शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

मजदूर


देखो ये मजदूर हैं,
हां-हां ये मजदूर हैं।
कठिनाईयों के साए में पले
सुखी जीवन से कई दूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

राह पथरीली संकरा गलियारा
बाहों का ना कोई सहारा,
भरी दुपहरी है फिर भी
बोझा ढोने को मजबूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

घास फूस से बने घरों में
जब जीवन सिसकी लेता है,
आंखों से झरता पानी
सारा अन्त: भर देता है,
अपने हाथों से अंखियां पोंछें
आंचल हुए अपनों के दूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

अरमां इनके सीने में दफन हैं
सारे सुख मेहनत की रहन हैं,
आंखों के सारे सपने इनकी
आंखों में ही चूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

माथे पे पसीना है इनके
नैनों में उदासी छाई है,
किससे पूछें;कौन बताए
खोई कहां तरूणाई है,
बेरंग हुई है रंगत
हुए चेहरे बेनूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

कवि-हेमंत रिछारिया

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

कौन श्रीकृष्ण "सरल"...!

"नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊँ,
 'सरल' शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊँ।"


यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण सरल? यह हमारी विडम्बना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रान्तिकारियों के योगदान को हम तक पहुँचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियाँ, पत्नी के गहने यहाँ तक कि स्वयँ की जान भी दाँव पर लगा दी, उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालाँकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयँ परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रान्तिकारियों पर इसलिए लिखता हूँ जिससे आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍ "जीवित-शहीद" की उपाधि से अलँकृतश्रीकृष्ण "सरल" सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल"  का जन्म 1 जनवरी 1919 को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पाँच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहान्त हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारम्भ कर दिया था। प्रारम्भ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रान्तिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रान्तिकारियों के जीवन को खँगालने के उद्देश्य से की। 15 महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से 125 पुस्तकें,45 काव्य-ग्रन्थ,4 खण्ड काव्य,31 काव्य संकलन,8 उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण सरल तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत् "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहाँ? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएँगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दाँव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है। वे कहते हैं-
"पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
 फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक, "सरल-चेतना"

"......कि नथूराम निर्दोष है!"

न्यायमूर्ति जस्टिस खोसला(नथूराम गोडसे को फांसी की सज़ा देने वाली बेंच के सदस्य जज) ने गांधी-वध के लगभग १५ वर्ष पश्चात अपनी सेवानिव्रत्ति के बाद दस न्याय-निर्णय कथाओं का एक ग्रंथ लिखा। उसमें गांधी-वध (The Murder of the Mahatma) अर्थात नथूराम गोडसे का अभियोग का भी एक अध्याय है। श्री खोसला के मन पर उस समय जो मुद्रा अंकित हुई थी वह उन्होने कुछ इस प्रकार शब्दांकित की है। वे लिखते हैं-"नथूराम का वक्तव्य न्यायालय में उपस्थित दर्शकगणों के लिए एक आकर्षक वस्तु थी। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनने में आतीं थीं और उनके गीले-गीले नेत्र और गिरने वाले आंसू दिखाई देते थे। न्यायालय मे उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि उन्होंने अधिक से अधिक संख्या में यह कहा होता कि नथूराम निर्दोष है।

("I have however no dought that had the audiance of that day been constituted into a Jury and entrusted with the task of deciding Godse's appeal, they would have brought in a verdict of 'not guilty' by an overwhelming majority")

JUSTICE KHOSLA
-The Murder of The Mahatma,Page 234

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

वेलेन्टाइन डे-"पारिवारिक एकता दिवस"


ईसा के जन्म के २६९ वर्ष बाद रोम देश के शासक क्लाडियस द्वितीय ने अपने सैनिकों के शादी करने पर पाबंदी लगा दी थी। उनके विचार से अविवाहित व्यक्ति ही अच्छे सैनिक बन सकते थे। रोम के एक चर्च के पादरी महान संत "वेलेन्टाइन" को यह कानून ईश्वरीय इच्छा के विरूध्द प्रतीत हुआ। संत वेलेन्टाइन को लगा कि यदि राजा के आदेश के पालन के कारण सैनिक विवाह ना कर सके तो वे वैश्याव्रत्ति की ओर प्रेरित होंगे या फिर दूसरे की स्त्रियों से अनैतिक संबंध स्थापित करने जैसा कुप्रयास करेंगे। राजा के आदेश के परिणामस्वरूप ज़ोर-जबरदस्ती से शारीरिक संबंध बनाने की प्रव्रत्ति ज़ोर पकड़ने लगी। विवाह की महत्ता को समझते हुए संत वेलेन्टाइन रात्रि के समय चर्च में सैनिकों का गुपचुप विवाह करवाने लगे। संत वेलेन्टाइन की शिक्षा थी कि पारिवारिक प्रेम एवं एकता से ही मानव सुखी रह सकता है। संत वेलेन्टाइन ने विवाह को अनिवार्य बताते हुए कहा कि पारिवारिक एकता के लिए ग्रहस्थ धर्म में प्रवेश अति आवश्यक है। जब क्लाडियस(द्वितीय) को यह पता चला तो उन्होंने राजा के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर संत वेलेन्टाइन को गिरफ़्तार करा लिया तथा उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला कर संसार को परिवार बसाने एवं पारिवारिक एकता का संदेश देने वाले इस महान संत को उसके इस कार्य के लिए १४ फरवरी को फांसी की दे दी गई। कुछ वर्षों पश्चात १४ फरवरी को संत वेलेन्टाइन के महान त्याग व बलिदान के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए यह दिवस "वेलेन्टाइन डे" के रूप में मनाया जाने लगा। वर्तमान समय में यह दिवस अपना मूल स्वरूप खोकर वैश्वीकरण की आड़ में विक्रत हो गया है। आज के युवा इस महान पर्व का महत्व व मूल भावना समझे बिना इसे महज़ मनोरंजन एवं स्वच्छंद प्रेमालाप का सुअवसर मानते हुए मनाने लगे हैं जो कि सर्वथा अनुचित है। संत वेलेन्टाइन के प्रति सच्ची श्रद्दांजली यही होगी कि हम १४ फरवरी "वेलेन्टाइन डे" को "पारिवारिक एकता दिवस" के रूप में मनाएं।

-डा.जगदीश गांधी
प्रबंधक, सिटी मान्टेसरी स्कूल
लखनऊ (उ.प्र.)

"हम अपनी माता व परिजनों से मिलना कबूल नहीं करेंगे।"-भगतसिंह


(शहीदे-आज़म भगतसिंह का जेलर को लिखे ख़त का सारांश)-
भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की घोषणा हो चुकी थी। ये तीनों दीवाने अपील करके या क्षमा याचना करके अपने प्राण बचाना नहीं चाहते थे। इसी दौरान फांसी की तिथि नज़दीक आ गई। राजगुरू, सुखदेव और भगतसिंह के परिजन इन तीनों से अंतिम भेंट व दर्शन करने जेल परिसर पहुंचे। इन तीनों क्रांतिकारियों के दर्शन पाने एवं उनसे अंतिम भेंट करने की इच्छा से जेल परिसर में भारी भीड़ एकत्रित हो गई। यहां तक कि कानून व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया। ऐसी स्थिति में अंग्रेज जेलर ने खबर भिजवाई की भीड़ को हम इन तीनों से नहीं मिलने देंगे, चाहें तो इनके परिजन व माताएं इनसे मिल सकतीं हैं।
जब जेल के अंदर भगतसिंह को यह ख़बर लगी तो उसने जेलर को एक चिट्ठी भिजवाई जिसमें लिखा था-"विदा की इस बेला में न कोई हमारा अपना है और न ही पराया। हम अपने घरवालों के लिए फांसी का फंदा चूमने को तैयार नहीं हुए हैं बल्कि देशवासियों के लिए यह रास्ता हमने जानबूझकर चुना है।
जब हमें अपने प्यारे देशवासियों से नहीं मिलने दिया जा रहा है तो हम अपनी माता व परिजनों से मिलना कबूल नहीं करेंगे।"

पिताजी: पारिवारिक परिवेश में

पिताजी के जीवन को मैंने उत्थान व पतन की इस प्रक्रिया के विपरीत पाया। जब उनके द्वारा भगतसिंह महाकाव्य की रचना की जा रही थी तब उन्होंने स्वंय को एक इंकलाबी की तरह रखा। पूरे लेखन-काल में वे जमीन पर एक दरी बिछा कर और एक पतला सा चादर ओढ़कर रातें बिताते थे। लेखन कार्य के दौरान दो रूखी रोटी तथा दाल लेते थे। कभी-कभी उबली हुई सब्जी में नमक डालकर खा लेते थे। पांच-छ: किलोमीटर की यात्रा वे पैदल ही करते थे। येन-केन-प्रकारेण लेखन कार्य पूरा हुआ। अब समस्या प्रकाशन की थी। घर के ड्राइंग-रूम की वस्तुएं तो पहले ही बिक चुकी थीं अब बिकने की बारी मां के ज़ेवरों की थी। जो आभूषण शादी के समय हमारी मां पर चढ़े थे वे आभूषण अब "भगतसिंह" पर चढ़ने की तैयारी करने लगे। प्रकाशन उपरांत "महाकाव्य" हाथ में आया। पर चूंकि वह एक देशभक्त क्रांतिकारी पर लिखा गया था सो सड़कों पर बिकना उसकी नियति थी। भीषण गर्मी में पिताजी ने पुस्तकें ठेले पर लादीं और उन्हें बेचने का सिलसिला शुरू हुआ।
चिलचिलाती धूप से पिघली हुई सड़कों पर ठेले के पहियों की उन लकीरों को देखकर कोई भी ज्योतिषी "भगतसिंह महाकाव्य" और उसके लेखक का भविष्य आसानी से बता सकता था। यही वह समय था जब "श्रीक्रष्ण सरल" के नाम से जाने जानेवाले इस शख़्स को एक इंकलाबी पर कलम चलाने के जुर्म में कई बार अपनी पत्नी और बच्चों सहित भूखा रहना पड़ा।
मैं सबेरे स्कूल जाकर दोपहर के प्रारंभ तक घर लौटता था। इस समय तक बड़े भाई साहब तैयार होकर स्कूल जाते थे। दरअसल वे मेरा नहीं, उन चप्पलों का इंतज़ार करते थे जिन्हें पहनकर मैं स्कूल जाता था। चूंकि उस समय हम दोनों भाईयों के बीच मात्र एक जोड़ा चप्पल ही हुआ करती थी। चप्पलों के आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया को पिताजी बड़ी संजीदगी से देखते थे। किसी देश के नागरिकों को यदि उस देश पर मिटने वाले जांबाजों की गाथाओं से ही अपरिचित रखा जाएगा तो वह गर्व किस पर करेंगे? उनमें अपने वतन के प्रति प्यार कैसे पैदा होगा? वे अपने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति कैसे देंगे?
अनेक आर्थिक व सामाजिक विषमताओं के बावजूद पिताजी ने अपना लेखकीय कर्त्तव्य निभाया है। किसी को हो ना हो, हमारे परिवार के प्रत्येक सदस्य को उन पर गर्व है।
-धर्मेंद्र सरल
(सरलजी के सुपुत्र)

लार्ड मैकाले का भाषण

2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया लार्ड मैकाले का भाषण-

लार्ड मैकाले का मूल भाषण
"मैंने भारत की ओर-छोर की यात्रा की है पर मैंने एक भी आदमी ऐसा नहीं देखा जो भीख माँगता हो या चोर हो। मैंने इस मुल्क में अपार सम्पदा देखी है। उच्च उदात्त मूल्यों को देखा है। इन योग्यता मूल्यों वाले भारतीयों को कोई कभी जीत नहीं सकता यह मैं मानता हूँ, तब तक; जब तक कि हम इस मुल्क की रीढ़ ही ना तोड़ दें, और भारत की रीढ़ है उसकी आध्यात्मिक और साँस्कृतिक विरासत। इसलिए मैं यह प्रस्ताव करता हूँ कि भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था को हम बदल दें। उसकी सँस्कृति को बदलें ताकि हर भारतीय यह सोचे कि जो भी विदेशी है वह बेहतर है। वे यह सोचने लगें कि अंग्रेजी भाषा महान है, अन्य देशी भाषाओं से। इससे वे अपना सम्मान खो बैठेंगे। अपनी देशज जातीय परम्पराओं को भूलने लगेंगे और फिर वे वैसे ही हो जाएँगे जैसा हम चाहते हैं, सचमुच एक आक्रान्त एवं पराजित राष्ट्र।"
-लार्ड मैकाले