकर क्यों हिन्दू धर्म का अपमान करते हैं। मैं पुन: इस प्रकार की शब्दावली की घोर भर्त्सना करता हूं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

हम "कैशलेस" से पहले "कैरेक्टर लैस" ना हो जाएं

यदि आप अपने १०० परिचितों और मित्रों से पूछें कि आपके घर एलसीडी है तो लगभग सभी का जवाब "हां" होगा। आप उन्हीं मित्रों से पुन: पूछें कि आपके घर में फ्रिज,एसी,वाशिंग मशीन, माइक्रोवेब, कम्प्यूटर,दुपहिया वाहन इत्यादि है? तो भी जवाब बहुमत से "हां" में ही मिलेगा। मेरे कहने का आशय है कि विलासिता से जुड़ी किसी भी वस्तु के बारे में आप अपने मित्रों और परिचितों से पूछें तो जवाब ९९ फ़ीसदी "हां" में ही आएगा लेकिन जब इन्हीं १०० मित्रों और परिचितों से आप पूछेंगे कि आपके घर में आपका अपना निजी पुस्तकालय है? चलिए पुस्तकालय को छोड़िए बस इतना पूछ लीजिए कि आप इन दिनों कौन सी पुस्तक पढ़ रहे हैं? तो ९९.९९ फ़ीसदी का जवाब "ना" में आएगा। मेरे देखे यह गंभीर चिन्ता का विषय है। आज हम पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी में पुस्तकों के प्रति कोई रुझान ही नहीं है ऐसे में वे अपने देश की साहित्यिक विरासत को क्या समझेंगे। कहीं ऐसा ना हो कि "कैशलेस" होने से पहले भारत "कैरेक्टर लैस" हो जाए। यदि इसे रोकना है तो अपने घर में विलासिता की वस्तुओं के साथ-साथ एक छोटा सा पुस्तकालय अवश्य बनाईए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

हमारे षोडश संस्कार

जानिए षोडश संस्कारों एवं उनके करने का शास्त्रोक्त समय-
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१. गर्भाधान संस्कार- सायंकाल, व्रतादि तिथियों एवं श्राद्ध तिथियों को छोड़कर किसी भी शुभ मुहूर्त में।
२. पुंसवन संस्कार- गर्भस्थापन के दूसरे या तीसरे माह में।
३. सीमान्तोन्न्यन संस्कार- गर्भस्थापन के छठे या आठवें माह में।
४. जातकर्म संस्कार- प्रसवपीड़ा होने पर।
५. नामकरण संस्कार- जन्म के ग्यारहवें या बाहरवें दिन।
६. निष्क्रमण संस्कार (बाहर घुमाना)- नामकरण संस्कार के दूसरे दिन या जन्म के चौथे माह में।
७. अन्नप्राशन संस्कार- जन्म के पांच माह के बाद और छ: माह के अन्दर।
८. चूड़ाकर्म संस्कार (मुण्डन)- ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य का जन्म के प्रथम वर्ष अथवा तीसरे वर्ष में।
९. कर्णवेध संस्कार- जन्म के तीसरे या पांचवे वर्ष में।
१०. उपनयन (जनेऊ) संस्कार- ब्राह्मण का आठवें वर्ष में, क्षत्रिया का ग्यारहवें वर्ष में व वैश्य का बारहवें वर्ष में।
११. वेदारम्भ संस्कार- उपनयन संस्कार वाले दिन अथवा उससे तीसरे दिन।
१२. समावर्तन संस्कार- वेदाध्ययन समाप्त होने पर। ब्राह्मणों का केशान्त कर्म सोलहवें वर्ष में, क्षत्रिय का बाईसवें वर्ष में और वैश्य का चौबीसवें वर्ष में होना चाहिए।
१३. विवाह संस्कार- विवाह की उचित आयु होने पर।
१४. आवस्थ्याधान संस्कार- विवाह के पश्चात।
१५. श्रोताधान संस्कार- आवस्थ्याधान संस्कार के पश्चात।
१६. अन्तेष्टि संस्कार- मृत्यु होने पर।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र