शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

अप्प दीपो भव:




लोग खुश हैं कि एक फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे पहुँच गया। लेकिन जब तक हम धर्म के नाम पर रुढ़ और अन्धभक्त बने रहेंगे तब ऐसे बाबा पैदा होते रहेंगे। दरअसल, हम धर्म और शास्त्रों के नाम पर इतने भीरू होते हैं कि हमें इनका नाम लेकर कोई भी बरगला सकता है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। इस बात को सदैव स्मरण रखें कि आपके और परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। फ़िर आप कहेंगे कि गुरू का क्या महत्त्व? मेरे देखे गुरू का महत्त्व बस इतना ही है कि वह आपको यह समझा दे कि आपके और आपके परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं, स्वयं उसकी भी नहीं। वास्तविक गुरू अपने शिष्य को हर अटकाव; हर बाधा से मुक्त करता है जो उसे परमात्मा तक पहुँचने में आती है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं- "अप्प दीपो भव:।" जब ऐसे गुरू जीवन में होंगे तभी बुद्धत्व घटित होगा अन्यथा बुद्धू तो लोग बन ही रहे हैं, धर्म के नाम पर।

-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया

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