रविवार, 24 सितंबर 2017

काम उर्जा का उर्ध्वगमन हो, दमन नहीं


विगत कुछ वर्षों से जितने भी फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे गए हैं उनमें से अधिकाँश पर यौन शोषण के आरोप हैं। धर्म-जगत् से जुड़े व्यक्तियों पर यौन शोषण व बलात्कार जैसे आरोप यह सिद्ध करते हैं कि हमने ब्रह्मचर्य की गलत परिभाषा गढ़ रखी है। हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मचर्य से आशय काम-शक्ति के उर्ध्वगमन से है, ना कि काम-शक्ति के दमन से। ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते समय अधिकाँश तथाकथित धर्मोपदेशक काम उर्जा के दमन की सीख देते नज़र आते हैं। हमें यह समझना होगा कि काम एक उर्जा है जिसका किसी भी परिस्थिति में दमन नहीं किया जा सकता। इस उर्जा के सदुपयोग का एकमात्र उपाय इसका सम्यक् रूपान्तरण ही है। काम उर्जा का केवल उर्ध्वगमन ही किया जा सकता है अन्यथा उसका बहिर्गमन सुनिश्चित है, जो स्वाभाविक है। किन्तु जब हम इस उर्जा के स्वाभाविक बहिर्गमन को रोक कर इसका दमन करते हैं तब यह उर्जा विकृत होती है और एक दिन इस दमित उर्जा का विस्फ़ोट हो जाता है। काम उर्जा का यह विस्फ़ोट सामाजिक अराजकता का मुख्य कारण है। वर्तमान समय में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। इसके पीछे वैसे तो कई कारण है लेकिन सबसे अहम् कारण यौन शिक्षा का अभाव एवं काम उर्जा का दमन है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि हम अमर्यादित काम उर्जा के निर्गमन को मान्यता दें, नहीं; कदापि नहीं। वर्तमान समय में तो काम उर्जा के रूपान्तरण एवं उर्ध्वगमन की महती आवश्यकता है क्योंकि आज आध्यात्मिक जगत् भी इस दमित काम उर्जा के विस्फोट के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष असर हमारे सनातन धर्म पर पड़ रहा है। आज कुछ अपराधियों के कारण समूचे सन्त समाज व साधकों को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। धर्म-जगत् से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों के आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त होने के कारण आज धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं में श्रद्धा एवं विश्वास कम हो रहा है। यदि समय रहते धर्म-जगत् का यह प्रदूषण समाप्त नहीं किया गया तो भविष्य में इसके दुष्प्रभावों को रोकना असम्भव हो जाएगा। आज आवश्यकता है ऐसे सन्तों की जो एक देशना की भान्ति समाज के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर सकें। जिनका समूचा जीवन ही एक उपदेश हो। जो ध्यान-धारणा-समाधि से सुपरिचित हों और अपने अनुयायियों व साधकों को भी इन साधनाओं में अग्रसर करने में सक्षम हों। वर्तमान समय में जब सूचना-क्रान्ति के चलते मोबाईल एवं इंटरनेट जैसे साधनों से सभी प्रकार की बातें सहज सुलभ हैं, ध्यान एवं भक्ति ही वे दो मार्ग हैं जिनसे अमर्यादित कामोपभोग जैसी दुष्प्रवृत्तियों से बचा जा सकता है। ध्यान और भक्ति के आधार पर ही हम इस प्रकृति-प्रदत्त काम उर्जा का सम्यक् उपयोग करने में सफल हो सकते हैं। अत: काम उर्जा का दमन नहीं वरन् उर्ध्वगमन करने का प्रयास करें।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
 
"किल्पर टाइम्स" रायपुर (छग) में प्रकाशित हमारा लेख


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