शनिवार, 23 दिसंबर 2017

’अप्पा सो परमप्पा‌’


आज बुद्ध और महावीर के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई। बुद्ध और महावीर दोनों ही ने परमात्मा को इनकार कर दिया था। महावीर ने तो यहाँ तक कहा कि -"अप्पा सो परमप्पा" अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। वहीं बुद्ध का प्रसिद्ध वचन है -"अप्प दीपो भव:" अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। बौद्ध और जैन दोनों ही दर्शनों में आत्मा के ऊपर किसी आकाशीय परमात्मा स्वीकार नहीं है। मेरे देखे यह उचित ही है। हमारे सनातन धर्म में आत्मा के ऊपर परमात्मा को स्वीकार किया गया है। इसका आशय यह नहीं कि बुद्ध और महावीर परमात्म तत्व से अपरिचित थे, नहीं.. कदापि नहीं, वे भलीभाँति परिचित थे किन्तु उन्होंने जनमानस को आत्मा पर ही रोके रखा क्योंकि वे जानते थे कि जो आत्मा को जानने में सक्षम हो गया वह परमात्मा से साक्षात्कार कर ही लेगा। यदि आत्मा को जाने बिना परमात्मा को समझने का प्रयास किया तो वह झूठ होगा। वर्तमान में हमारे कई तथाकथित साधु-सन्तों द्वारा अपने निजी स्वार्थ व लाभ के लिए परमात्मा के नाम पर झूठ को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया गया है। आखिर ये कैसे सम्भव है कि देश में धर्मगुरूओं व धार्मिक आयोजनों में निरन्तर वृद्धि होती रहे और समाज आध्यात्मिक रूप से कँगाल होता रहे? इस समस्या का मुख्य कारण है परमात्मा के नाम पर फ़ैलाया गया झूठ और फ़रेब। जब तक असल प्रचलन में है तभी तक नकल की सँभावना होती है जब असल ही विदा हो जाता है तो समाज में नकल का कोई स्थान नहीं रहता। ये हमने अभी कुछ ही वर्षों पूर्व "विमुद्रीकरण" (नोटबन्दी) के रूप देख लिया है। बुद्ध और महावीर ने यही किया था, मनुष्य से उसका आकाशीय परमात्मा छीन कर उसे उसी के अन्दर प्रतिष्ठित आत्मा पर ला खड़ा किया था। क्योंकि जब परमात्मा से ही इनकार कर दिया जावेगा तो कोई व्यक्ति, बाबा या सन्त अपने परमात्मा होने का दावा करेगा कैसे! स्वर्ग-नर्क की बात तो फ़िर बेमानी ही समझिए, जिसके नाम पर लोगों को डराया या प्रलोभन दिया जाता है। यहाँ मुझे स्मरण आता है प्रबुद्ध महिला सन्त राबिया का जो सदैव अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में पानी का पात्र रखती थी और पूछने पर कहती थी कि "मैं मशाल से स्वर्ग में आग लगा दूँगी और नर्क को पानी में डुबो दूँगी। आशय बहुत स्पष्ट है कि स्वर्ग-नर्क, परमात्मा के नाम पर जो खेल चल रहा है उसे समाप्त करना ही सच्चे सन्त का लक्षण है। जो धर्मगुरू धर्म के नाम पर झूठ के इस जाल को काटने के स्थान पर और अधिक बुनता है उसे धर्मगुरू या उपदेशक कहना सर्वथा अनुचित है। जब तक ऐसे तथाकथित धर्मगुरू व उपदेशक समाज में रहेंगे तब तक आम आदमी का इस प्रकार के फ़र्जी बाबाओं के चँगुल से मुक्त हो पाना मुश्किल है।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया


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