गुरुवार, 9 नवंबर 2017

चाहत

तुम मुझसे बात न करो
और मैं तुमसे मिल न पाऊँ
इसकी रत्ती भर शिकायत नहीं मुझे
लेकिन, कम से कम इतना तो चाहती हूँ
कि तुम्हारी गँध इन हवाओं में बरकरार रहे,
तुम्हारा स्पर्श यूँ ही छूता रहे,
फ़ूलों, दरख़्तों, छायाओं, लहरों पर।
तुम्हारी मन्द मुस्कान और आँखों की नमी,
चाँद-तारों सी टँकी रहे आसमान पर,
तुम्हारी थिरकती उँगलियों से
उठती हुई ताल बजती रहे,
मेरे आस-पास।
तुम्हारा गीत गूँजता रहे दिशाओं में,
बस...इतना ही तो चाहती हूँ मैं।

-रोज़लीन, करनाल (हरियाणा)

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