शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

एक सेनानी का संघर्ष

श्री गौर हरिदास जी अपनी धर्मपत्नि के साथ
न्याय व सम्मान यदि उचित समय पर ना मिलें तो वे अपना मूल्य खो देते हैं। आज हमारे देश में ऐसे हज़ारों उदाहरण मौजूद हैं जिनमें देरी से मिले न्याय व सम्मान ने अपना मूल्य खो दिया। अपनी गौरवपूर्ण पहचान व सम्मान को प्राप्त करने के लिए किए ऐसे ही एक सँघर्ष का नाम है- स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी श्री गौर हरिदास। जिन्हें स्वयं को स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी साबित करने में तीस वर्ष से भी अधिक का समय लगा। श्री गौर हरिदास जी ने स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए सन् 1976 में आवेदन दिया था जो उन्हें हमारे आजाद देश की लचर व्यवस्थाओं के चलते 33 वर्षों बाद सन् 2009 में प्राप्त हुआ। 85 वर्षीय श्री गौर हरिदास पाँच वर्षों तक स्वतन्त्रता आन्दोलन का हिस्सा रहे थे। वानर सेना के सदस्य के रूप में वे छिपकर स्वतन्त्रता सँग्राम से सम्बन्धित साहित्य और सन्देशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे। सन् 1945 में उन्होंने अंग्रेज़ों के आदेश के ख़िलाफ़ भारत का झण्डा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े थे। ओडिशा में पैदा हुए श्री गौर हरिदास तेरह भाई-बहनों में दूसरी सन्तान थे। उनके पिता गाँधीवादी थे और अपने पिता से ही उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली। श्री गौर हरिदास जी ने 'ख़ादी ग्रामोद्योग आयोग' में लम्बे समय तक कार्य किया। श्री गौर हरिदास जी का सँघर्ष तब शुरू हुआ जब उन्हें अपने पुत्र को एक सँस्थान में प्रवेश दिलाने के लिए स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता महसूस हुई। स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र के लिए श्री गौर हरिदास जी ने आवेदन दिया जो उन्हें विभिन्न सरकारी कार्यालयों व मन्त्रालय के चक्कर लगाने के उपरान्त 33 वर्षों बाद प्राप्त हुआ। उनके बेटे को तो अपनी प्रतिभा के आधार पर उस सँस्थान में प्रवेश मिल गया लेकिन श्री गौर हरिदास जी का जीवन अपनी गौरवपूर्ण पहचान पाने के लिए एक लम्बे सँघर्ष में बदल गया। एक ऐसा सँघर्ष जिसमें ना कोई धरना-प्रदर्शन था; ना ही कोई नारा था; यदि था, तो बस श्री गौर हरिदास जी के हाथों में अपनी फ़ाईलों का एक बण्डल जिसे लेकर वह अत्यन्त शान्तिपूर्ण ढँग से एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक वर्षानुवर्ष भटकते रहे। सम्मान से कहीं अधिक यह स्वयं की पहचान की लड़ाई थी। वर्ष 2009 में स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के साथ श्री गौर हरिदास जी के सँघर्ष को तो विराम लग गया लेकिन इस सँघर्ष ने उनसे उनके जीवन के कई अनमोल पल छीन लिए जो उन्हें अब कभी प्राप्त नहीं होंगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
  सम्पादक

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