गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

बसेरे से दूर

बीच खड़ी हैं हम दोनों के
अभी न जाने कितनी रातें,
अभी बहुत दिन करनी होंगी
केवल इन गीतों में बातें।

कितनी रंजित प्रात; उदासी
में डूबी कितनी संध्याएं,
सब के बीच पिरोना होगा,प्रिय हमको धीरज का धागा।
याद तुम्हारी लेकर सोया, याद तुम्हारी लेकर जागा॥

-डा.हरिवंशराय बच्चन
(साभार-बसेरे से दूर)

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

हाइकु

तुझे देखते
आंखे नहीं अघातीं
चांद चेहरा

 ज़ुबानी घोड़ा
है सरपटा दौड़ा
खींचो लगाम

मन है चंगा
तो कठौती में प्यारे
मिलेगी गंगा

ऐसे मनाएं
अबके गणतंत्र
सुधारें तंत्र

-हेमन्त रिछारिया

आक्सफोर्ड और केम्ब्रिज की प्रतिद्वंद्विता-

कहते हैं कि"आक्सफोर्ड एक सिटी है जिसके बीच एक यूनीवर्सिटी बनी है। केम्ब्रिज एक युनिवर्सिटी है जिसके बीच एक सिटी बसी है।" १३वीं सदी के प्रारम्भ में आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के कुछ विद्यार्थी वहां से किसी कारण असंतुष्ट होकर केम्ब्रिज आये और यहां उन्होंने "स्टूडियम जनरेल" के नाम से एक शिक्षा-केन्द्र की स्थापना की, जिसे शताब्दी के तीसरे दशक के अन्त में युनिवर्सिटी के रूप में राजकाय मान्यता दी गई। आक्सफेर्ड वाले इसे बड़े अभिमान से कहते हैं कि केम्ब्रिज युनिवर्सिटी हमारी ही सन्तान है। उधर केम्ब्रिज वालों का दावा है कि ईस्ट ऐंग्लिया के राजा ने सातवीं शताब्दी में ही यहां एक स्कूल की स्थापना की थी जिसमें आक्सफोर्ड के विद्यार्थी आकर भर्ती हुए थे और बाद में उसी को "स्टूडियम जनरेल" का नाम दिया गया; उसी को केम्ब्रिज युनिवर्सिटी का। सच्चाई तो अतीत की धुंध में खो गई है पर अस्तित्व में आ गयी है-आक्सफोर्ड और केम्ब्रिज की प्रतिद्वंद्विता।

(साभारः बसेरे से दूर)
So like a bit of stone I lie
Under a broken tree,
I could recover if I shrieked
My heart's agony
To passing bird, but I am dumb
From human dignity.

-W.B.Yeats.

हिन्दी अनुवाद-

टूटे तरू के नीचे
छोटे से पत्थर सा;
पड़ा हुआ हूं मैं कब से
विजड़ित जड़िमा से।

मेरा दिल हल्का हो जाता,
डाली पर बैठी चिड़िया को
यदि मैं अपनी पीर सुनाता,
लेकिन मैं मुंह बन्द किये
मानव गरिमा से।
(अनुवादकः डा. हरिवंशराय बच्चन)

बुधवार, 9 जनवरी 2013

वही तो है...

हर कृत्य में;हर नृत्य में, जीवन की पर्त-पर्त में वही तो है।
राजा वही है रंक भी, मरहम वही है दंश भी,
नयन मीड़ देखो ज़रा, फूलों से निचुड़ते अर्क में, वही तो है....!
साधना भी वही;आराधन भी, उलाहना भी वही;प्रार्थना भी,
मौन हो बैठो ज़रा, ह्रदय के गहरे गर्त में, वही तो है....!
हार भी वही जीत भी, बैर भी वही प्रीत भी,
दांव खेलो तो सही, लगी हुई हर शर्त में वही तो है...!
-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 7 जनवरी 2013

"विवाह": संबंध या समझौता?

संघ प्रमुख का "विवाह" पर दिया गया बयान एक बार फिर सुर्खियों में है। आजकल किसी बयान का "विवादास्पद" होना एक फैशन सा बनता जा रहा है। इसमें मीडिया के पंडितों की भी खासी भूमिका है। "विवाह" संबंध है या समझौता, ये हमारे विवाहित मित्रों से बेहतर और कौन जान सकता है। भले ही वे इसके सच को सार्वजनिक करने में संकोच करें। आचार्य रजनीश का कहना है -"विवाह प्रेम पर आधारित होना चाहिए।" परन्तु ज़रा हमारे आसपास हो रहे विवाहों का सूक्ष्मता से अवलोकन करके देखिए, क्या वे आपको प्रेम पर आधारित दिखाई देते हैं? आजकल विवाह "लाभ" पर आधारित होते हैं और जिसकी नींव में लाभ-हानि का गणित हो वो प्रेम-संबंध भला कैसे हो सकता है, हां व्यापारिक संबंध अर्थात "बिजनेस रिलेशन" भले ही हो सकता है। मेरे देखे यदि रति-सुख को बिना विवाह के सामाजिक स्वीक्रति व मान्यता प्राप्त हो जाए तो समाज से नब्बे प्रतिशत विवाह विदा हो जाएंगे। जिन देशों व संस्क्रतियों ने ऐसा किया है वहां विवाह गौण हो गया है। इसका मतलब यह नहीं कि मेरा विवाह नामक संस्था पर विश्वास व आस्था नहीं है;.....है। पूर्ण आस्था है, पर उसकी नींव में "प्रेम" होना चाहिए। कुछ तथाकथित विद्वानों मित्रों का मत है कि चूंकि संघ प्रमुख अविवाहित है इसलिए उन्हे इस विषय में बोलने का अधिकार नहीं है। यहां मैं उन तथाकथित विद्वान समालोचकों से कहना चाहूंगा कि महानुभाव विष पीने से प्राण-हानि होती है ये सब जानते और मानते है पर इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कितनों ने विष पीकर देखा है? मेरा आशय यह है कि दूसरों की परीणति से भी तो सबक लिया जा सकता है। बहरहाल, मेरा संघ प्रमुख से यही निवेदन है कि इस प्रकार के कटु सत्यों के लिए अभी हमारा समाज तैयार नहीं है। अस्तु इस तरह के कड़वे सत्यों को उदघाटित ना करें तो बेहतर है क्योंकि- "उपदेशो हि मूर्खांनाम प्रकोपाय ना शान्तये। पयपानं भुजंगानाम केवल विषवर्धनम॥" इसका अर्थ है...........जाने दीजिए इसका अर्थ बताकर मैं एक नए विवाद को जन्म देना नहीं चाहता। -संपादक

शनिवार, 5 जनवरी 2013

"अति सर्वत्र वर्जयेत"

मित्रों, आज डा.बशीर बद्र का एक शेर याद आ रहा है कि "जी तो चाहता है कि सच बोलें,क्या करें हौंसला नहीं होता"आज कमोबेश हालात कुछ ऐसे ही हैं। आज हमारा समाज एक विक्रति की ओर अग्रसर है। आज के इस माहौल में कुछ भी बोलना जो व्यवहारिक हो आपको एक वर्ग विशेष का दुश्मन बना देता है। आज हम एक अति से दूसरी अति की ओर बढ़ रहे हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया कि "अति सर्वत्र वर्जयेत" अति सभी जगह बुरी होती है। अति स्वतंत्रता उच्छंखलता का रूप ले लेती है, अति विश्वास अंधविश्वास बन जाता है। मित्रों, वही पतंग आसमान की ऊंचाईयां छूती है जिसकी डोर किसी के हाथ में होती है, कटी पतंग जो कि पूर्ण स्वंतत्र होती है कुछ देर हवा में सैर भले ही कर ले पर उसकी परिणति ज़मीन पर धूल-धूसरित होकर ही होती है। यहां मुझे एक बोध कथा का स्मरण आ रहा है जो यहां प्रासंगिक है-"एक बार एक गुरू अपने शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में शिष्य ने गुरू से कहा कि गुरूदेव मार्ग में बड़े कांटे है तो गुरू ने उत्तर दिया कि खडाऊं पहन लो। इस पर शिष्य मार्ग के कांटो की ओर संकेत करता हुआ बोला-गुरूदेव मैं इन कांटों की बात नहीं कर रहा, इस पर गुरू ने अपने पैरों की ओर संकेत कर कहा कि- मैं भी इस खडाऊं की बात नहीं कर रहा।" गुरू और शिष्य दोनों एक दूसरे की बात भली-भांति समझ गए परन्तु हम और हमारा समाज ये बात ना जाने कब समझेगा? -संपादक