सोमवार, 4 जून 2018

"समाजसेवी"


कल एक कार्यक्रम में था, वहां कुछ धनाढ्य,प्रभुत्वसम्पन्न,एवं राजनीति से जुड़े व्यक्तियों को "समाजसेवी" बताकर सम्मानित किया जा रहा था। बहुत स्मरण करने पर भी मुझे उनके द्वारा की गई समाज की कोई सेवा जिसे तथाकथित "समाजसेवा" बताया जा रहा था, याद नहीं आई। मैं इसे पूर्णत: मेरी क्षीण होती स्मरणशक्ति का दोष मानता हूं। अत: मैंने अपने निकट बैठे मित्र से कहा कि आगामी कार्यक्रमों जब किसी को वरिष्ठ या कनिष्ठ....क्षमा कीजिए कनिष्ठ तो कोई होता नहीं; जहां कहीं भी "समाजसेवी" पाए जाते हैं वे वरिष्ठ ही होते हैं, तो जब भी किसी व्यक्ति को वरिष्ठ समाजसेवी कहकर सम्मानित किया जाए तो साथ ही साथ उसके द्वारा की गई समाज की महती सेवा का भी उल्लेख किया जाए जिससे मुझ जैसे दुर्बल स्मरणशक्ति वाले लोगों को उसकी समाजसेवा याद करने के लिए अपने मस्तिष्क पर अधिक ज़ोर ना डालना पड़े।

पुनश्च- सोच रहा हूं कि आज यदि स्वनाम-धन्य प्रख्यात व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी जीवित होते तो अपनी लोकप्रिय व्यंग्य रचना "अध्यक्ष महोदय" की तर्ज़ पर ऐसे समाजसेवियों के लिए "समाजसेवी" नामक रचना करते अवश्य करते। रचना का प्रारम्भ कुछ इस प्रकार होता-"प्रत्येक शहर में कुछ 'समाजसेवी' किस्म के लोग पाए जाते हैं.....।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

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