हाल ही में खबर आई थी कि बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने अमरीका प्रवास के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा से मोदी के वीज़ा को लेकर चर्चा करने वाले हैं। इसकी खबर लगते ही लोकसभा के ४० और राज्यसभा के २५ भारतीय सांसदों ने ओबामा को फैक्स कर मोदी को वीज़ा ना दिए जाने की अपील की है। मोदी के वीज़ा का विरोध करने में इतनी जल्दी तो वहां के सीनेटरों ने भी नहीं की जितनी जल्दबाजी में ये तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सांसद दिख रहे हैं। यहां एक बात और विचारणीय है कि मोदी को अमरीका का वीज़ा मिलने से इन पर कौन सी आफत आ जाती, क्या ये अमरीका के हक में अपनी वफ़ादारी सिद्ध करना चाहते हैं या वहां की सीनेट का सदस्य बनना चाहते हैं। परन्तु मैं इन सांसदों व इनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी की मजबूरी समझ सकता हूं आखिर ये दल ज़िंदा ही हैं तुष्टिकरण की राजनीति पर। इन सांसदों के इस कदम से विश्व में भारत की साख को क्षति पहुंची है, देश का अपमान हुआ है। दलगत राजनीति करना कोई बुरी बात नहीं और ना ही राजनीतिक मतभेद या विरोध करने में कुछ हानि है परन्तु अपने घर का झगड़ा किसी तीसरे को दिखाना ये अपने घर के साथ गद्दारी है। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की फ़िक्र करते हैं यदि किसी दिन इस देश में बहुसंख्यक एकजुट होकर वोट करने लगेगें तो फ़िर देखिए ये किस तरह अपने सुर व नीतियां बदलते हैं। हमारे देशवासियों को चाहिए कि इनकी सियासी चालों को समझें व इन्हें अपनी ओछी राजनीतिक बिसात बिछाने के लिए अवसर ना दें जिससे देश की अखंडता अक्षुण्ण रह सके।
सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
मंगलवार, 23 जुलाई 2013
शनिवार, 13 जुलाई 2013
अर्ज़ किया है.....
अब नहीं अटकता दिल दुपट्टे में
उम्र का अपना तकाज़ा होता है
-------------
कहां तो मुश्किल था लम्हा तेरे बगैर
कहां गुज़ार दी देख ज़िंदगी हमने
--------------
ज़ायका बिगाड़ गया सब्र का फल
हमने तो सुना था मीठा होता है
-----------------------
अपने बदरंग लिबासों की फिक्र कौन करे
बे-पर्दा रूह का जब एहतराम हो निगाहों में
-----------------------
वादों का टूटना तो सुना था अक्सर शेख
आजकल कोशिशें भी कामयाब नहीं होतीं
----------------------
ए पारस सा मिज़ाज़ रखने वाले
मैं संग सही छूकर मुझे नवाज़ दे
-----------------------
"इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"
हरम-ऐशगाह
------------------
"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
कभी हम दो कदम साथ चले थे"
------------------
"गर तू खुद को दानां समझता है
पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"
दाना-बुद्धिमान
-----------------
"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"
-------------------
"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"
-----------------------------------
"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"
-----------------------
"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"
खाशाक=कूड़ा-करकट
गौहर=मोती
----------------
"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"
महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
जुस्तजू-इच्छा;अभिलाषा
------------------
"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
अदने से अश्क की बिसात ही क्या"
---------------------
"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना"
----------------------
"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"
----------------
"जाने इस नस्ल का अब क्या होगा
सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"
जज़्ब-समाना
---------------------
ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है
-----------------
जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते
----------------
हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं
----------------
खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना
----------------------
"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"
-------------------
आसान मश्गला ना समझो अशआरों को गढ़ लेना
सौ बार तराशे जाते हैं ये दिल में उतरने से पहले
मश्गला-कार्य
अशआर-काव्य पंक्तियां
-हेमन्त रिछारिया
----------------
उम्र का अपना तकाज़ा होता है
-------------
कहां तो मुश्किल था लम्हा तेरे बगैर
कहां गुज़ार दी देख ज़िंदगी हमने
--------------
ज़ायका बिगाड़ गया सब्र का फल
हमने तो सुना था मीठा होता है
-----------------------
अपने बदरंग लिबासों की फिक्र कौन करे
बे-पर्दा रूह का जब एहतराम हो निगाहों में
-----------------------
वादों का टूटना तो सुना था अक्सर शेख
आजकल कोशिशें भी कामयाब नहीं होतीं
----------------------
ए पारस सा मिज़ाज़ रखने वाले
मैं संग सही छूकर मुझे नवाज़ दे
-----------------------
"इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"
हरम-ऐशगाह
------------------
"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
कभी हम दो कदम साथ चले थे"
------------------
"गर तू खुद को दानां समझता है
पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"
दाना-बुद्धिमान
-----------------
"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"
-------------------
"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"
-----------------------------------
"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"
-----------------------
"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"
खाशाक=कूड़ा-करकट
गौहर=मोती
----------------
"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"
महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
जुस्तजू-इच्छा;अभिलाषा
------------------
"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
अदने से अश्क की बिसात ही क्या"
---------------------
"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना"
----------------------
"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"
----------------
"जाने इस नस्ल का अब क्या होगा
सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"
जज़्ब-समाना
---------------------
ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है
-----------------
जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते
----------------
हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं
----------------
खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना
----------------------
"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"
-------------------
आसान मश्गला ना समझो अशआरों को गढ़ लेना
सौ बार तराशे जाते हैं ये दिल में उतरने से पहले
मश्गला-कार्य
अशआर-काव्य पंक्तियां
-हेमन्त रिछारिया
----------------
गुरुवार, 11 जुलाई 2013
जनतंत्र यात्रा
भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ रहे समाजसेवी अन्ना हजारे की जनतंत्र यात्रा मध्यप्रदेश में प्रवेश कर चुकी है। उनकी आमसभाओं में भीड़ दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। शायद अब आम-आदमी को जन-लोकपाल का सही मतलब समझ आने लगा है। भ्रष्टाचार का अर्थ सिर्फ आर्थिक अनियमितताएं या रिश्वत का लेन-देन नहीं होता। भ्रष्टाचार के मायने व्यापक है। भ्रष्टाचार की सटीक परिभाषा यदि करूं तो वह है भ्रष्ट-आचरण। अपने कर्तव्य स्थल पर समय पर उपस्थित ना होना, लाइन तोड़कर बिल जमा करना या मंदिर में दर्शन करना, शहर और नदियों को प्रदूषित करना, आयकर बचाने के लिए आय छिपाना, मिलावट करना, मिथ्या संभाषण करना, अपने देश के गौरव और उसकी संस्क्रति को भूलना, सरकारी संपत्तियों का दुरूपयोग करना, भू-संपदाओं का दोहन करना,आदि-आदि सब भ्रष्टाचार का ही रूप है। जब हम भ्रष्टाचार के इन रूपों के बारे में विचार करते हैं तो पाते हैं कि हम सब कहीं ना कहीं इसमें शामिल हैं। हमारे देश में जितने कानून हैं यदि सब के सब कड़ाई से पालन कराए जाएं तो आम आदमी का जीना दूभर हो जाएगा। बानगी के लिए मकान बनाने के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेते समय जो नियमों की सूची दी जाती है उसमें एक नियम यह भी है कि भूमिस्वामी अपने मकान के चारों ओर ५-५ फीट की जगह नाली,पेड़ इत्यादि के लिए छोड़ेगा। अब ज़रा अपने आसपास नज़र दौड़ाईए और अपने स्वयं के भवन को देखिए कि कहां तक इस नियम का पालन किया गया है। यदि जन-लोकपाल आ जाता है तो भले ही कोई आपसे रिश्वत की मांग ना करे परन्तु नियमों के पालन करने में आम आदमी का पसीना छूट जाएगा। मेरे देखे भ्रष्टाचार से मुक्ति का एक सूत्र है: सुव्यवस्था+नैतिक उत्थान=भ्रष्टाचार मुक्त सामाजिक व्यवस्था। भ्रष्टाचार वह ताली है जो एक हाथ से नहीं बजती। यदि आज भ्रष्टाचार को शिष्टाचार कहा जाने लगा है तो इसे निभाने वाले कौन हैं, हम ही हैं। क्योंकि हमें आज सब कुछ "इंस्टेंट";त्वरित चाहिए। हमारे पास समय व धैर्य कहां है? हम चाहते हैं भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था हमें मिले पर इसके लिए कुर्बानी कोई अन्ना, कोई केजरीवाल दे, यह कहां तक उचित है। हमें भी अपने स्तर पर कोई ना कोई शुरूआत तो करनी होगी सिर्फ अन्ना की सभाओं में जाकर "अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं" कह देने मात्र से तो आप अन्ना के साथ नहीं हो जाते। अन्ना के साथ होने का मतलब है उनके सिद्धांतो के अनुरूप जीवनचर्या का अनुपालन, जो आसान बात नहीं है। जब इस मुद्दे पर बात आती है तो यही तथाकथित आम आदमी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि "हम तो पेट की लड़ाई लड़ रहे हैं"। दरअसल हम अपने स्तर पर कोई शुरूआत करना ही नहीं चाहते। सब कुछ पका-पकाया चाहते हैं। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जो आवश्यकता से अधिक धन संचय करता है वह चोर है, कितना सीधा सूत्र है। अब ज़रा पूरी निर्दोषता से अपने आप से पूछिए क्या मैंने आवश्यकता से अधिक धन एकत्रित किया है? मेरा दावा है ९० फीसदी आम आदमियों का जवाब "हां" में आएगा। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, लोकशाही, ईमानदारी, ये सब कहने-सुनने जितने अच्छे लगते हैं जीने में उतनी कठिन परीक्षा लेते हैं। इसका यह आशय कतई नहीं कि ये कोशिश नहीं होनी चाहिए;निश्चित होनी चाहिए मगर अन्ना की तरह। अन्ना ने पहले खुद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया फिर इन कुव्यवस्थाओं के विरूद्ध शंखनाद किया। हमारा आज का आम आदमी शंखनाद पहले कर रहा है और आचरण में इससे कोसों दूर हैं। मेरे देखे आम आदमी होना कोई सरल बात नहीं है यह बेहद असाधारण चीज़ है।
"It is so simple conman man change whole corrupt system but is so difficult to be a conman man."
-हेमन्त रिछारिया
पुनश्च: कल रात एक न्यूज़ चैनल ने एक खबर प्रसारित की जिसमें यूपी के एक पूर्व विधायक श्री भगवती प्रसादजी का अत्यंत निर्धनता के चलते इलाज ना मिल पाने के कारण निधन हो गया। वे दो बार विधायक रह चुके थे। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना कार्यकाल व जीवन जिया। बाद में वे एक चाय की दुकान चलाकर अपना जीवकोपार्जन करते रहे। हाल ही में उन्होंने सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया कारण था इलाज के लिए पर्याप्त पैसों का अभाव। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजली।
"It is so simple conman man change whole corrupt system but is so difficult to be a conman man."
-हेमन्त रिछारिया
पुनश्च: कल रात एक न्यूज़ चैनल ने एक खबर प्रसारित की जिसमें यूपी के एक पूर्व विधायक श्री भगवती प्रसादजी का अत्यंत निर्धनता के चलते इलाज ना मिल पाने के कारण निधन हो गया। वे दो बार विधायक रह चुके थे। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना कार्यकाल व जीवन जिया। बाद में वे एक चाय की दुकान चलाकर अपना जीवकोपार्जन करते रहे। हाल ही में उन्होंने सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया कारण था इलाज के लिए पर्याप्त पैसों का अभाव। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजली।
बुधवार, 10 जुलाई 2013
"काम(सेक्स) ज़हरीला होकर ज़िंदा है"
प्रसिद्ध विचारक फ्रायड ने कहा था कि "हिंदुस्तान ने काम को ज़हर देकर मारने कोशिश की है मगर काम ज़हरीला होकर ज़िंदा है।" फ्रायड ने ठीक ही कहा था । आज जब-जब भी कोई कामुक विकृति से जुड़ी ख़बर आती है तो मुझे ओशो याद आ जाते है। वे अकेले ऐसे संबुद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने इस ज्वलंत मुद्दे पर कुछ कहने का साहस जुटाया था। मगर अफ़सोस इस देश व दुनिया के अधिकतर लोगों ने उन्हें नहीं समझा जिसका दुष्परिणाम आज हम सब भुगत रहे हैं। ओशो हमेशा कहते थे कि काम का दमन नहीं वरन अतिक्रमण करो, जागरण करो। उनके अनुसार होशपूर्वक किया काम ही काम से मुक्ति है। आज हमारे चारों दमन सिखाया जा रहा है जिसके फलस्वरूप उर्जा विकृत होकर अत्यंत घृणित रूप से बाहर आ रही है। केवल मनुष्य ही है जो २४ घंटे कामुक रह सकता है क्योंकि पशु-पक्षियों की तो ऋतु होती है जिसमें वे कामुक होते हैं। उर्जा तो एक ही है उसे "काम" कहें या "राम"। राम से यहां तात्पर्य उर्जा के उर्द्धगमन से है। उर्जा का नियम है यदि वो ऊपर नहीं जाएगी तो नीचे जान शुरू कर देगी जो कि सहज मार्ग है। चढ़ने में हमेशा कठिनाई होती है गिरना हमेशा से सरल रहा है। जब तक हम इस उर्जा को रूपांतरित कर उर्द्धगमन में संलग्न नहीं कर देते तब तक इस प्रकार की यौन दुर्बलताओं से निजात नहीं पा सकते। दमन तो सिर्फ और सिर्फ उर्जा को विकृत ही करता है इसलिए दमन नहीं वरन जागरण।
मंगलवार, 18 जून 2013
रविवार, 16 जून 2013
राष्ट्रवाद बनाम छ्द्म धर्मनिरपेक्षता
आख़िरकार जदयू-भाजपा गठबंधन टूट गया। दोनों दलो की विचार हौदियां (थिंक टैंक) इससे होने वाले नफ़ा नुकसान का आंकलन करने में जुट गए। राजनीतिक पंडितों और न्यूज़ चैनलों को लंबे समय तक चलाने के लिए मसाला मिल गया। लेकिन इन सब के बीच देशहित का क्या? जनहित का क्या? जिस मुद्दे को इस अलगाव का आधार बनाया गया है वह एक छ्द्म आधार है। नितीश भले ही कितनी सफ़ाई दें पर जब भी ये सवाल खड़ा होगा कि यदि धर्मनिरपेक्षता का इतना ही ख़्याल था तो उस समय ही अलग हो जाते जिस समय गुजरात में दंगे हो रहे थे। भले ही वाजपेयीजी का बहाना बनाकर नितीश इसका जवाब देने की असफल कोशिश करें लेकिन वाजपेयी जी को सक्रिय राजनीति से दूर हुए भी काफी वक्त गुज़र चुका है, तब अलग हो जाते! खैर, वो कोई मोदी या धर्मनिरपेक्षता के कारण अलग नहीं हुए हैं ये वो भी जानते हैं। परन्तु इस देश की जनता तो सदियों से मूढ़ समझी जाती रही है और उसका आचरण भी कमोबेश वैसा ही है। ये बात मेरी समझ से परे है कि कैसे हिंदुत्व की बात करना सांप्रदायिक है और अल्पसंख्यकों की बात; और उनमें भी सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिमों की बात करना धर्मनिरपेक्षता। पता नहीं इस देश की जनता ये क्यों नहीं सोच पाती। भाजपा ने भी समय-समय पर गंभीर गल्तियां की हैं जिसकी वजह से आज उसकी ये हालत है। ज़रा याद कीजिए वाजपेयीजी का वो दौर जब उन्होंने एक वोट के कारण सरकार की बलि चढ़ा दी मगर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। आखिर क्यों भाजपा अगला चुनाव "राष्ट्रवाद बनाम भ्रष्टाचार;राजद्रोह;अराजकता;छद्म धर्मनिरपेक्षता" जैसे मुद्दों पर नहीं लड़ती? विपक्षी आरोप लगाते हैं कि आप सांप्रदायिक हैं और आप चल पड़ते हैं सफ़ाई देने। आप क्यों इस बात को नहीं कहते इस राष्ट्र के हित में जो भी हैं वो सब हमारे हैं और जो राष्ट्रहित के विरोधी हैं वो हमारे शत्रु हैं। आप देश के सामने उचित व सही तथ्यों को रखिए। जब भी गुजरात दंगों की बात आती है तो आप क्यों गोधरा का ज़िक्र करना भूल जाते हैं? यहां मेरा तात्पर्य ये कतई नहीं गुजरात में जो हुआ वह सही है। परन्तु गोधरा में जो हुआ वह भी सही नहीं था। बहरहाल, ये राजनेताओं की चालें हैं और वो अपने निजी लाभ के लिए इन्हें चलते रहेंगे। मेरी सभी देशवासियों से अपील है कि वो इन छद्म चेहरों को जल्द से जल्द पहचान ले और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर अपनी अगली सरकार चुनें।
-हेमन्त रिछारिया
-हेमन्त रिछारिया
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

