
एक ओर जहां मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने देश की पेशानी पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं वहीं दूसरी ओर हमारे राजनेता अपनी नाकामी पर शर्मिंदा होने की बजाय बेहूदा बयानबाज़ियां कर अपने मानसिक दिवालिएपन का परिचय दे रहे हैं। इनमें से कुछ को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा रहा है तो कुछ संगठन में महासचिव जैसे दायित्वों का निर्वाह कर रहे हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने यह कहकर कि "मुंबई बम धमाकों में हिंदू संगठनों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।" देश के लाखों-करोंड़ों हिंदुऒं का अपमान किया है। जिसके लिए उन्हें देशवासियों से क्षमा मांगनी चाहिए। चाहे गोधरा कांड हो, चाहे भट्टा-पारसौल या फिर कहीं बम धमाका हमारे राजनेता कोई कारगर कदम उठाने के बदले उस पर गंदी राजनीति करना शुरू कर देते हैं। सत्तापक्ष की विवशता तो समझ में आती है क्योंकि ना तो वह मंहगाई पर लगाम लगा पा रहा है, ना ही विकास दर में व्रध्दि कर पा रहा है, ना ही घोटालों को रोकने में सक्षम है और ना ही आतंकवाद से निपट पा रहा है इसलिए उसे सत्ता में बने रहने का जो सबसे आसान रास्ता दिखाई दे रहा है वह है अल्पसंख्यक समुदाय को अपने भरोसे में रखना। इसलिए तो अभी तक अफ़ज़ल गुरू को फ़ांसी नहीं दी गई, कसाब को बिरयानी की दावत दी जा रही है पर हमारे विपक्ष का यह मौन समझ से परे है। संसद में अभी तक विपक्ष की कोई हुंकार सुनाई नहीं दी गई, जो थी वह महज़ रस्म अदायगी थी। यहां गौरतलब बात यह भी है कि आज देश में लगभग सभी शीर्ष स्थानों पर महिलाएं विराजमान है तो क्या यह महिला सशक्तीकरण का परचम लहराने वालों के लिए नारी शक्ति की विफलता का संकेत है। बहरहाल जो भी हो इस तरह की घटनाऒं से जो सबसे अधिक खोता है; वह है आम इंसान, वह पिता;जिसका बेटा घर नहीं लौटा, वह पत्नि;जिसकी मांग का सिंदूर हमेशा-हमेशा के लिए पुछ गया, वह बच्चा;जो अनाथ हो गया। हमारे नीति-निर्माताओं को चाहिए कि इस तरह की घटनाओं पर घ्रणित राजनीति ना करते हुए ज़मीनी सच्चाई को समझे और आतंकवाद से निपटने के लिए मिलजुल कर कोई करगर और ठोस रणनीति बनाए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो शायद आने वाली पीढ़ियों को यह कहना पड़ेगा-
"घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले यह तय हो इस घर को बचाएं कैसे?"
-हेमंत रिछारिया




