शनिवार, 30 सितंबर 2017

विसर्जन का महत्त्व



आज देवी-विसर्जन के साथ ही नौ दिनों से चले आ रहे शारदीय नवरात्र समाप्त जाएँगे। हमारी सनातन परम्परा में विसर्जन का विशेष महत्त्व है। विसर्जन अर्थात् पूर्णता, फ़िर चाहे वह जीवन की हो, साधना की हो या प्रकृति की। जिस दिन कोई वस्तु पूर्ण हो जाती है उसका विसर्जन अवश्यंभावी हो जाता है। आध्यात्मिक जगत् में विसर्जन समाप्ति की निशानी नहीं अपितु पूर्णता का सँकेत है। देवी-विसर्जन के पीछे भी यही गूढ़ उद्देश्य निहित है। हम शारदीय नवरात्र के प्रारम्भ होते ही देवी की प्रतिमा बनाते हैं, उसे वस्त्र-अलँकारों से सजाते हैं। नौ दिन तक उसी प्रतिमा की पूर्ण श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और फ़िर एक दिन उसी प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। विसर्जन का यह साहस केवल हमारे सनातन धर्म में ही दिखाई देता है क्योंकि सनातन धर्म इस तथ्य से परिचित है कि आकार तो केवल प्रारम्भ है और पूर्णता सदैव निराकार होती है। यहाँ निराकार से आशय आकारविहीन होना नहीं अपितु सम्रगरूपेण आकार का होना है। निराकार अर्थात् जगत के सारे आकार उसी परामात्मा के हैं। मेरे देखे निराकार से आशय है किसी एक आकार पर अटके बिना समग्ररूपेण आकारों की प्रतीती। जब साधना की पूर्णता होती है तब साधक आकार-कर्मकाण्ड इत्यादि से परे हो जाता है। तभी तो बुद्धपुरूषों ने कहा है "छाप तिलक सब छीनी तोसे नैना मिलाय के...।" नवरात्र के यह नौ दिन इसी बात की ओर सँकेत हैं कि हमें अपनी साधना में किसी एक आकार पर रूकना या अटकना नहीं है अपितु साधना की पूर्णता करते हुए हमारे आराध्य आकार को भी विसर्जित कर निराकार की उपलब्धि करना है। जब इस प्रकार निराकार की प्राप्ति साधक कर लेता है तब उसे सृष्टि के प्रत्येक आकार में उसी एक के दर्शन होते हैं जिसे आप चाहे तो परमात्मा कहें या फ़िर कोई और नाम दें, नामों से उसके होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। साधना की ऐसी स्थिति में उपनिषद् का यह सूत्र अनुभूत होने लगता है-"सर्व खल्विदं ब्रह्म" और यही परमात्मा का एकमात्र सत्य है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

मन रूपी रावण का दहन हो


आज विजयादशमी है। असत्य पर सत्य की; बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। विजयादशमी के ही दिन मर्यादा पुरूषोत्तम् भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसी दिन को स्मरण करने लिए प्रतिवर्ष हम विजयादशमी का उत्सव मनाते हैं जिसमें रावण के पुतले का दहन किया जाता है। रावण के पुतले के दहन के साथ हम यह कल्पना करते हैं कि आज सत्य की असत्य पर जीत हो गई और अच्छाई ने बुराई को समाप्त कर दिया। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है! सनातन धर्म की यह परम्पराएँ केवल आँख मूँद कर इनकी पुनुरुक्ति करने के लिए नहीं हैं। बल्कि यह परम्पराएँ तो हमें इनके पीछे छिपे गूढ़ उद्देश्यों को स्मरण रखने एवं उनका अनुपालन करने के लिए बनाई गई हैं। आज हम ऐसी अनेक सनातनधर्मी परम्पराओं का पालन तो करते हैं किन्तु उनके पीछे छिपी देशना एवं शिक्षा को विस्मृत कर देते हैं। हमारे द्वारा इन सनातनी परम्पराओं का अनुपालन बिल्कुल यन्त्रवत् होता है। विजयादशमी भी ऐसी एक परम्परा है। जिसमें रावण का पुतला दहन किया जाता है। रावण प्रतीक है अहँकार का; रावण प्रतीक है अनैतिकता का; रावण प्रतीक है सामर्थ्य के दुरुपयोग का एवं इन सबसे कहीं अधिक रावण प्रतीक है- ईश्वर से विमुख होने का।  रावण के दस सिर प्रतीक हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अवगुणों के। रावण इन सारे अवगुणों के मिश्रित स्वरूप का नाम है। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह प्रकाण्ड विद्वान था। किन्तु उसकी यह विद्वत्ता भी उसके स्वयं के अन्दर स्थित अवगुण रूपी रावण का वध नहीं कर पाई। तब वह ईश्वर अर्थात् प्रभु श्रीराम के सम्मुख आया। मानसकार ने ईश्वर के बारे में कहा है-"सन्मुख होय जीव मोहि जबहिं। जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं॥ इसका आशय है जब जीव मेरे अर्थात् ईश्वर के सम्मुख हो जाता है तब मैं उसके जन्मों-जन्मों के पापों का नाश कर देता हूँ। हम मनुष्यों में और रावण में बहुत अधिक समानता है। यह बात स्वीकारने में असहज लगती है, किन्तु है यह पूर्ण सत्य। हमारी इस पञ्चमहाभूतों से निर्मित देह में मन रूपी रावण विराजमान है। इस मन रूपी रावण के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वासना,भ्रष्टाचार, अनैतिकता इत्यादि दस सिर हैं। यह मन रूपी रावण भी ईश्वर से विमुख है। जब इस मन रूपी रावण का एक सिर कटता है तो तत्काल उसके स्थान पर दूसरा सिर निर्मित हो जाता है। ठीक इसी प्रकार हमारी भी एक वासना समाप्त होते ही तत्क्षण दूसरी वासना तैयार हो जाती है। हमारे मन रूपी रावण के वध हेतु हमें भी राम अर्थात् ईश्वर की शरण में जाना ही होगा। जब हम ईश्वर के सम्मुख होंगे तभी हमारे इस मनरूपी रूपी रावण का वध होगा। विजयादशमी हमें इसी सँकल्प के स्मरण कराने का दिन है। आईए हम प्रार्थना करें कि प्रभु श्रीराम हमारे मन स्थित रावण का वध कर हमें अपने श्रीचरणों में स्थान दें। जिस दिन यह होगा उसी दिन हमारे लिए विजयादशमी का पर्व सार्थक होगा।
 
-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

दुर्गा महोत्सव 2017-


बुधवार, 27 सितंबर 2017

सुरक्षा श्रेणी



1.    SPG :  Special Protection Group Gaurds.


2.      Z+ :  Security cover of 55 Personal.
                 Including [10+ Commando]
                 +[ Police  Personnel ]

3.     Z   :  Security cover of 22 Personal.
                Including [4 or 5 NSG Commando]
                +[ Police  Personnel ]

4.    Y :   Security cover of 11 Personal.
               Including [1 or 2 Commando]
              +[ Police  Personnel ]


5.    X  :  Security cover of 5 or 2 Personal.
              [ NO Commando ]
              [Only Armed Police Personnel ]    


(source: wikipedia)   

रविवार, 24 सितंबर 2017

काम उर्जा का उर्ध्वगमन हो, दमन नहीं


विगत कुछ वर्षों से जितने भी फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे गए हैं उनमें से अधिकाँश पर यौन शोषण के आरोप हैं। धर्म-जगत् से जुड़े व्यक्तियों पर यौन शोषण व बलात्कार जैसे आरोप यह सिद्ध करते हैं कि हमने ब्रह्मचर्य की गलत परिभाषा गढ़ रखी है। हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मचर्य से आशय काम-शक्ति के उर्ध्वगमन से है, ना कि काम-शक्ति के दमन से। ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते समय अधिकाँश तथाकथित धर्मोपदेशक काम उर्जा के दमन की सीख देते नज़र आते हैं। हमें यह समझना होगा कि काम एक उर्जा है जिसका किसी भी परिस्थिति में दमन नहीं किया जा सकता। इस उर्जा के सदुपयोग का एकमात्र उपाय इसका सम्यक् रूपान्तरण ही है। काम उर्जा का केवल उर्ध्वगमन ही किया जा सकता है अन्यथा उसका बहिर्गमन सुनिश्चित है, जो स्वाभाविक है। किन्तु जब हम इस उर्जा के स्वाभाविक बहिर्गमन को रोक कर इसका दमन करते हैं तब यह उर्जा विकृत होती है और एक दिन इस दमित उर्जा का विस्फ़ोट हो जाता है। काम उर्जा का यह विस्फ़ोट सामाजिक अराजकता का मुख्य कारण है। वर्तमान समय में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। इसके पीछे वैसे तो कई कारण है लेकिन सबसे अहम् कारण यौन शिक्षा का अभाव एवं काम उर्जा का दमन है। इसका यह आशय कतई नहीं है कि हम अमर्यादित काम उर्जा के निर्गमन को मान्यता दें, नहीं; कदापि नहीं। वर्तमान समय में तो काम उर्जा के रूपान्तरण एवं उर्ध्वगमन की महती आवश्यकता है क्योंकि आज आध्यात्मिक जगत् भी इस दमित काम उर्जा के विस्फोट के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहा है। इसका प्रत्यक्ष असर हमारे सनातन धर्म पर पड़ रहा है। आज कुछ अपराधियों के कारण समूचे सन्त समाज व साधकों को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। धर्म-जगत् से सम्बन्धित कुछ व्यक्तियों के आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त होने के कारण आज धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं में श्रद्धा एवं विश्वास कम हो रहा है। यदि समय रहते धर्म-जगत् का यह प्रदूषण समाप्त नहीं किया गया तो भविष्य में इसके दुष्प्रभावों को रोकना असम्भव हो जाएगा। आज आवश्यकता है ऐसे सन्तों की जो एक देशना की भान्ति समाज के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर सकें। जिनका समूचा जीवन ही एक उपदेश हो। जो ध्यान-धारणा-समाधि से सुपरिचित हों और अपने अनुयायियों व साधकों को भी इन साधनाओं में अग्रसर करने में सक्षम हों। वर्तमान समय में जब सूचना-क्रान्ति के चलते मोबाईल एवं इंटरनेट जैसे साधनों से सभी प्रकार की बातें सहज सुलभ हैं, ध्यान एवं भक्ति ही वे दो मार्ग हैं जिनसे अमर्यादित कामोपभोग जैसी दुष्प्रवृत्तियों से बचा जा सकता है। ध्यान और भक्ति के आधार पर ही हम इस प्रकृति-प्रदत्त काम उर्जा का सम्यक् उपयोग करने में सफल हो सकते हैं। अत: काम उर्जा का दमन नहीं वरन् उर्ध्वगमन करने का प्रयास करें।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
 
"किल्पर टाइम्स" रायपुर (छग) में प्रकाशित हमारा लेख


शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

अप्प दीपो भव:




लोग खुश हैं कि एक फ़र्जी बाबा सलाखों के पीछे पहुँच गया। लेकिन जब तक हम धर्म के नाम पर रुढ़ और अन्धभक्त बने रहेंगे तब ऐसे बाबा पैदा होते रहेंगे। दरअसल, हम धर्म और शास्त्रों के नाम पर इतने भीरू होते हैं कि हमें इनका नाम लेकर कोई भी बरगला सकता है। शास्त्र कभी धार्मिक व्यक्ति की कसौटी नहीं हो सकते। धार्मिक व्यक्ति की कसौटी उसकी ध्यानस्थ अवस्था में हुई अनुभूति एवं उसका विवेक होता है। शास्त्र जब तक इन कसौटियों पर खरा उतरता है; ठीक है, अन्यथा वास्तविक धार्मिक व्यक्ति शास्त्र को इनकार करने का भी सामर्थ्य रखता है। अतीत में ऐसे अनेक बुद्धपुरूष हुए हैं जिन्होंने उस समय के शास्त्रों को इनकार कर दिया जैसे बुद्ध, कबीर, सहजो, दादूदयाल, मीरा, रज्जब, पलटूदास, रैदास आदि। इस बात को सदैव स्मरण रखें कि आपके और परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं है। फ़िर आप कहेंगे कि गुरू का क्या महत्त्व? मेरे देखे गुरू का महत्त्व बस इतना ही है कि वह आपको यह समझा दे कि आपके और आपके परमात्मा के बीच किसी मध्यस्थ की कोई आवश्यकता नहीं, स्वयं उसकी भी नहीं। वास्तविक गुरू अपने शिष्य को हर अटकाव; हर बाधा से मुक्त करता है जो उसे परमात्मा तक पहुँचने में आती है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं- "अप्प दीपो भव:।" जब ऐसे गुरू जीवन में होंगे तभी बुद्धत्व घटित होगा अन्यथा बुद्धू तो लोग बन ही रहे हैं, धर्म के नाम पर।

-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 17 सितंबर 2017

एम्बुलेंस दादा : करीमुल-हक

राष्ट्रपति से पद्म श्री प्राप्त करते हुए करीमुल-हक
एम्बुलेंस दादा..! जी हाँ यही पहचान उत्तर-भारत के चाय बागान में काम करने वाले करीमुल-हक की। जिन्हें स्थानीय क्षेत्र के लोग एम्बुलेंस दादा के रूप में पहचानते हैं। करीमुल-हक अपनी मोटरसाईकिल रूपी एम्बुलेंस से बीमार लोगों को अस्पताल पहुँचाते हैं। वर्ष 1993 में अपनी बीमार माँ को अस्पताल पहुँचाने के लिए उन्हें एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हुई और समय पर चिकित्सा सुविधा ना मिलने के कारण उनकी माँ ने घर पर ही दम तोड़ दिया। इस हादसे ने करीमुल-हक तो बेहद दु:खी किया। वे अन्दर ही अन्दर घुटन महसूस करने लगे। तभी एक दिन उनके साथ चाय बागान में काम करने वाले उनके सहयोगी को चोट लगी और उन्हें अस्पताल ले जानी की आवश्यकता महसूस हुई लेकिन एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हुई। तभी करीमुल-हक ने अपने सहयोगी को उठाकर मोटरसाईकिल पर बिठाया और उसे अपनी पीठ से बाँधकर अस्पताल पहुँचा दिया। उसी दिन से करीमुल-हक ने यह ठान लिया कि वे मोटरसाईकिल को ही एम्बुलेंस के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। इसके लिए उन्होंने कर्ज़ लेकर एक मोटरसाईकिल खरीदी। करीमुल-हक आसपास के लगभग बीस गाँवों में अपनी नि:शुल्क बाईक-एम्बुलेंस सुविधा प्रदान करते हैं। करीमुल-हक जहाँ रहते हैं उस जगह से निकटतम अस्पताल लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है। करीमुल-हक अब तक लगभग 5000 से अधिक ज़रूरतमन्द लोगों को अपनी बाईक-एम्बुलेंस से अस्पताल पहुँचा चुके हैं। उनकी इस समाजसेवा के लिए उन्हें कई सम्मान व पुरूस्कारों के साथ-साथ भारत सरकार द्वारा "पद्म श्री" से भी सम्मानित किया जा चुका है।
एम्बुलेंस दादा की बाईक-एम्बुलेंस




बुधवार, 6 सितंबर 2017

पहाड़-पुरूष

         "माउण्टेनमेन" दशरथ माँझी
 हौंसला यदि बुलन्द हो तो पहाड़ भी आपका रास्ता नहीं रोक सकता। इस बात को चरितार्थ करने वाले पहाड़-पुरूष अर्थात् "माउण्टेनमेन" का नाम है- दशरथ माँझी। दशरथ माँझी का जन्म सन 1934 में हुआ। बचपन में ही वे घर से भाग कर धनबाद की कोयला खदानों में काम करने लगे। शादीयोग्य आयु हो जाने पर उनका विवाह फगुनी देवी से हुआ। एक दिन पहाड़ से फ़िसलने के कारण उनकी उनकी पत्नी गँभीर रूप से घायल हो गईं। इलाज के लिए शहर जाना अपेक्षित था किन्तु पहाड़ के कारण शहर का मार्ग अत्यधिक लम्बा था। इसी के चलते समय पर चिकित्सा ना मिल पाने के कारण दशरथ माँझी की पत्नी फगुनी का निधन हो गया। अपनी पत्नी की इस प्रकार हुई मृत्यु ने दशरथ माँझी को विचलित कर दिया। उन्होंने अपने गाँव और शहर के मध्य खड़े विशालकाय पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने की ठान ली जिससे गाँव के लोगों को किसी भी आपात स्थिति में शहर पहुँचने में देर ना हो। उन्होंने अकेले ही छैनी-हथौड़े से पहाड़ को काटना शुरू कर दिया। प्रारम्भ में गाँववालों ने उनके इस दुष्कर कार्य का मज़ाक उड़ाया लेकिन माँझी के दृढ़ सँकल्प के आगे वे मौन हो गए। अन्तत: 22 (1960-1983) वर्षों की अनवरत कठोर साधना के पश्चात दशरथ माँझी ने गहलौर गाँव के समीप स्थित पहाड़ को काटकर 110 मीटर लम्बे और लगभग 9 मीटर चौड़े मार्ग का निर्माण कर दिया। उनके इस प्रयास से गया जिले के अतरी और वजीरगंज क्षेत्रों के बीच की दूरी लगभग 40 कि.मी तक कम हो गई। उनकी इस उपलब्धि के उन्हें आज "माउण्टेनमेन" के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2006 में बिहार से सरकार ने उनका नाम पद्मश्री पुरुस्कार के लिए प्रस्तावित किया। 26 दिसम्बर 2016  को "बिहार की हस्तियाँ नामक श्रृँखला में इंडिया पोस्ट द्वारा उनके नाम पर एक डाक टिकट जारी किया गया। कैंसर की बीमारी के कारण 17 अगस्त 2007 को 73 वर्ष की आयु में "माउण्टेनमेन" श्री दशरथ माँझी का निधन हो गया।

दशरथ माँझी द्वारा निर्मित मार्ग

                                



शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

एक सेनानी का संघर्ष

श्री गौर हरिदास जी अपनी धर्मपत्नि के साथ
न्याय व सम्मान यदि उचित समय पर ना मिलें तो वे अपना मूल्य खो देते हैं। आज हमारे देश में ऐसे हज़ारों उदाहरण मौजूद हैं जिनमें देरी से मिले न्याय व सम्मान ने अपना मूल्य खो दिया। अपनी गौरवपूर्ण पहचान व सम्मान को प्राप्त करने के लिए किए ऐसे ही एक सँघर्ष का नाम है- स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी श्री गौर हरिदास। जिन्हें स्वयं को स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी साबित करने में तीस वर्ष से भी अधिक का समय लगा। श्री गौर हरिदास जी ने स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण पत्र के लिए सन् 1976 में आवेदन दिया था जो उन्हें हमारे आजाद देश की लचर व्यवस्थाओं के चलते 33 वर्षों बाद सन् 2009 में प्राप्त हुआ। 85 वर्षीय श्री गौर हरिदास पाँच वर्षों तक स्वतन्त्रता आन्दोलन का हिस्सा रहे थे। वानर सेना के सदस्य के रूप में वे छिपकर स्वतन्त्रता सँग्राम से सम्बन्धित साहित्य और सन्देशों को लोगों तक पहुँचाने का काम करते थे। सन् 1945 में उन्होंने अंग्रेज़ों के आदेश के ख़िलाफ़ भारत का झण्डा लहराया था जिसके लिए उन्हें दो महीने जेल में बिताने पड़े थे। ओडिशा में पैदा हुए श्री गौर हरिदास तेरह भाई-बहनों में दूसरी सन्तान थे। उनके पिता गाँधीवादी थे और अपने पिता से ही उन्हें स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल होने की प्रेरणा मिली। श्री गौर हरिदास जी ने 'ख़ादी ग्रामोद्योग आयोग' में लम्बे समय तक कार्य किया। श्री गौर हरिदास जी का सँघर्ष तब शुरू हुआ जब उन्हें अपने पुत्र को एक सँस्थान में प्रवेश दिलाने के लिए स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता महसूस हुई। स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी के प्रमाण-पत्र के लिए श्री गौर हरिदास जी ने आवेदन दिया जो उन्हें विभिन्न सरकारी कार्यालयों व मन्त्रालय के चक्कर लगाने के उपरान्त 33 वर्षों बाद प्राप्त हुआ। उनके बेटे को तो अपनी प्रतिभा के आधार पर उस सँस्थान में प्रवेश मिल गया लेकिन श्री गौर हरिदास जी का जीवन अपनी गौरवपूर्ण पहचान पाने के लिए एक लम्बे सँघर्ष में बदल गया। एक ऐसा सँघर्ष जिसमें ना कोई धरना-प्रदर्शन था; ना ही कोई नारा था; यदि था, तो बस श्री गौर हरिदास जी के हाथों में अपनी फ़ाईलों का एक बण्डल जिसे लेकर वह अत्यन्त शान्तिपूर्ण ढँग से एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक वर्षानुवर्ष भटकते रहे। सम्मान से कहीं अधिक यह स्वयं की पहचान की लड़ाई थी। वर्ष 2009 में स्वतन्त्रता सँग्राम सेनानी का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के साथ श्री गौर हरिदास जी के सँघर्ष को तो विराम लग गया लेकिन इस सँघर्ष ने उनसे उनके जीवन के कई अनमोल पल छीन लिए जो उन्हें अब कभी प्राप्त नहीं होंगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
  सम्पादक