गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

गिरिराज गोवर्धन

हमारे सनातन धर्म में प्रकृति को परमात्मा से अभिन्न माना गया है। इसलिए हमने प्रकृति की भी परमात्मा के रूप में ही आराधना की है। चाहे नदी हो, पर्वत हो या फ़िर वृक्ष, हमने सभी में परमात्मा के रूप का दर्शन किया है। परिक्रमा हमारी सनातन पूजा पद्धति का अहम् हिस्सा है। हिन्दू धर्म में परिक्रमा जिसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है; मन्दिर, देवप्रतिमा, पवित्र स्थानों, नदियों व पर्वतों की भी होती है। कलियुग में गोवर्धन पर्वत जिन्हें गिरिराज भी कहा जाता है उनकी परिक्रमा बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा श्रद्धालुओं के सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली होती है। गोवर्धन पर्वत को योगेश्वर भगवान कृष्ण का साक्षात् स्वरूप माना गया है। गिरिराज गोवर्धन को प्रत्यक्ष देव की मान्यता प्राप्त है। इन्हीं गोवर्धन पर्वत को द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र का मद चूर करने के लिए एवं ब्रजवासियों को इन्द्र के कोप से बचाने के लिए 7 दिनों तक अपने वाम हाथ की कनिष्ठा अंगुली के नख पर धारण किया गया था। कलियुग में गिरिराज गोवर्धन को भगवान कृष्ण का ही साक्षात् स्वरूप मानकर उनकी परिक्रमा की जाती है। गिरिराज गोवर्धन की यह परिक्रमा अनन्त फ़लदायी व पुण्यप्रद होती है। गिरिराज गोवर्धन उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले से लगभग 22 कि.मी की दूरी पर स्थित है। गिरिराज गोवर्धन पर्वत 21 कि.मी के परिक्षेत्र में फ़ैला हुआ है। गिरिराज पर्वत की परिक्रमा 7 कोस अर्थात 21 कि.मी की होती है।
तीन हैं मुखारबिन्द-
गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा वैसे तो कहीं से भी प्रारम्भ की जा सकती है किन्तु मान्यता अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा प्रारम्भ करने हेतु तीन मुखारबिन्द हैं। 
ये तीन मुखारबिन्द हैं-
1. गोवर्धन दानघाटी 2. जतीपुरा 3. मानसी-गंगा
इन तीन मुखारबिन्द में से किसी एक मुखारबिन्द से परिक्रमा प्रारम्भ कर परिक्रमा पूर्ण करने पर वापस उसी मुखारबिन्द पर पहुँचना होता है। किन्तु सभी वैष्णव भक्तजन "जतीपुरा-मुखारबिन्द" से ही अपनी परिक्रमा का प्रारम्भ करते हैं, शेष सभी भक्त गोवर्धन दानघाटी व मानसी-गंगा मुखारबिन्द से अपनी परिक्रमा प्रारम्भ करते हैं। "जतीपुरा-मुखारबिन्द" को श्रीनाथ जी के विग्रह की मान्यता प्राप्त है। गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा में मार्ग में अनेक मठ, मन्दिर, गाँव व पवित्र कुण्ड इत्यादि आते हैं जैसे आन्यौर, राधाकुण्ड, कुसुम सरोवर, गोवर्धन दानघाटी, जतीपुरा, मानसी-गंगा, गौड़ीय मठ एवं "पूँछरी का लौठा" आदि। वैसे तो गिरिराज परिक्रमा वर्षभर अनवरत चलती रहती है किन्तु विशेष पर्व जैसे पूर्णिमा, अधिकमास, कार्तिकमास, श्रावणमास में गोवर्धन परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं की सँख्या में आशातीत वृद्धि हो जाती है।
दण्डवति परिक्रमा-
सामान्यत: गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा पैदल की जाती है किन्तु कुछ श्रद्धालु इसे दण्डवत करते हुए भी करते हैं जिसे "दण्डौति परिक्रमा" कहा जाता है। वृद्धजनों व बच्चों के लिए यहाँ रिक्शे आदि से परिक्रमा करने की भी व्यवस्था है।
शापित भी हैं गिरिराज जी-
एक प्राचीन कथा के अनुसार गिरिराज गोवर्धन शापित हैं। गोवर्धन पर्वत को कलियुग में प्रतिदिन तिल-तिल घटने का श्राप मिला हुआ है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि आज यह श्राप इस क्षेत्र के अतिक्रमणकारियों के कारण पूर्णरूपेण चरितार्थ हो रहा है।
"पूँछरी के लौठा" देते हैं साक्षी-
गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा मार्ग में "पूँछरी का लौठा" नामक स्थान आता है जो राजस्थान में पड़ता है। यहाँ पहलवान को "लौठा" कहा जाता है। यहाँ मन्दिर में श्री हनुमान जी का विग्रह स्थापित है। प्राचीन कथा अनुसार जब भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत के इस क्षेत्र में गोचारण के लिए आते थे तब श्री हनुमान जी उनके साथ खेला करते थे। दोनों साथ-साथ भोजन व बातें किया करते थे। किन्तु जब भगवान कृष्ण की लीला पूर्ण होकर उनके बैकुण्ड गमन का समय आया तो हनुमान जी उदास हो गए और उनके विरह में दु:खी होकर कहने लगे कि आप तो अपने धाम जा रहे हो लेकिन मैं अकेला हो जाऊँगा। क्योंकि हनुमान जी अमर हैं। हनुमान जी की इस बात पर भगवान कृष्ण ने उन्हें आश्वस्त किया कि कलियुग में गिरिराज गोवर्धन को मेरा साक्षात् स्वरूप मानकर इसकी परिक्रमा की जाएगी और यह परिक्रमा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब आप स्वयं इसकी साक्षी देंगे। आपके दर्शनों के बिना गोवर्धन परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाएगी इससे आपके पास सदैव भक्तों की चहल-पहल रहा करेगी। इसी मान्यता के अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करते समय प्रत्येक श्रद्धालु व भक्त यहाँ दर्शन कर अपनी साक्षी दिलाने आते हैं। "पूँछरी के लौठा" अर्थात् हनुमान जी के दर्शन व साक्षी के उपरान्त प्रारम्भ वाले मुखारबिन्द पर पहुँचकर परिक्रमा की समाप्ति की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में वर्ष में एक बार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

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