शनिवार, 24 मार्च 2018

राम का वनवास, ज्योतिष का दोष कहाँ ?


प्रभु श्रीराम के जीवन में जो बात सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है; वह है उनका अपने अनुज भरत के लिए राज्य का त्याग कर वनवास जाना। कुछ विद्वान उनके वनवास गमन को लेकर उनकी जन्मपत्रिका और गुरू वशिष्ठ द्वारा की गई उनके राज्याभिषेक की सँस्तुति को दोषी ठहराते हैं। वे अपने इस तथ्य के समर्थन में रामचरितमानस की इन पँक्तियों का उदाहरण देते हैं-
"जोग,लगन,ग्रह,वार,तिथि, सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल।"
इन पँक्तियों को आधार बनाकर अक्सर लोग ज्योतिष का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि जब सभी कुछ अनुकूल था जो प्रभु श्रीराम के जीवन में इतने कष्ट क्यों आए? जबकि इस प्रकार का तर्क सर्वथा अनुचित है क्योंकि यदि आप उक्त पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो पाएँगे कि "योग, लगन, ग्रह, वार" का अनुकूल होना यहाँ भगवान श्रीराम के परिप्रेक्ष्य में नहीं कहा गया है, यहाँ यह बात समस्त जड़ व चेतन के परिप्रेक्ष्य में कही गई है। यहाँ दूसरी पँक्ति स्पष्ट सँकेत करती है कि "चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल।" अर्थात् समस्त जड़ और चेतन के लिए योग,लग्न,ग्रह,वार सभी कुछ अनुकूल हो जाते हैं जब भगवान राम का जन्म अर्थात् प्राकट्य होता है क्योंकि प्रभु श्रीराम का जन्म समस्तों सुखों का मूल है।
ज्योतिष को सन्देह के घेरे में लाने हेतु दूसरा तर्क प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक के मुहूर्त्त को लेकर दिया जाता है कि जब गुरू वशिष्ठ ने भगवान के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला था तो उन्हें राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास क्यों जाना पड़ा? यह तर्क भी सरासर अनुचित है क्योंकि गुरू वशिष्ठ ने कभी श्रीराम के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला ही नहीं था। रामचरितमानस की ये पँक्तियाँ देखें-
"यह विचार उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥"
अर्थात राजा दशरथ ने अपने मन में प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक का विचार कर शुभ दिन और उचित समय पाकर अपना यह विचार गुरू वशिष्ठ जी को जाकर सुनाया था। यहा शुभदिन और सुअवसर का उल्लेख वशिष्ठ जी के पास जाने के समय के सन्दर्भ में है, ना कि भगवान राम के राज्याभिषेक के सम्बन्ध में। जब राजा दशरथ वशिष्ठ जी से मिलने पहुचे तब गुरू वशिष्ठ ने उनसे कहा-
"अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेऊ नरेस रजायसु देहू॥
अर्थात राजा का सहज प्रेम देखकर वशिष्ठ जी ने उनसे राजाज्ञा देने को कहा। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुरू अनहोनी का संकेत कर सकता है किन्तु राजाज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ भी गुरू वशिष्ठ संकेत करते हुए कहते हैं-
"बेगि बिलम्बु करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
 सुदिन सुमंगलु तबहिं जब राम होहिं जुबराजु॥"
अर्थात् शुभदिन तभी है जब राम युवराज हो जाएँ। यहाँ वशिष्ठ जी ने यह नहीं कहा कि राम ही युवराज होंगे। आगे एक और संकेत में कहा गया है-
"जौं पाँचहि मत लागै नीका, करहु हरषि हियैं रामहि टीका।"
अर्थात् यदि पंचों कों (आप सब को) यह मत अच्छा लग रहा है तो राम का राजतिलक कीजिए।
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि गुरू वशिष्ठ ने केवल राजाज्ञा और जनमत के वशीभूत होकर प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की सहमति प्रदान की थी ना कि भगवान राम की जन्मपत्रिका व पँचांग इत्यादि देखकर मुहूर्त्त निकाला था। ऐसे में रामचरितमानस की इन पँक्तियों का गूढ़ अर्थ समझे बिना इन्हें आधार बनाकर ज्योतिष शास्त्र को दोष किस प्रकार दिया जा सकता है! प्रभु श्रीराम के वनवास के लिए ज्योतिष शास्त्र को दोष देना सर्वथा अनुचित व गलत है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

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