मंगलवार, 22 अगस्त 2017

पत्रकारिता या बाज़ार !

आज तीन तलाक पर आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की ख़बर देखने के लिए जब टी.वी. चालू किया तो मन अत्यन्त विषाद से भर गया। ये मीडिया समूह जो देश की हर घटना पर न्यायाधीश की तरह व्यवहार करते और यदा-कदा अपने चैनलों पर नैतिकता की बातें करते हैं क्या सारी नैतिकता अन्य व्यक्तियों के लिए हैं स्वयं उनके लिए नैतिकता का कोई मापदण्ड नहीं है? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि क्योंकि आज तीन तलाक से जुड़ी खबरें दिखाते वक्त लगभग हर न्यूज़ चैनल केवल एक लाईन बोलकर ब्रेक ले रहा था। क्या यही नैतिकता तकाज़ा है कि जब देशवासी इतनी अहम ख़बर को देखने के लिए अपना बहुमूल्य समय निकालकर न्यूज़ चैनल देख रहे हैं आप सिर्फ़ और सिर्फ़ एक लाईन बोलकर उन्हें लम्बे-लम्बे विज्ञापन दिखाए चले जा रहे हैं। मीडिया समूहों की आर्थिक विवशता मैं समझ सकता हूँ लेकिन उसके लिए पूरा दिन पड़ा है, कभी-कभी तो देशभक्ति व राष्ट्रवाद का पाठ दूसरों को पढ़ाने के स्थान पर स्वयं भी पढ़ लिया करें। आज के दौर में दूरदर्शन को छोड़कर एक भी ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं है जो ज़रा करीने से ख़बरें प्रसारित करता हो। पत्रकारिता का तमाशा बनाकर रख दिया है, और कैमरे के सामने तेवर देखिए; माईक आडी हाथ में लेते ही बन बैठे निर्णायक, ना प्रश्न पूछने का सलीका, ना बहस-मुबाहिसे की तमीज़। आम आदमी करे भी तो क्या करे वह भी तो इसी मीडिया से आकर्षित है, लेकिन कभी-कभी बड़ी कोफ़्त होती है इस प्रकार की पत्रकारिता से। यदि कुछ पत्रकारों व चैनलों को छोड़ दिया जाए तो यह पत्रकारिता के पतन का दौर है। मैं इस प्रकार की पत्रकारिता की निन्दा व भर्त्सना करता हूँ। यही कर सकता हूँ  और क्या....टी.वी. बन्द कर सकता था सो कर दिया और बैठ गया सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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