शनिवार, 18 नवंबर 2017

’पद्मावती" का रण


किरीतार्जुन शास्त्र का एक वाक्य है- "यद्यपि शुद्धम् लोकविरूद्धम् ना करणीयम् ना आचरणीयम्" अर्थात् यदि कोई बात सत्य व शुद्ध भी हो लेकिन समाज के विरुद्ध हो तो उसे व्यवहार में नहीं लाना चाहिए। इन दिनों संजय लीला भंसाली की फ़िल्म को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। राजपूत समाज, राजपरिवार व करणी सेना सहित कई क्षत्रिय संगठन इस फ़िल्म का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। क्षत्रिय संगठनों का उनका आरोप है कि भंसाली ने उनके इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया है वहीं फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली इस बात से साफ़ इनकार कर रहे हैं। बहरहाल, ताज़ा जानकारी के अनुसार सेंसर बोर्ड ने भंसाली का आवेदन अधूरा होने के कारण फ़िल्म को वापस लौटा दिया है। सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली के अनुसार अब फ़िल्म को जनवरी 2018 में प्रमाण-पत्र मिलने की उम्मीद है। इसका मतलब यह हुआ कि फ़िल्म "पद्मावती" अब जनवरी 2018 में ही रिलीज़ हो पाएगी। फ़िल्म रिलीज़ होगी भी या नहीं यह सेंसर बोर्ड को तय करना है लेकिन इससे पूर्व कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म "पद्मावती" को बनाने के पीछे उद्देश्य क्या है? क्योंकि कुछ पत्रकार व विद्वान बार-बार कह रहे हैं कि जौहर का महिमामण्डन नहीं होना चाहिए। जहाँ तक रानी "पद्ममिनी" की प्रसिद्धि का प्रश्न है तो उनकी प्रसिद्धि ही जौहर (वीरतापूर्वक आत्मबलिदान) के कारण है फ़िर तो भंसाली स्वयं जौहर का महिमामण्डन कर रहे हैं। फ़िल्म कोई नवीन ऐतिहासिक जानकारी भी प्रदान नहीं करती। रानी "पद्ममिनी" की कहानी सभी को पता है। वहीं फ़िल्म (जैसा कि ट्रेलर देखकर लगा) रानी "पद्ममिनी" की गरिमा को कम अवश्य करती नज़र आ रही है। इस फ़िल्म को लेकर देश के साथ-साथ बालीवुड भी दो धड़ों में बँटा नज़र आ रहा है। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ लोग विरोध। इसके समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि फ़िल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्ममिनी का कोई दृश्य नहीं है। यह बात भले ही सत्य हो लेकिन जैसा फ़िल्म के ट्रेलर में दिखाया जा रहा है उसे देखकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कोई समाज या स्वयं इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपने पूर्वजों का प्रणय-दृश्य देखना पसन्द करेंगे? नहीं ना...। कोई भी सभ्य व्यक्ति या समाज अपने आराध्य व मान्य पूर्वजों का "प्रणय-दृश्य" देखना पसन्द नहीं करेगा। अलाउद्दीन खिलजी के साथ रानी पद्ममिनी के दृश्यों की बात बहुत दूर की है। जहाँ तक राजपरिवारों की गरिमा व मर्यादा की बात है तो "पद्ममिनी" का अभिनय करने वाली अभिनेत्री के राजा रतनसिंह का चरित्र निभाने वाले अभिनेता के साथ दिखाए गए "प्रणय-दृश्य" भी आपत्तिजनक है। यदि भंसाली की नीयत इतनी ही साफ़ थी तो उन्होंने सेंसर बोर्ड को दिए अपने आवेदन-पत्र में फ़िल्म के "ऐतिहासिक या काल्पनिक" वाला स्थान (कालम) रिक्त क्यों छोड़ा? वे इस फ़िल्म को एक "काल्पनिक" फ़िल्म बताकर विवाद समाप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब आप किसी के पूर्वजों पर फ़िल्म बनाते हैं तो उनकी सहमति आवश्यक है। क्योंकि आप इतिहास से छेड़छाड़ करने के अधिकारी नहीं हैं फ़िर चाहे वह इतिहास किसी देश का हो या किसी राजपरिवार का। मेरे देखे अब समय आ गया है कि इस प्रकार की फ़िल्मों के लिए सेंसर बोर्ड के अन्तर्गत उप-समीतियाँ गठित होनी चाहिए। जैसे इतिहासकारों की समीति, धर्मगुरूओं की समीति...क्योंकि इन मुद्दों पर आधारित फ़िल्मों की पटकथा को परखने के लिए इन क्षेत्रों के विद्वानों की राय व अनुशंसा महत्त्वपूर्ण है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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