गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

जय हो नर्मदा मैया...


वाह रे वाह मेरे भैया, जय हो नर्मदा मैया...
खोद दिया नगर सारा नर्मदाजल के नाम पर,
जनता को हैं लूट रहे थोथे विकास के काम पर।
पहले ही क्या माँ रेवा का आँचल साफ़-स्वच्छ रहा है!
शहर के गन्दे नालों का पानी निर्बाध उसमें बहा है।
अब वही दूषित जल जनता को पिलाओगे
हाय! नर्मदाजल घर के शौचालयों में डलवाओगे
माँ रेवा की खोह तो आज तक ना भरने पाई
रेत खोदने लेकिन तट पर मशीनें चलवाईं
इस पर भी अच्छे दिनों का दे रहे झूठा दिलासा
भ्रष्टाचार हुआ कितना बाद में होगा खुलासा
विकास हेतु निरीह जनों के सिर पर कर चढ़ा है
रातों-रात झट से देखो सम्पत्ति-कर बढ़ा है
कौन जाने विकास या विनाश की ये परिभाषा
जनता समझ ना पाती है राजनीति की भाषा
बस निवेदन है इतना चैन से जन को रहने दो
माँ रेवा का जल उसके अंक में कलकल बहने दो
शिखर चढ़ी धूल भी क्षण भर को तो इठलाती है
पवन के इक झोंके से लेकिन धूलधूसरित हो जाती है
फिर लोकतन्त्र में "दिनकर" की कविता पुन: दुहराती है
"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया

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