जगन्नाथ पुरी में इस वर्ष २०१५ आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को रथयात्रा के साथ “नवकलेवर उत्सव”भी मनाया जाएगा। पुराने काष्ठ निर्मित विग्रहों को समाधि देकर नवीन विग्रहों के निर्माण एवं प्राण-प्रतिष्ठा “नवकलेवर उत्सव” कहा जाता है। यह “नवकलेवर” जिस वर्ष आषाढ़ का अधिक मास (जो कि सामान्यतः ८ व १९ वर्षों के अंतराल पर होता है) आने पर मनाया जाता है। इस उत्सव में दारू वृक्ष के काष्ठ से निर्मित नवीन विग्रहों का निर्माण व उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। पुराने विग्रहों को मन्दिर परिसर में ही “कोयली वैकुण्ठ” नामक स्थान पर समाधि दे दी जाती है। पूर्व में यह उत्सव वर्ष १९९६ में मनाया गया था।
सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
मंगलवार, 6 जनवरी 2015
“खुदा तू भी नहीं; मैं भी नहीं”
गल्तियों से जुदा तू भी नहीं;
मैं भी नहीं,
दोनों इंसान हैं; खुदा,
तू भी नहीं, मैं भी नहीं।
दोनों इल्ज़ाम देते हैं;
तू मुझे और मैं तुझे,
अपने अंदर झांकता
तू भी नहीं; मैं भी नहीं।
गलतफ़हमियों ने कर दी
दोनों में पैदा दूरियां,
वर्ना फ़ितरत का बुरा
तू भी नहीं; मैं भी नहीं॥
(साभार)
मैं भी नहीं,
दोनों इंसान हैं; खुदा,
तू भी नहीं, मैं भी नहीं।
दोनों इल्ज़ाम देते हैं;
तू मुझे और मैं तुझे,
अपने अंदर झांकता
तू भी नहीं; मैं भी नहीं।
गलतफ़हमियों ने कर दी
दोनों में पैदा दूरियां,
वर्ना फ़ितरत का बुरा
तू भी नहीं; मैं भी नहीं॥
(साभार)
ओरछा
इसका इतिहास 16वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब बुंदेला राजाओं ने इसकी स्थापना की थी। इस जगह की पहली और सबसे रोचक कहानी एक मंदिर की है। दरअसल, यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति स्थापना के वक्त यह अपने स्थान से हिली नहीं। इस मूर्ति को मधुकर शाह के राज्यकाल (1554-92) के दौरान उनकी रानी [अयोध्या] से लाई थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले इसे कुछ समय के लिए महल में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर। आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। वैसे, भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ यहां का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है।
देखने योग्य स्थल-
१. रामराजा मंदिर
२. जहागीर महल
३. राजमहल
४. लक्ष्मीनारायण मंदिर
५. चर्तुभुज मंदिर
६. फूल बाग
७. सुन्दर महल
८. राय प्रवीन महल
देखने योग्य स्थल-
१. रामराजा मंदिर
२. जहागीर महल
३. राजमहल
४. लक्ष्मीनारायण मंदिर
५. चर्तुभुज मंदिर
६. फूल बाग
७. सुन्दर महल
८. राय प्रवीन महल
नक्षत्र पुरूष-“पंडितजी”
इस संसार में प्रेम एक ऐसा तत्व है जो हर नियम-कायदे से ऊपर है। जहां प्रेम होता है वहां जात-पात, अमीर-गरीब, मूढ़-विद्वान आदि सब भेद समाप्त हो जाते हैं तभी तो रहीम जी कहते हैं-“प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम ना हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देय लै जाए॥” इस बार के मेरे नक्षत्र पुरूष के संबंध में उक्त सारी बातें सत्य प्रमाणित होतीं हैं। टिमरनी में जहां हमारा निवास था उस मुहल्ले का नाम था-“शीतलामाता मार्केट” क्योंकि इसमें शीतलामाता का एक भव्य मंदिर है जो हमारे घर से दिखाई देता था। इस मंदिर के पुजारी थे-शंकर महाराज जिन्हें सभी प्यार से “पंडितजी” कहते थे। “पंडितजी” एक अकिंचन ब्राह्मण थे। वे अविवाहित थे। मंझौला कद,सांवला रंग, गले में तुलसी की कंठी, माथे पर चंदन-तिलक, पहनावे में भगवा-सफेद बंडी और धोती; ऐसे दिखते थे-“पंडितजी”। पंडितजी का हमारे घर से अटूट संबंध था। वे हमारे पारिवारिक सदस्य के रूप में थे। वे दादाजी को “दरबार” और दादी को “जीजीबाई” कहते थे। हमारे दादाजी-दादी उन्हें बहुत सम्मान देते थे। हमारे अधिकांश रिश्तेदार पंडित जी से परिचित थे और पंडित जी उनसे। दादाजी और पंडित का निश्छल प्रेम ही था जो इस प्रकार असमानता होते हुए भी वे प्रायः मित्रवत ही प्रतीत होते थे। मैंने अपनी दादी से सुना था कि जब वे टिमरनी आए थे तब यह मंदिर नहीं था सिर्फ़ एक वृक्ष की नीचे देवी की तीन प्रतिमाएं थी। पंडितजी ने अपने कांधों पर टीन ढो-ढोकर इसे एक मड़िया का रूप दिया। पंडितजी नियमित रूप से देवी की सेवा-अर्चना करते थे। मुहल्ले की महिलाओं को एकत्र कर भजन-कीर्तन आदि करवाया करते थे। कुछ समय बाद प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। दादाजी ने भी इस निर्माण कार्य में अपना यथोचित सहयोग प्रदान किया। भव्य मंदिर के पुजारी की प्रतिष्ठा पाने के उपरांत भी पंडितजी और दादाजी का व्यवहार पूर्ववत बना रहा। पंडितजी करीब-करीब रोज़ हमारे घर आया करते थे। पंडित जी नज़र झाड़ने और गंडा-ताबीज़ बनाने मे सिद्धहस्त थे। बचपन में मुझपर नज़र का प्रकोप बहुत होता था। मेरी दादी को यह खुशफ़हमी थी कि मैं दिखने में और बच्चों की अपेक्षा अधिक आकर्षक हूं सो उन्होंने “पंडितजी” से कहकर मुझे बचपन में ही एक अभिमंत्रित ताबीज़ पहना दिया था जिसे मैंने दांतो से चबा-चबाकर किंचित कुरूप बना दिया था। नज़र मुझे फिर भी लग ही जाया करती थी जो “पंडितजी” के झाड़ने के उपरांत ही ठीक होती थी ऐसा मेरा भी विश्वास है। पंडितजी के नज़र झाड़ने का तरीका बहुत सादगीपूर्ण था। मैं उनके इस तरीके की अक्सर नकल उतारा करता था। नज़र झाड़ने के लिए पंडितजी थोड़ी से भभूत लेकर मंत्रोच्चार करते हुए मुझपर फ़ूंकते थे बस नज़र का प्रकोप शांत हो जाता था। अब जो कुछ भी हो मुझे राहत अवश्य मिल जाती थी। एक बार अर्द्धरात्रि को मुझे भयंकर पेट दर्द हुआ। दादाजी ने इसे नज़र का प्रकोप मानकर आधी रात को ही मंदिर जाकर पंडितजी को जगाया। पंडितजी तत्काल गहरी नींद से जागे और दादाजी के साथ हमारे घर आए और मुझे झाड़नी दी जिससे मुझे तुरन्त राहत मिल गई। यह तो सिर्फ़ एक बानगी है ऐसे ना जाने कितने किस्से है जब “पंडितजी” ने अपने निश्छल प्रेम का परिचय दिया था। आज “पंडितजी” हमारे बीच नहीं है किंतु उनकी स्नेहिल यादें हमारे साथ हैं।
-हेमन्त रिछारिया
-हेमन्त रिछारिया
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
“पीके” का विरोध - उचित या....?

आमिर खान अभिनीत फ़िल्म “पीके” रिलीज़ होते ही सुपरहिट हो गई और सुपरहिट होते ही विवादों में घिर गई। ऐसा लगता है मानो सुपरहिट होना और विवादित होना एक ही सिक्के दो पहलू हैं। हिन्दू संगठनों द्वारा फ़िल्म में दिखाए गए कुछ दृश्यों व संवादों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज़ कराई गई हैं। इस मुद्दे को लेकर मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है किंतु पत्रकारों से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है। लगता है वर्तमान पत्रकारिता में यह बात दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। विभिन्न समाचार चैनलों पर फ़िल्म “पीके” से उठे विवाद पर समीक्षात्मक बहस का प्रसारण हो रहा है। जिसे देखकर ऐसा लगा मानो एंकर और संपादकों ने यह पहले ही तय कर लिया है कि हिन्दू संगठनों का विरोध अनुचित है। एंकर द्वारा बार-बार सेंसर बोर्ड के फ़िल्म को पास कर इसे प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाने की दलील दी जा रही थी। इस दलील को देते वक्त शायद पत्रकार महोदय इस बात को भूल गए थे कि कुछ माह पहले उन्हीं के चैनल ने सेंसर बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें सेंसर बोर्ड पर फ़िल्म निर्माताओं से पैसे (रिश्वत) लेकर फ़िल्म पास करने का आरोप था। दूसरी ओर एक फ़िल्म समीक्षक फ़िल्म के जर्बदस्त हिट होने की बात को लेकर हिन्दू संगठनों के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। क्या किसी फ़िल्म का हिट होना ही उसमें दिखाई गई सामग्री के सही होने की एकमात्र कसौटी है? यदि ऐसा है तो फिर वीरसावरकर,चटगांव,स्वदेश, दो दूनी चार,चलो दिल्ली,गुज़ारिश,मि.एण्ड मिसेज अय्यर,जैसी अनेक संदेशात्मक फ़िल्में जो या तो असफ़ल रहीं या नाममात्र को सफ़ल रहीं, वे सब खराब और बकवास फ़िल्में हैं। आज हमारे देश में इस बात को बच्चा-बच्चा जानता है कि फ़िल्में कैसे हिट होती हैं या कराई जाती हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही “हैप्पी न्यू ईयर” नामक एक फ़िल्म आई थी जो सुपरहिट हुई थी इस फ़िल्म में कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले हिन्दुओं के प्रसिद्ध भजन “राधे-राधे बोलो जय कन्हैया लाल की” को एक आईटम सांग की तरह प्रस्तुत कर उस पर एक अत्यंत भौंडा व अश्लील नृत्य दिखाया गया है, क्या यह भी सही था? फ़िल्म के पक्ष में तर्क देने वालों का कहना है कि इस फ़िल्म में कुरीतियों का विरोध किया गया है। मैं ऐसे तमाम लोगों से बड़ी विनम्रता से पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें कुरीति और आस्था में अन्तर समझ आता है? पूजा-पाठ करना,मंदिर जाना,दान देना,गौ-सेवा करना ये कुरीति नहीं; आस्था है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी धर्म के पूजा-पाठ करने के तरीके तब तक निर्धारित नहीं कर सकता जब तक कि वे किसी को हानि नहीं पहुंचाते हों। सती प्रथा,देवदासी प्रथा,बलिप्रथा,विधवा विवाह निषेध,भ्रूणहत्या ये सब कुरीतियां है जिनका समय-समय पर हमारे हिन्दू महापुरूषों ने ही विरोध किया और वे बन्द हुईं लेकिन कुरीति की आड़ में धर्म का मखौल स्वीकार नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अविलम्ब इस मामले में हस्तक्षेप कर केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को निर्देशित करना चाहिए जिससे इस फ़िल्म से विवादित अंश हटाए जाएं और भविष्य में इस प्रकार के विवादों पर अंकुश लग सके।
-संपादक
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014
नक्षत्र पुरूष-डा. फूफ़ाजी
जीवन के सफ़र में अक्सर कई लोग मिलते और बिछड़ जाते हैं किंतु कुछ लोग बिछड़ने के बावज़ूद एक मीठी याद बनकर हमेशा साथ रहते हैं। इन्हीं लोगों को डा. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा “बसेरे से दूर” में “नक्षत्र पुरूष” कहा है। आज पुनः एक ऐसे ही “नक्षत्र पुरूष” का उल्लेख करने का मन कर रहा है। मेरे जीवन के यह नक्षत्र पुरूष हैं- डा.बाबूलालजी सोदावत जिन्हें मैं डा.फूफ़ाजी कहता था। ऊंचा-पूरा कद, गठीला शरीर, चमकती चांद के पीछे अर्द्धचंद्र के रूप में श्वेत केश, आंखों पर चश्मा, तेजस्वी चेहरा। डा.फूफ़ाजी कुर्सी पर बैठे हुए अपना एक पैर हमेशा हिलाते रहते थे। उन्हें काफी पीना बहुत पसंद था। वर्तमान हरदा जिले की टिमरनी तहसील से कोई ४ किमी. दूर चारखेडा़ में डा. फूफ़ाजी रहते थे। पेशे से चिकित्सक किंतु व्यवहार से एक समाजसेवी। डा.साहब हरियाणवी ब्राह्मण थे। डा.फूफ़ाजी दादाजी के पारिवारिक चिकित्सक अर्थात् “फैमिली डाक्टर” तो थे ही साथ ही साथ दादाजी और डा.फूफ़ाजी में प्रगाढ़ मित्रता थी, वैसे कहने को जीजा-साले के रिश्ते का एक कच्चा-पक्का धागा भी था। डा. सोदावत जी की पत्नि गलाबाई और मेरे दादाजी का गांव एक ही होने की वजह से मेरे दादाजी ने गलाबाई को मुंहबोली बहन बना रखा था। इस नाते डा.फूफ़ाजी मेरे दादाजी को बड़े भाई सा सम्मान दिया करते थे। डा. फूफ़ाजी का कई वर्षों से निरन्तर हमारे घर हर दूसरे दिन आना और दादाजी, दादी और मेरे स्वास्थ्य का परीक्षण करने का नियम सुनिश्चित था। उनके इस नियम के बारे हमारे मुहल्ले में सभी को पता था इसी कारण कई मुहल्ले वाले भी सायं ४ बजते ही डा.फूफ़ाजी के आने का इंतज़ार करते थे। मैंने अक्सर दादाजी को दादी से पूछते हुए सुना था कि-“आज डा.साहब का टर्न है क्या?” डा.फूफ़ाजी के आने वाले दिन को दादाजी “टर्न” कहते थे। डा.फूफ़ाजी के आते ही हम सब उन्हें घेरकर उनके आस-पास एक सभा की तरह बैठ जाते थे; कुछ अस्वस्थ मुहल्ले वाले भी आ जाते थे। डा.फूफ़ाजी बारी-बारी सभी के स्वास्थ्य का परीक्षण कर उन्हें उचित सलाह या दवाईं देते थे। डा.फूफ़ाजी प्रायः निशुल्क ईलाज किया करते थे किंतु दादाजी के आक्रामक आग्रह के कारण उन्हें दादाजी-दादी के स्वास्थ्य परीक्षण की फ़ीस लेनी ही पड़ती थी। स्वास्थ्य परीक्षण के उपरांत हास-परिहास व किस्सागोई का सत्र शुरू होता था। डा.फूफ़ाजी के पास हमेशा किस्सों की भरमार रहती थी। वे अक्सर अपने बीते दो दिन में घटित होने वाली घटनाओं को मज़ेदार किस्से का रूप देकर सभी का मनोरंजन किया करते थे। डा.फूफ़ाजी का भरापूरा परिवार है उनके चार बेटे है। दो बेटे स्वंय चिकित्सक है। जो दादाजी को “मामाजी” कहकर संबोधित करते थे उनके ही कारण हरदा के अधिकांश चिकित्सक दादाजी को मामाजी कहकर पुकारने लगे थे। एक बार दादाजी गंभीर रूप से बीमार हो गए। बरसात का मौसम था। डा.फूफ़ाजी के अनुसार उन्हें पीलिया नामक रोग हो गया था। इस रोग का ईलाज डा.फूफ़ाजी ने अपने दैनिक नियमानुसार हमारे घर आकर ही किया किंतु अब वे हर दूसरे दिन के स्थान पर प्रतिदिन आने लगे थे। शाम होते डा.फूफ़ाजी आते और पीलियाग्रस्त दादाजी को बाटल चढ़ाते; इंजेक्शन लगाते और हमें उनकी देखभाल हेतु आवश्यक निर्देश देते। देखते ही देखते दादाजी के स्वास्थ्य पर डा.फूफ़ाजी के ईलाज का सकारात्मक असर होना भी शुरू हो गया था किंतु पूर्ण स्वस्थ होने में अभी कुछ दिन बाकी थे। एक दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। नदी-नाले अपने उफान पर थे। टिमरनी और चारखेड़ा मार्ग के बीच का पुल नाले के उफान के कारन डूब गया था। दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग चुकी थी। पुल के ऊपर से पानी के तेज बहाव को देखते हुए बड़े वाहन ट्रक-बस इत्यादि भी एक ओर खड़े कर दिये गए थे। इधर शाम धीरे-धीरे गुजरती जा रही थी। हम सब डा.फूफ़ाजी का इंतज़ार कर रहे थे। दादाजी ने हमारी व्याकुलता देखते हुए हमें सांत्वना देकर कहा-“इतनी तेज़ बारिश में रास्ता बंद हो गया होगा अब डा.साहब नहीं आएंगे और वैसे भी मैं पहले की अपेक्षा स्वस्थ हूं, चिंता मत करो।” डा.फूफ़ाजी के आने का नियत समय बीत जाने के उपरांत हमने दादाजी की सात्वंना को ही अपनी तसल्ली का आधार बनाया और अपने-अपने कार्यों में संलग्न हो गए। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला तो यह देखकर दंग रह गया कि सामने डा.फूफ़ाजी लंबा सा रेनकोट पहने हाथ में बैग थामें खड़े हैं। अंदर आते ही दादाजी थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा डा.साहब इतनी बारिश में आने की क्या आवश्यकता थी? अब मैं स्वस्थ हूं। इस पर डा. फूफ़ाजी ने दादाजी को बाटल लगाने का उपक्रम करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा-“भैया, डाक्टर मैं हूं या आप।” उनके इस वाक्य ने गंभीर माहौल को हल्का-फुल्का कर दिया। कुछ देर बाटल समाप्ती के बाद किस्सागोई के सत्र में दादाजी ने डा.फूफ़ाजी से पुनः प्रश्न किया कि “आखिर आप यहां तक आए कैसे?” इस पर डा.फूफ़ाजी ने बताया कि कोई वाहन पुल पार ही नहीं कर रहा था। बड़ी देर के बाद एक ट्रक वाले ने डूबे पुल को पार करने की हिम्मत जुटाई तो मैंने उसे अपने साथ ले चलने का अनुरोध किया क इसपर उस ट्रक के चालक ने कहा कि “साहब देख लीजिए बहाव तेज है ट्रक बह भी सकता है। हमें तो खैर तैरना आता है।” इस पर मैंने कहा कि -“भाई यदि ट्रक बहा तो भी मरूंगा और यदि भैया को कुछ हो गया तो भी ये जीवन मृतवत ही हो जाएगा। जब मरना दोनों तरफ़ से ही है तो मित्रता और फ़र्ज़ निभाते हुए मरना ज़्यादा श्रेयस्कर है।” ये सुनकर हम सभी भाव-विभोर हो गए। इस प्रकार डा.फूफ़ाजी ने अपने जीवन की परवाह किए बिना अपना फ़र्ज़ व मित्रता निभाई।
-हेमन्त रिछारिया
-हेमन्त रिछारिया
मंगलवार, 23 दिसंबर 2014
धर्मांतरण
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