ना आहो-फुगां; ना गम लिख रहा हूं
मैं इन दिनों बहुत कम लिख रहा हूं
मुहब्बत;वफ़ा;दोस्ती;कस्मे-वादे
ये तो जहां के भरम लिख रहा हूं
नये दौर के कुछ नये हैं सलीके
आंखों की मैं शरम लिख रहा हूं
कैसी कमी देखो कागज़ की आई
सियासतदां का सितम लिख रहा हूं
वो कहते हैं बेवफ़ा मुझको अक्सर
मैं अब भी उनको सनम लिख रहा हूं
वो लिख रहे हैं शिकस्त आंधियों की
मैं हथेली के अपने ज़खम लिख रहा हूं
-हेमन्त रिछारिया
मैं इन दिनों बहुत कम लिख रहा हूं
मुहब्बत;वफ़ा;दोस्ती;कस्मे-वादे
ये तो जहां के भरम लिख रहा हूं
नये दौर के कुछ नये हैं सलीके
आंखों की मैं शरम लिख रहा हूं
कैसी कमी देखो कागज़ की आई
सियासतदां का सितम लिख रहा हूं
वो कहते हैं बेवफ़ा मुझको अक्सर
मैं अब भी उनको सनम लिख रहा हूं
वो लिख रहे हैं शिकस्त आंधियों की
मैं हथेली के अपने ज़खम लिख रहा हूं
-हेमन्त रिछारिया





