रविवार, 21 जनवरी 2018

प्रेम तो आनन्द स्वरूप है


आज से लगभग एक वर्ष पूर्व एक छात्र ने आत्महत्या की थी। मीडिया ने उसके लिखे सुसाइड नोट को दिखाया था। उस सुसाइड नोट की एक लाईन मेरे ज़ेहन में कुछ अटक सी गई - "यह बेहद कठिन है कि हम प्रेम करें और हमें दर्द ना मिले।" आज अधिकतर लोगों को शायद यह लाईन अपनी ज़िंदगी में घटित होती हुए लगे, लेकिन मेरे देखे प्रेम और दर्द का दूर-दूर का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह हो ही नहीं सकता कि आप प्रेम करें और आपको दर्द मिले। यदि दर्द मिल रहा है तो आप प्रेम नहीं कर रहे हैं। वर्तमान दौर में प्रेम के नाम सबकुछ किया जा रहा है बस प्रेम नहीं किया जा रहा है। शब्दों की अपनी मज़बूरी है जैसे मैंने कहा कि आप प्रेम करें और आपको दर्द मिले यह हो ही नहीं सकता, अब इसमें कुछ लोग कह सकते हैं कि फ़िर विरह के दर्द का क्या होगा? तो मैंने कहा कि शब्दों की अपनी मज़बूरी है वास्तविक रूप में तो प्रेम में जो विरह होता है वह भी आनन्ददायक ही होता है। इसलिए तो राष्ट्रकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में परमात्मा के दरवाज़े से बच निकलते हैं क्योंकि उन्हें मिलन के आनन्द की अपेक्षा विरह की टीस अधिक प्रिय लगती है। मेरा बस यही कहना है कि यह हो सकता है आपको जीवन में दर्द मिला हो लेकिन उसके लिए प्रेम को उत्तरदायी ठहराना अनुचित है क्योंकि आज अधिकतर लोग प्रेम शब्द से तो परिचित हैं किन्तु प्रेम से अपरिचित। मैं जीसस को याद करूं जिन्होंने कहा था "प्रेम ही परमात्मा है" और परमात्मा आनन्द स्वरूप है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

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